ગુજરાતી અહસ્નુલ બયાન download karo

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*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ चालीस अहादीस*

*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ चालीस अहादीस*
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लेखक: शैख़ अस'अद आज़मी 
(जामि'आ सलफ़िया बनारस)

हिंदी अनुवाद: अब्दुल मतीन सैयद
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हदीष नंबर:1

नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(1)

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لَأَرْبَعِ لِمَالِهَا وَلِحَسَبِهَا وَلِجَمَالِهَا وَ لِدِينِهَا، فَاظْفَرُ بِذَاتِ الدِّيْنِ تَرِبَتْ يَدَاكَ.}
[بخاری:٤٧٠۰ ، مسلم:٢٦٦١]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: 'औरत से चार चीज़ों की वज्ह (कारण) से निकाह (विवाह) किया जाता है: उसके माल की वज्ह (कारण) से, उसके ख़ानदानी हसब-ओ-नसब की वज्ह से, उसके हुस्न-ओ-जमाल (ख़ूबसूरती/सुंदरता) की वज्ह से, और उसके दीन की वज्ह (कारण) से, लिहाज़ा (इसलिए) तुम दीन-दार 'औरत (महिला) से (शादी कर के) कामयाबी (सफलता) हासिल करो, तुम्हारे हाथ ख़ाक-आलूद हों।
[सहीह बुख़ारी:4700, सहीह मुस्लिम:2661]

व्याख्या: 
 इस हदीष में बताया गया है कि लोग अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त अपनी होने वाली बीवी (पत्नी) के अंदर चार चीज़ें तलाश करते हैं 1-माल-ओ-दौलत वाली हो, 2-ऊँचे-घराने की हो, 3-ख़ूबसूरत हो, 4-दीन-दार हो।
 लेकिन मुसलमानों को हमारे नबी ﷺ ने यह ताकीद की (अनुरोध किया) है कि बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त सिर्फ़ उसकी दीन-दारी को देखें, दीन-दार बीवी को अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी/life partner) बनाएं, क्यूँकि (इसलिए कि) अस्ल (वास्तविक) सरमाया (धन-दौलत/पुंजी) दीन ही है जिस पर दुनिया-ओ-आख़िरत की कामयाबी (सफलता) का दार-ओ-मदार है, बाक़ी तीनों चीज़ें दीन-दारी के मुक़ाबले में कोई ख़ास अहमियत (महत्व) नहीं रखतीं।
 नेक बीवी पूरे घर के माहौल (वातावरण) को बेहतर बनाएगी, इस के साथ ही उसके बत्न (कोख/पेट) से जन्म लेने वाली औलाद पर भी नेकी के आसार (गुण) होंगे, दीन-दार और नेक 'औरत (महिला) अपने बच्चों को भी गुमराही के रास्ते पर नहीं छोड़ेगी, बल्कि (किंतु) उन को अच्छी तर्बियत (परवरिश) देगी।
 इस के बर-'अक्स (उल्टा/विरुद्ध) दीन-ओ-अख़्लाक़ (अच्छे आचरण/शिष्टाचार) से 'आरी (वंचित) 'औरत से न घर का माहौल बेहतर होगा और न ही वो अपने बच्चों को भलाई और नेकी के रास्ते पर चलने की तर्बियत (शिक्षा) दे सकेगी, जो लोग दुनिया की चमक-दमक और उसकी रंगीनियों में महव (मगन/मस्त) होकर बीवी या बहू के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त दीन-दारी के पहलू (उद्देश्य) को नज़र-अंदाज़ कर देते हैं और बड़े घरानों (ख़ानदानों) गोरी-चमड़ी (गोरा रंग) और माल-ओ-दौलत के पीछे भागते हैं वो अक्सर (बहुत बार) बा'द में पछताते हैं और उनकी ज़िंदगी का सुकून दरहम-बरहम हो जाता है, हम अपने गिर्द-ओ-पेश (आसपास) का जाइज़ा लें तो इस की मुत'अद्दिद (कई/अनेक) मिसालें मिल जाएंगी।
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हदीष नंबर:2

नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(2)*

{عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ :
تَخَيَّرُوا لِنُطَفِكُمْ، فَانْكِحُوا الْأَكْفَاءَ وَأَنْكِحُوا إِلَيْهِمْ}
[ابن ماجه:١٩٥٨ - صحيح الجامع:۲۹۲۸]
तर्जमा: हज़रत 'आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: अपने नुत्फ़े (औलाद) के लिए बेहतर (बीवी/पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice) करो, और कुफ़ू से शादी करो और कराओ।
[इब्ने माजा:1958, सहीह अल-जामे':2928]

व्याख्या:
 अपनी होने वाली औलाद की बेहतरी और भलाई की फ़िक्र (चिंता) इंसान को शादी से पहले और बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त (समय) ही से होनी चाहिए, इस बात को इस हदीष में एक नए और तमसीली (मिसाली) उस्लूब (शैली/अंदाज़) में बयान किया गया है, जिस तरह यह बात मुसल्लम (साबित-शुदा) है कि अच्छी और ज़रख़ेज़ (उपजाऊ) ज़मीन ही से अच्छी खेती और अच्छी पैदावार होती है और महज़ (केवल) बीज का अच्छा होना काफ़ी नहीं, इसी तरह अच्छी और सालेह (नेक) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए नेक-सीरत बीवी ज़रूरी है, सिर्फ़ (केवल) शौहर (husband) का नेक और सालेह (परहेज़गार) होना काफ़ी (बस/पर्याप्त) नहीं।
 निकाह के बाद शौहर बीवी से मुजाम'अत (हमबिस्तरी) के ज़री'आ (द्वारा) उसके रहिम (गर्भ) में अपना नुतफ़ा (वीर्य) मुंतक़िल करता है, यह मनी' (वीर्य) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए बीज की हैसियत रखती है और 'औरत का रहिम (गर्भ) उसके लिए ज़मीन और खेत का दर्जा रखता है, इस रहिम (गर्भ) और इस ज़मीन की अच्छाई और ख़राबी इससे पैदा होने वाली शय (वस्तु) पर ज़रूर असर-अंदाज़ होगी, बद-'अक़ीदा (बे-दीन) बद-ख़ुल्क़ (बद-अख़्लाक़) बद-चलन (बद-कार) और दूसरी ख़राबियों में मुब्तला (व्यस्त) 'औरत से सालेह (पाक-दामन) पाकबाज़ (परहेज़गार) और नेक औलाद की तवक़्क़ो' (उम्मीद) नहीं की जा सकती ऐसी 'औरत ख़ुद अपने शौहर (पति/husband) के लिए मुसीबत और दर्द-ए-सर (उलझन) रहती है, अगर वो मालदार, ख़ूबसूरत और नामी-गिरामी (मशहूर) घराने की भी हो तो अपने शौहर को सुकून हम (आदि) नहीं पहुंचा सकती, चे जाए कि (बड़ी बात है कि) उसके लिए ऐसी औलाद जने जो उसकी आँखों की ठंडक और उसके दिल के सुरूर (मन की ख़ुशी) का ज़री'आ बने।
 क़ुरआन-ए-करीम ने:
{لِلْخَبِيثِينَ وَالخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَاتِ، وَالطَّيِّبَاتُ لِلطَّيِّبِينَ وَالطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَاتِ}
[سوره نور:٢٦]
तर्जमा: ख़बीस (नापाक) 'औरतें ख़बीस (नापाक) मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और ख़बीस मर्द ख़बीस 'औरतों के लाइक़ हैं और पाक 'औरतें पाक मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और पाक मर्द पाक 'औरतों के लाइक़ हैं।
[सूरा अन्-नूर:26]
 के ज़री'आ (द्वारा) लोगों को मुतनब्बे (सावधान) कर दिया गया है कि अच्छे लोग अच्छी और पाक-दामन 'औरतों ही को रिश्ता-ए-इज़दिवाज (निकाह) में मुंसलिक (शामिल) करें, इस तरह एक सालेह (नेक) और पाकबाज़ ख़ानदान और मु'आशरा (समाज) का क़ियाम मुमकिन (संभव) हो सकेगा, जिस में पलने बढ़ने वाले अफ़राद नेक-सीरत और 'उम्दा (अच्छी) ख़सलत ('आदत/स्वभाव) वाले होंगे।
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हदीष नंबर:3

नेक बीवी (पत्नी) के कुछ और औसाफ़ (ख़ूबियाँ)*

{عَنْ مَعْقِلِ بْنِ يَسَارٍ قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَقَالَ :
إِنِّي أَصَبْتُ امْرَأَةً ذَاتَ حَسَبٍ وَمَنْصِبٍ إِلَّا أَنَّهَا لَا تَلِدُ أَفَاتَزَوَّجُهَا؟ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّانِيَةَ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّالِثَةَ فَهَاهُ، فَقَالَ: تَزَوَّجُوا الوَدُودَ الوَلُوُدَ، فَإِنِّي مُكَاثِرٌ بِكُمُ الأمم}
[سنن نسائی:۳۱۷۵ ، ابو داود:١٧٥٤ - صحيح الجامع:٢٩٤٠]
तर्जमा: माक़िल बिन यसार रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक आदमी रसूल ﷺ के पास आया और कहा: एक शरीफ़ ख़ानदान और क़द्र-ओ-मंज़िलत ('इज़्ज़त) वाली ख़ातून (महिला) के बारे में मुझे जानकारी मिली है मगर उसके यहाँ पैदाइश नहीं होती, क्या मैं उससे शादी कर लूं ? आप ﷺ ने उनको मना' फ़रमाया, वो दोबारा (दूसरी बार) आए और सेह-बारा (तीसरी बार) आए और आप ﷺ ने मना' फ़रमाया और कहा कि ज़्यादा मोहब्बत करने वाली और ज़्यादा बच्चे जनने वाली 'औरत से शादी करो, क्यूँकि (इसलिए कि) में (क़ियामत के दिन) दूसरी क़ौमों के मुक़ाबले में तुम्हारी कसरत (ज़यादती) पर फ़ख़्र (गर्व) करूंगा।
[सुनन नसाई:3175, अबू दाऊद:1754, सहीह अल-जामे':2940]

व्याख्या:
 इस हदीष में सराहत (वज़ाहत) से यह बात बयान कर दी गई कि शादी के मक़ासिद (उद्देश्य) में अहम (महत्वपूर्ण) मक़्सद औलाद का हुसूल (प्राप्ति) भी है, शादी महज़ (केवल/सिर्फ़) जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) या बीवी (पत्नी) और ससुराल वालों के मक़ाम-ओ-मर्तबा (प्रतिष्ठा/पद) से इस्तिफ़ादा (नफ़ा' उठाने) के लिए नहीं होती, इसलिए अगर क़राइन (आसार/लक्षण) वग़ैरा से 'औरत का बाँझपन मा'लूम हो जाए तो उससे शादी से इज्तिनाब (किनारा-कशी/उपेक्षा) कर के ऐसी 'औरत का इंतिख़ाब (choice/चयन) किया जाए जिस के अंदर अफ़्ज़ाइश-ए-नस्ल (संतान-वृद्धि) की इस्तिता'अत (क्षमता) हो।
 हदीष नंबर (1) की तरह इस हदीष में भी बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के मे'यार (जाँच/परख) की निशान-दही (पहचान) की गई है और 'अवाम (जनता/public) में राइज (प्रचलित/जारी) मे'यार (तरीक़ा/प्रणाली) पर न जाने की ताकीद की गई है, मुस्लिम घरानों में औलाद की कसरत (ज़्यादती/अधिकता) शरी'अत (दीन) को मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है क्यूंकि (इसलिए कि) क़ियामत के दिन जब तमाम अंबिया अपनी अपनी उम्मतों के साथ आएंगे तो उम्मत-ए-मुहम्मदिय्या उन सब के बीच सबसे बड़ी उम्मत होगी और यह चीज़ हमारे नबी के लिए बा'इस-ए-इफ़्तिख़ार (सम्मान का कारण) होगी।
 इस में कोई शक नहीं कि औलाद की कसरत (ज़्यादती) के साथ उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) भी शर'ई मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है, नेक, दीन-पसंद और आ'ला (श्रेष्ठ/'उम्दा) अख़्लाक़-ओ-सिफ़ात (आचरण) के हामिल लोगों पर ही फ़ख़्र (गर्व) किया जाता है और उनकी मौजूदगी (हाज़िरी) से ख़ुशी और मसर्रत (प्रसन्नता) होती है, न कि दीन-बेज़ार (दीन से निराश) और सीरत-ओ-किरदार (चाल-चलन) से तेही-दस्त (महरूम) लोगों से, इसलिए औलाद की कसरत (ज़्यादती) को तर्बियत (ता'लीम) के 'अमल से जुदा (अलग) कर के नहीं देखा जाना चाहिए, जिस तरह औलाद की कसरत शर'ई मतलूब (ज़रूरी) है ठीक उसी तरह उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) मतलूब (ज़रूरी) है, अलहम्दुलिल्लाह इस वक़्त (समय) ता'दाद (संख्या) के ए'तिबार से मुसलमान 'ईसाईयों (christians) के बा'द दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं, मगर उन में इस्लामी तर्बियत (शिक्षा) की बड़ी कमी है, जिस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने की सख़्त (बहुत) ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:4

जिमा' (हमबिस्तरी) के वक़्त की दु'आ और तर्बियत (शिक्षा/ता'लीम)*

{عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: "لَوْ أَنَّ أَحَدَكُمْ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْتِيَ أَهْلَهُ قَالَ: بِسْمِ اللَّهِ للَّهُمَّ جَنِّبْنَا الشَّيْطَانَ وَجَنبِ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا ، فَإِنَّهُ إِنْ يُقَدَّرُ بَيْنَهُمَا وَلَدٌ فِي ذَلِكَ لَمْ يَضُرَّهُ شَيْطَانٌ"}
[بخاری:٣٢٧۱ ، مسلم:١٤٣٤]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम में से कोई आदमी अपनी बीवी (पत्नी) से जिमा' (हमबिस्तरी) का इरादा करे और यह दु'आ पढ़ ले "शुरू' करता हूं अल्लाह के नाम से, ऐ अल्लाह तू हमें शैतान से महफ़ूज़ (सुरक्षित) रख और शैतान को इस चीज़ (औलाद) से दूर रख जो तू हमें 'अता करे तो अगर उस जिमा' (हमबिस्तरी) से उनकी तक़दीर में औलाद लिखी होगी तो शैतान उसको नुक़्सान नहीं पहुंचाएगा"।
[सहीह बुख़ारी:3271, सहीह मुस्लिम:1434]

व्याख्या:
 बच्चों की तर्बियत (परवरिश) और उनकी इस्लाह-ओ-फ़लाह पर ध्यान देने के मवाक़े' (मौक़े'/अवसर) में से एक मौक़ा' यह भी बताया गया है कि जिमा' (संभोग) और हमबिस्तरी को सिर्फ़ जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) का ज़री'आ (माध्यम) न समझा जाए बल्कि (किंतु) उस मौक़ा' (अवसर) पर भी इंसान अल्लाह को याद रखे, साथ ही अपनी आने वाली औलाद की शैतान से हिफ़ाज़त को भी मद्द-ए-नज़र (सामने) रखे, उसके लिए मज़कूरा दु'आ का विर्द करने (दोहराने/पढ़ने) की उसको हिदायत (रहनुमाई) की गई है और इसका फ़ाइदा यह बतलाया गया है कि अगर इस जिमा' (हमबिस्तरी) के नतीजे में कोई बच्चा वुजूद (अस्तित्व) में आता है तो वो शैतान के शर (शरारत/बुराई) से महफ़ूज़ (सुरक्षित) होगा।
 शरी'अत की नज़र में बच्चे का तहफ़्फ़ुज़ (हिफ़ाज़त) और शैतान और शैतानी आ'माल-व-हरकात (काम) से उसे बचाना किस-क़दर (कितना) अहम (ज़रूरी) है इसका अंदाज़ा (अनुमान) इस हदीष से लगाया जा सकता है, शरी'अत (दीन) की हकीमाना (हिकमत से भरी) निगाहें (नज़रें) बहुत दूर तक देखती हैं, अल्लाह रब्ब-उल-'इज़्ज़त इंसान और सारी काइनात का ख़ालिक़ है मख़्लूक़ के नफ़-ओ-नुक़्सान और सलाह-ओ-फ़साद (भलाई और बिगाड़) को उससे बेहतर कौन समझ सकता है, यह उसका 'ऐन (ख़ास) एहसान है कि उसने अपने बंदों को शरी'अत के नूर (रोशनी) से नवाज़ा है और ऐसे बेशुमार (असंख्य) हक़ाइक़ (सच्चाई) से आगाह (सूचित/alert) किया है जिन (जिस) का उन्हें क़त'अन (हरगिज़/बिल्कुल) 'इल्म नहीं था।
 आज नाफ़रमान और बे-राह (गुमराह) औलाद की कसरत (भरमार) से हमारा मु'आशरा (समाज) शाकी (फ़रियादी) है, नई-नस्ल की अकसरिय्यत (बहुसंख्यक/majority) शैतान के नस्ब-कर्दा (लगाईं हुई) जाल में बड़ी तेज़ी से फँसती जा रही है, इसके अस्बाब (कारण) में से एक अहम (मुख्य) सबब (कारण) मज़कूरा हिदायत-ए-नबवी (हमबिस्तरी के समय की दु'आ) से ग़ाफ़िल (बे-ख़बर) होना ज़ाहिर (स्पष्ट) है, और यह कहना मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) होगा कि शादी-शुदा जोड़ों की अकसरिय्यत (majority/बहुसंख्यक) इन ता'लीमात-व-हिदायात (मार्ग-दर्शन) से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित) है लिहाज़ा (इसलिए) इस पर 'अमल का सवाल ही कहां पैदा होता है।
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हदीष नंबर:5

बच्चे के लिए जीने का हक़*

{عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ!
أَيُّ الذَّنْبِ أَعْظَمُ؟ قَالَ :
أَنْ تَجْعَلَ لِلَّهِ نِدًّا وَهُوَ خَلَقَكَ، قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تَقْتُلَ وَلَدَكَ خَشْيَةَ أَنْ يَطْعَمَ مَعَكَ. قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تُزَانِي حَلِيْلَةَ جَارِكَ}
[بخاری:٦٠٠١ ، مسلم:٢٥٧]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ से कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! सबसे बड़ा गुनाह कौन सा है ? आप ने फ़रमाया: सबसे बड़ा गुनाह यह है कि तुम अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराओ, हालांकि अल्लाह ही ने तुम को पैदा किया है, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: यह है कि तुम अपने बच्चों को इस डर से क़त्ल कर दो कि वो भी तुम्हारे साथ खाएंगे, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: वो यह है कि तुम अपनी पड़ोसन के साथ ज़िना (बद-कारी/व्यभिचार) करो।
[सहीह बुख़ारी:6001, सहीह मुस्लिम:257]

व्याख्या:
 इस हदीष में शिर्क के बा'द सबसे बड़ा गुनाह यह बतलाया गया है कि आदमी अपनी औलाद (संतान) को इस डर से क़त्ल कर दे कि वो ज़िंदा रहेगी तो खाने पीने में वो भी शरीक (शामिल) होगी जिस से वो मु'आशी (आर्थिक) तंगी में मुब्तला (ग्रस्त) हो जाएगा, इस्लाम से क़ब्ल (पहले) इस क़बीह-फ़े'ल (बुरे काम) का बा'ज़ (कुछ) लोग इर्तिकाब (पाप/गुनाह) करते थे, इसी वज्ह (कारण) से क़ुरआन-ए-करीम में भी सराहत (वज़ाहत) से इस का तज़्किरा (बयान) कर के इस से रोका गया है और यह कहा गया है कि सबको रिज़्क़ (रोज़ी) फ़राहम (उपलब्ध) करने वाले हम हैं।
 दर-हक़ीक़त (वास्तव में) यह 'अमल (काम) बल्कि (किंतु) यह तसव्वुर (ख़याल) ही इंसान की माद्दा-परस्ती (materialism/मुंकिर-ए-ख़ुदा) और उसके हिर्स-ओ-हवस (लालच और इर्ष्या) की इंतिहा (हद/सीमा) को पहुंचने की 'अलामत (निशानी) है, आज की मुहज़्ज़ब (शिक्षित) और तरक़्क़ी-याफ़ता (विकसित) दुनिया में इस तसव्वुर (ख़याल/योजना) को सरकारी सरपरस्ती (समर्थन/सहायता) हासिल हो चुकी है और मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) बहानों से इस्क़ात-ए-हमल (गर्भपात/abortion) और दूसरे तरीक़ों से बच्चों के क़त्ल-ए-'आम का सिलसिला जारी है, फिर भी दुनिया हुक़ूक़-ए-इंसानी (human rights) और हुक़ूक़-ए-अतफ़ाल (बच्चों के अधिकार) का ढँडोरा पीटती है और अपने आप को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन (civilization/culture) का 'अलम-बरदार (प्रचारक) और इंसानियत (मानवता) का सबसे बड़ा बही-ख़्वाह (ख़ैर-ख़्वाह/शुभचिंतक) मानती है।
 इस्लाम ने आज से चौदह-सौ (1400) साल पहले इस फ़ासिद (ख़राब) नज़रिये (ideologies) की क़बाहत (बुराईयों) को आशकारा (व्यक्त/ज़ाहिर) करते हुए इस मज़मूम-हरकत (बुरे 'अमल) पर पाबंदी लगा दी थी और बच्चों को ज़िंदा रहने का न सिर्फ़ हक़ (अधिकार) 'अता किया बल्कि उनको जुमला (सब/समग्र) इंसानी-हुक़ूक़ (मानवीय अधिकार) से नवाज़ा।
 इस हदीष के ज़री'ए (द्वारा) गोया (मानो) अल्लाह के रसूल ﷺ ने लोगों को यह बावर (भरोसा) कराया है कि कभी अपनी औलाद को अपने लिए बोझ न तसव्वुर (ख़याल) करो, और इस फ़िक्र (चिंता) से परेशान न रहो कि मैं उनको कहां से खिलाने पिलाने और दीगर (अन्य) ज़रूरियात का इंतिज़ाम (बंदोबस्त) करूंगा, जिस ज़ात (हस्ती) ने आप को रिज़्क़ (रोज़ी/खाना) फ़राहम (उपलब्ध) किया है वही उनको भी फ़राहम (उपलब्ध) करेगी, अगर इस तसव्वुर (ख़याल) से मुँह मोड़ कर तुम उनसे हक़-ए-हयात (जीने का अधिकार) सल्ब करने (छीन लेने) के मुजरिम (दोषी) पाए गए तो तुम बहुत बडे़ गुनाह के मुर्तकिब (अपराधी) माने जाओगे और अल्लाह के 'अज़ाब से तुम्हें दो-चार होना पड़ेगा।
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हदीष नंबर:6

खजूर चबा कर मुँह में देना*

{عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ:
وُلِدَ لِي غُلَامٌ، فَآتَيْتُ بِهِ النَّبِيُّ اللهِ، فَسَمَّاهُ إِبْرَاهِيمَ ، فَحَنَّكَهُ بِتَمْرَةٍ وَدَعَا لَهُ بِالْبَرَكَةِ ، وَدَفَعَهُ إِلَيَّ ، وَكَانَ أَكْبَرَ وَلَدِ أَبِي مُوسَى}
[بخاری:۵۷۳۰ ، مسلم:۳۹۹۷]
तर्जमा: हज़रत अबू मूसा अश'अरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है वो कहते हैं कि मेरे यहाँ एक बच्चा पैदा हुआ, मैं उस बच्चे को लेकर नबी-ए-करीम ﷺ की ख़िदमत (सेवा) में हाज़िर हुआ, आप ﷺ ने उसका नाम इब्राहीम रखा, खजूर चबा कर उसके मुंह में रखा, उसके लिए बरकत की दु'आ की और उसके बा'द उसे मेरे हवाले किया, यह अबू मूसा के सबसे बड़े साहब-ज़ादे (बेटा) थे।
[सहीह बुख़ारी:5730, सहीह मुस्लिम:3997]

व्याख्या:
 इस मफ़्हूम (अर्थ/meaning) की मुत'अद्दिद (अनेक/कई) हदीषें हैं जिन से मा'लूम होता है कि सहाबा-ए-किराम अपने नौ-मौलूद (newborn/नवजात) बच्चों को नबी ﷺ के पास ले जाते, आप ﷺ अपनी गोद में बच्चों को लेते और खजूर या छूहारा (dried date) वग़ैरा अपने मुंह में चबा कर उस बच्चे के मुंह में डालते और उसकी ख़ैर-ओ-भलाई के लिए दु'आ भी फ़रमाते।
 बच्चों की अच्छी तर्बियत (शिक्षा) और इस्लामी आदाब-ओ-ता'लीमात से उन्हें जोड़े रखने की कोशिश में से एक कोशिश यह भी है कि पैदाइश के बा'द किसी नेक-ओ-सालेह (परहेज़गार) शख़्स के मुंह से चबाई हुई चीज़ उस बच्चे के मुंह में डाली जाए, हो सकता है कि उस बुज़ुर्ग के सलाह-ओ-तक़्वा (परहेज़-गारी) का असर बच्चे पर भी आए, बच्चे के बत्न (पेट) में पहुंचने वाली इब्तिदाई (शुरू'आती) ग़िज़ाओं (भोजन) में पाक-तीनत (अच्छे आचरण वाले) लोगों के लु'आब-ए-दहन (थूक/saliva) का पहुंचाना उसको हमेशा पाक और हलाल रोज़ी खिलाने की स'ई (कोशिश) का भी इशारा (संकेत) है, इसी तरह 'आलिम-ए-बा-'अमल और सालेह (नेक) शख़्स से बच्चे के हक़ में ख़ैर-ओ-बरकत की दु'आ कराना भी इसी नुक़्ता-ए-नज़र से है।
 ग़ौर करें कि किन किन तरीक़ों से शरी'अत बच्चों की अच्छी तर्बियत (परवरिश) का इंतिज़ाम करती है और इस चीज़ पर किस-क़दर (कितनी) तवज्जोह (ध्यान) सर्फ़ (उपयोग) करती है, क्या मुस्लिम मु'आशरों (societys) में नौ-मौलूद (नवजात/newborn) बच्चों के साथ ऐसा एहतिमाम (बंदोबस्त) किया जाता है ? और क्या मुस्लिम वालिदैन (माँ-बाप) अपने बच्चों की तर्बियत (परवरिश) के त'अल्लुक़ (संबंध) से इतने मुतफ़क्किर (फ़िक्र-मंद/चिंतित) नज़र आते हैं ? अगर नहीं तो इस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने और इस हदीष में मज़कूर (वर्णन/उल्लेखित) 'अमल को अपने घरों और अपने बच्चों पर नाफ़िज़ (लागू/जारी) करने की ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:7

नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का 'अक़ीक़ा*

{عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنُدُبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ :
كُلُّ غُلَامٍ رَهِينَةٌ بِعَقِيقَتِهِ تُذْبَحُ عَنْهُ يَوْمَ سَابِعِهِ وَيُسَمِّى فِيهِ وَيُحْلَقُ رَأْسُهُ}
[ترمذی:١٤٤٢ ، ابو داود:٢٤٥٥ ، نسائی:٤١٤٩ , ابن ماجه:٣١٥٦، احمد:۱۹۲۲۵- صحيح الجامع:٤٥٤١]
तर्जमा: हज़रत समुरा बिन जुंदुब रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: हर बच्चा अपने 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) गिरवी होता है, सातवें दिन उसकी तरफ़ से 'अक़ीक़ा किया जाएगा, उसी रोज़ (दिन) उसका नाम रखा जाएगा और उसका सर मूनडा जाएगा।
[तिर्मिज़ी:1442, अबू दाऊद:2455, नसाई:4149, इब्ने माजा:3156, अहमद:19225, सहीह अल-जामे':4541]

व्याख्या:
 बच्चे की पैदाइश (जन्म) के बा'द उसकी जिस्मानी (शारीरिक) और अख़्लाक़ी (नैतिक) व ईमानी तर्बियत (परवरिश) के सिलसिले की एक कड़ी यह भी है कि सातवें दिन उसकी जानिब (तरफ़) से 'अक़ीक़े का जानवर ज़ब्ह किया जाए, उसका नाम रखा जाए और उसके सर का बाल मूनडा जाए, 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) बच्चे के गिरवी होने का कई मतलब बयान किया गया है जिस में एक राजेह (सहीह) मतलब इमाम अहमद बिन हंबल का बयान-कर्दा (किया हुआ) है कि इससे मुराद वालिदैन (माँ-बाप) की सिफ़ारिश है, या'नी अगर उस बच्चा का 'अक़ीक़ा न किया गया और वो बचपन ही में इंतिक़ाल (निधन/मृत्यु) कर गया तो वो बच्चा अपने वालिदैन (माँ-बाप) के हक़ में सिफ़ारिश नहीं करेगा।
[تحفة الاحوذی:95,94/5]
 'अक़ीक़ा एक इस्लामी शि'आर (तरीक़ा) और नबी-ए-करीम ﷺ की सुन्नत है, बच्चे की तरफ़ से 'अक़ीक़ा में दो बकरा या बकरी और बच्ची की तरफ़ से एक बकरा या बकरी ज़ब्ह करना मसनून (जायज़) है, अलबत्ता (लेकिन) बच्चे (लड़के) की तरफ़ से एक जानवर भी ज़ब्ह करना साबित है।
 'अक़ीक़ा सातवें दिन करना मसनून (जायज़) है, बिला-किसी शदीद (सख़्त) 'उज़्र (मजबूरी) के इस को टालना मुनासिब (ठीक) नहीं, अगर किसी वज्ह (कारण) से सातवें दिन 'अक़ीक़ा न किया जा सका तो बा'द में जब मुयस्सर (संभव/उपलब्ध) हो कर लिया जाए, अलबत्ता (लेकिन) हत्तल-इमकान (जहाँ तक मुम्किन हो) जल्दी करनी चाहिए।
 'अक़ीक़ा के फ़वाइद (फ़ाइदे) मुत'अद्दिद (अनेक) हैं, बा'ज़ (कुछ/चंद) फ़वाइद (फ़ाइदे) बयान करते हुए इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह लिखते हैं कि नौ-मौलूद (newborn/नवजात) की आमद (आने) के मौक़ा' (अवसर) पर यह जानवर ज़ब्ह किया जाता है, इस का फ़ाइदा यह है कि बच्चे को गिरवी रहने से नजात (छुटकारा) दिलाता है, 'अक़ीक़ा बाप को औलाद की सिफ़ारिश मुयस्सर (उपलब्ध) कराता है, 'अक़ीक़ा बच्चे का फ़िदया है जो बच्चे को शैतान के शर (शरारत) से बचाता है, 'अक़ीक़े का एक फ़ाइदा यह भी है कि उसकी वज्ह (कारण) से सातवें दिन दोस्त-ओ-अहबाब और 'अज़ीज़-ओ-अक़ारिब (रिश्तेदार) जम' (इकट्ठा) होते हैं और बच्चे को दु'आ-व-तबरीक (आशीर्वाद) से नवाज़ते हैं।
[तोहफ़तुल-मौदूद बा-अहकाम अल-मौलूद, पेज नंबर:57]
 नाम रखने और सर मुँडवाने से मुत'अल्लिक़ (बारे में) गुफ़्तुगू (बात-चीत) आगे आ रही है।
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हदीष नंबर:8

*नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का सर मुँडवाना*

{عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ:
"عَقَّ رَسُولُ اللَّهِ اللهُ عَنِ الحَسَنِ بِشَاةٍ وَقَالَ: يَا فَاطِمَةُ ! اِخْلِقِي رَأْسَهُ وَتَصَدَّقِي بِزِنَةِ شَعْرِهِ فِضَّةٌ، فَوَزَنَتُهُ، فَكَانَ وَزْنُهُ دِرْهَمًا أَوْ بَعْضَ دِرْهَمٍ"}
[صحیح سنن ترمذي:١٢٢٦]
तर्जमा: हज़रत 'अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की जानिब (तरफ़) से एक बकरी का 'अक़ीक़ा किया, और हज़रत फ़ातिमा से फ़रमाया कि बच्चे का सर मूंड कर उसके बालों के वज़्न-भर (बराबर/समान) चाँदी सदक़ा करो, उन्होंने बालों का वज़्न किया तो एक दिरहम या उससे कुछ कम थे।
[सहीह सुनन तिर्मिज़ी:1226]

व्याख्या:
 दूसरी हदीष से मा'लूम होता है कि सर मूँडने का 'अमल (काम/कार्य) बच्चे की पैदाइश के सातवें दिन अंजाम दिया जाएगा, सर का बाल उतार देने से सर की सफ़ाई हो जाती है, मसामात (छिद्र/छेद) खुल जाते हैं और मैल-कुचैल भी साफ़ हो जाती है, तिब्बी (medical) नुक़्ता-ए-नज़र (दृष्टिकोण) से इस के और दूसरे फ़वाइद (फ़ाइदे) भी हैं, बाल मूँडने के बा'द उसके हम-वज़्न (समान/बराबर) चाँदी सदक़ा करना चाहिए, ता-कि (इसलिए कि) ग़रीबों और मिस्कीनों की ज़रूरत भी पूरी हो।
 अक्सर (बहुत से) वालिदैन (माँ-बाप) शरी'अत (दीन) की इन ता'लीमात से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित/अनजान) रहते हैं, और 'अक़ीक़ा के दिन ग़ैर-ज़रूरी (फ़ुज़ूल/फ़ालतू) रस्म-ओ-रिवाज की तकमील (पूरा करने) में मसरूफ़ (व्यस्त/busy) रहते हैं, हमारी शरी'अत ने दीगर (अन्य) उमूर (कामों) की तरह बच्चों से मुत'अल्लिक़ (बारे में) हर मोड़ पर रहनुमाई (guidance) की है और उनकी जिस्मानी-व-अख़्लाक़ी (शारीरिक और नैतिक) हर तरह की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ (बारे में) वाज़ेह (स्पष्ट/साफ़) हिदायात दी हैं, इन हिदायात पर 'अमल (पालन) करना और उन्हें बा'इस-ए-ख़ैर-ओ-बरकत तसव्वुर (ख़याल) करना चाहिए, इस में दीन-ओ-दुनिया दोनों की फ़लाह-ओ-कामयाबी (सफलता/भलाई) मुज़्मर (पोशीदा) है।
 आज देखा जाता है कि क्या बच्चे क्या बड़े, बालों के रख-रखाव (देख-भाल) में फ़िल्मी एक्टरों और गाने बजाने वालों की नक़्क़ाली (अनुकरण) में एक दूसरे से आगे भागने की कोशिश में मसरूफ़ (व्यस्त) हैं, उसके पीछे वो अच्छा-ख़ासा (बहुत) पैसा और वक़्त भी बर्बाद करते हैं, ऐसा किसी भी तरह मुनासिब (ठीक/उचित) नहीं है, वालिदैन (माँ-बाप) की यह ज़िम्मेदारी है कि दीगर (अन्य) चीज़ों की निगरानी और देख-रेख के साथ अपने बच्चों और मातहतों (अधीनों) की वज़'-क़त' (वेशभूषा) और उनके बालों की तज़य्युन-ओ-तरतीब (सजावट) पर भी निगाह (नजर) रखें, जब हमारी शरी'अत ने बच्चे की पैदाइश के पहले ही हफ़्ते में उसके बाल को अपनी तवज्जोह (ध्यान) का मरकज़ बनाया तो यह गोया (मानो) इस बात की तरफ़ इशारा है कि बच्चे के वालिदैन (माँ-बाप) आइंदा (भविष्य में) इस चीज़ को अपनी ज़िम्मेदारी में दाख़िल समझें।
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બચ્ચોં કી તરબિયત (પરવરિશ) સે મુતઅલ્લિક ચાલીસ અહાદીસ

બચ્ચોં કી તરબિયત (પરવરિશ) સે મુતઅલ્લિક ચાલીસ અહાદીસ

લેખક: શૈખ અસઅદ આઝમી
(જામિઆ સલફિયા બનારસ)



હદીસ નંબર: 1

નેક બીવી (પત્ની) કા ઇન્તીખાબ (ચયન)

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لِأَرْبَعٍ لِمَالِهَا وَلِحَسَبِهَا وَلِجَمَالِهَا وَلِدِينِهَا، فَاظْفَرْ بِذَاتِ الدِّينِ تَرِبَتْ يَدَاكَ}
[બુખારી: 4700, મુસ્લિમ: 2661]

તરજુમા: હઝરત અબૂ હુરૈરા રઝિયલ્લાહુ અન્હુ સે રિવાયત છે કે નબી કરીમ ﷺ ને ફરમાયા: “ઔરત સે ચાર ચીજોં કી વજહ સે નિકાહ કિયા જાતા હૈ: ઉસ્કે માલ કી વજહ સે, ઉસ્કે ખાનદાની હસબ-ઓ-નસબ કી વજહ સે, ઉસ્કે હુસ્ન-ઓ-જમાલ કી વજહ સે, ઔર ઉસ્કે દીન કી વજહ સે, લેહાઝા તુમ દીનદાર ઔરત સે નિકાહ કરો, કામયાબ હો જાઓગે.”

વ્યાખ્યા:
ઇસ હદીસ મેં બતાયા ગયા હૈ કે લોગ પોતાની શરીક-એ-હયાત (પત્ની) કે ઇન્તીખાબ કે વકત ચાર ચીજોં દેખતે હૈં:
1- માલ-ઓ-દૌલત,
2- ઊંચે ખાનદાન,
3- હુસ્ન-ઓ-જમાલ,
4- દીનદારી।

લેકિન નબી કરીમ ﷺ ને તાકીદ ફરમાઇ હૈ કે પત્ની કા ઇન્તીખાબ કરતી વખતે દીનદારી કો અહમિયત દો। દીનદાર પત્ની હી અસલી સરમાયા હૈ, જિસ પર દુનિયા ઔર આખિરત કી કામયાબી કા દર-ઓ-મદાર હૈ। બાકી તીન ચીજેં દીનદારી કે મુકાબલે મેં કિસી ખાસ અહમિયત નહીં રાખતીં।

નેક બીવી ઘર કે માહોલ કો બહતર બનાવેતી હૈ ઔર ઉસ્કી કોખ સે પેદા હોને વાલી ઔલાદ પર ભી નેકી કે અસરાત હોંગે। દીનદાર ઔરત અપને બચ્ચોં કો અચ્છી તરબિયત દેતી હૈ ઔર ગુમરાહી સે બચાતી હૈ।

ઇસ કે બરઅક્સ, જો ઔરત દીન ઔર અખલાક સે ખાલી હો, તો ના ઘર કા માહોલ બહતર હોતો હૈ ઔર ના હી બચ્ચોં કી સાચી તરબિયત હો પાતી હૈ। જો લોગ સિરફ દુનિયા કી ચમક-દમક, દૌલત ઔર ખૂબસૂરતી કે પીછે ભાગતે હૈં, વો અકસર બાદ મેં પછતાતે હૈં ઔર ઉનકી જિંદગી કા સુકૂન ખરાબ હો જાતો હૈ।

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અલ-અકીદહ

 બિસ્મિલ્લાહિર રહમાનિર રહીમ


અલ-અકીદહ


બિલા શુબહ સારી ત’અરીફ અલ્લાહ હી કે લિએ લાઈક હે. હમ ઉસકી ત'અરીફ કરતે હૈં ઔર ઉસીસે મદદ તલબ કરતે હૈં. ઔર ઉસીકી બારગાહમેં તવબા કરતે હૈ. હમ અપને નફસકી બુરાઈ ઔર હમારે બુરે અ'અમાલકી નહૂસતસે અલ્લાહકી પનાહ ચાહતે હૈં. અલ્લાહ જિસકો હિદાયતદે, ઉસે કોઈ ગુમરાહ નહીં કર સકતા ઔર જિસકો અલ્લાહ ગુમરાહ કર દે, ઉસે કોઈ હિદાયત નહીં દે સકતા. હમ ગવાહી દેતે હૈં કે તન્હા અલ્લાહ કે સિવા કોઈ મ'અબૂદે બરહક નહીં હે. ઉસકા કોઈ હિસ્સેદાર નહીં હે. ઔર હમ ગવાહી દેતે હૈં કે મુહમ્મદ  ઉસકે બંદે ઔર ઉસકે રસૂલ હે. અલ્લાહકી રહમત હો આપ પર ઔર આપ કે ઘરવાલોં પર ઔર આપ ; કે તમામ સાથીયોં ૫૨.

અલ્લાહ તઆલા કુરઆનમેં ફરમાતા હે :


તરજુમાઃ અય ઈમાન વાલો ! અલ્લાહ સે ઈતનાહી ડરો જીતના ઉસસે ડરના ચાહિયે ઔર દેખો મરતે દમ તક મુસલમાન હી રહના. (સૂરઃ આલે ઈમરાન - ૧૦૨)


તરજુમા : અય ઈન્સાનોં ! ડરો અપને રબસે, જિસને તુમકો એક હી જાનસે પયદા ફરમાયા. ઔર ઉસીસે ઉસકા જોળાભી બનાદિયા. ફિર ઉન દોનોસે બહુતસે મર્દ ઔર ઔરત બના કર દુનિયામેં કૈલા દિયે, અલ્લાહ સે ડરતે રહો જિસકે નામ પર રહમકી દરખ્વાસ્ત કરતે હોં (ઔર આપસમેં વાસ્તા દેતે હો ઔર રિશ્તે-નાતેકા ભી ખ્યાલ રખ્ખો ઔર ભૂલો મત કે) અલ્લાહકી તુમ પર કળી નિગરાની હે. (સૂરઃ નિસાઅ-૧)


તરજુમા : અય ઈમાનવાલોં ! અલ્લાહસે ડરો ! ( ઉસકી ઈતાઅત કરતે હુએ) બાત સીધી ઔર ઠીક ઠીક કરો. ઐસા કરોગે, તો અલ્લાહ તુમ્હારે કામ સંવાર દેગા ઔર તુમ્હારે કુસૂર મુઆફ કર દેગા. ઔર (સુન લો) જો કોઈભી કહા માન ગયા અલ્લાહકા ઔર ઉસકે રસૂલકા, તો વો બળી ભારી કામયાબી હાસિલ કર ચુકા. (સૂરઃ અહઝાબ-૭૦)

સબસે સચ્ચી બાત અલ્લાહકી કિતાબ હે. ઔર બેહતરીન રાહ મુહમ્મદ કી રાહ હે. દીને ઈસ્લામમેં સબસે ખતરનાક ઔર બુરી વો ચીઝેં ઔર વો બાતે હેં જિન્હે ઈન્સાનને કુરઆન ઔર હદીષકી રોશનીસે હટકર ખૂદ અપની તરફસે ઘડકર ઈસ્લામમેં દાખિલ કર દી હો. ઐસી હી બાતોંકો બિદઅત કહા જાતા હે. ઔર હર બિદઅત ગુમરાહી હે. ઔર હર ગુમરાહી જહન્નમ મેં લે જાએગી.

ترجمہ قرآن

                    سورہ اخلاص 
شان نزول سنن ترمذی 3364
                      ابی بن کعب 
ترجمہ : ابی بن کعب رضی اللہ عنہ سے روایت ہے، مشرکین نے رسول اللہ ﷺ سے کہا: آپ اپنے رب کا نسب ہمیں بتائیے۔ اس پر اللہ تعالیٰ نے { قُلْ ہُوَ اللَّہُ أَحَدٌ اللَّہُ الصَّمَدُ } ۱؎ نازل فرمائی، اور صمد وہ ہے جو نہ کسی سے پیدا ہوا اور نہ اس سے کوئی پیدا ہواہو، - اس لیے (اصول یہ ہے کہ ) جو بھی کوئی چیز پیدا ہوگی وہ ضرور مرے گی اور جو بھی کوئی چیز مرے گی اس کا وارث ہو گا، اور اللہ عزوجل کی ذات ایسی ہے کہ نہ وہ مرے گی اور نہ ہی اس کاکوئی وارث ہو گا، {وَلَمْ یَکُنْ لَہُ کُفُوًا أَحَدٌ} (اور نہ اس کا کوئی کفو (ہمسر) ہے، راوی کہتے ہیں: کفو یعنی اس کے مشابہ اور برابر کوئی نہیں ہے، اور نہ ہی اس جیسا کوئی ہے۔
                                فضیلت
 عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ أَنَّ رَجُلًا سَمِعَ رَجُلًا يَقْرَأُ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ يُرَدِّدُهَا فَلَمَّا أَصْبَحَ جَاءَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ وَكَأَنَّ الرَّجُلَ يَتَقَالُّهَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ إِنَّهَا لَتَعْدِلُ ثُلُثَ الْقُرْآنِ۔ بُخاری 5013
حضرت ابو سعید خدری رضی اللہ عنہ نے کہ ایک صحابی ( خود ابو سعید خدری ) نے ایک دوسرے صحابی ( قتادہ بن نعمان رضی اللہ عنہ ) اپنے ماں جائے بھائی کو دیکھا کہ وہ رات کو سورۃ قل ھو اللہ بار بار پڑھ رہے ہیں ۔ صبح ہوئی تو وہ صحابی ( ابو سعید رضی اللہ عنہ ) رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی خدمت میں حاضر ہوئے اور آنحضرت سے اس کا ذکر کیا گویا انہوں نے سمجھا کہ اس میں کوئی بڑا ثواب 
نہ ہوگا ۔ آنحضرت نے فرمایا کہ اس ذات کی قسم جس کے ہاتھ میں میری جان ہے ! یہ سورت قرآن مجید کے ایک تہائی حصہ کے برابر ہے۔

جو سورہ اخلاص سے محبت کرتا ہے اللہ اس سے محبت کرتا ہے
عَنْ عَائِشَةَ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَعَثَ رَجُلًا عَلَى سَرِيَّةٍ وَكَانَ يَقْرَأُ لِأَصْحَابِهِ فِي صَلَاتِهِمْ فَيَخْتِمُ بِقُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ فَلَمَّا رَجَعُوا ذَكَرُوا ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ سَلُوهُ لِأَيِّ شَيْءٍ يَصْنَعُ ذَلِكَ فَسَأَلُوهُ فَقَالَ لِأَنَّهَا صِفَةُ الرَّحْمَنِ وَأَنَا أُحِبُّ أَنْ أَقْرَأَ بِهَا فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخْبِرُوهُ أَنَّ اللَّهَ يُحِبُّهُ
بُخاری 7375
ام المؤمنین عائشہ رضی اللہ عنہ عنہما کی پرورش میں تھیں۔ انہوں نے عائشہ رضی اللہ عنہ سے بیان کیا کہ نبی کریم صلی اللہ علیہ وسلم نے ایک صاحب کو ایک مہم پر روانہ کیا ۔ وہ صاحب اپنے ساتھیوں کو نماز پڑھاتے تھے اور نماز میں ختم قل ھو اللہ احد پر کرتے تھے ۔ جو لوگ واپس آئے تو اس کا ذکر آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم سے کیا ۔ آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ ان سے پوچھو کہ وہ یہ طرز عمل کیوں اختیار کئے ہوئے تھے۔ چنانچہ لوگوں نے پوچھا تو انہوں نے کہا کہ وہ ایسا اس لیے کرتے تھے کہ یہ اللہ کی صفت ہے اور میں اسے پرھنا عزیز رکھتا ہوں ۔ آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ انہیں بتا دوں کہ اللہ بھی انہیں عزیز رکھتا ہے ۔


"سورۃ اخلاص کی تلاوت جنّت میں جانے کا ذریعہ ہے"
هُرَيْرَةَ قَالَ أَقْبَلْتُ مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَسَمِعَ رَجُلًا يَقْرَأُ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ اللَّهُ الصَّمَدُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَجَبَتْ قُلْتُ وَمَا وَجَبَتْ قَالَ الْجَنَّةُ قَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ غَرِيبٌ لَا نَعْرِفُهُ إِلَّا مِنْ حَدِيثِ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ وَابْنُ حُنَيْنٍ هُوَ عُبَيْدُ بْنُ حُنَيْنٍ
بُخاری 2897
ترجمہ : ابوہریرہ رضی اللہ عنہ کہتے ہیں کہ میں نبی اکرمﷺ کے ساتھ آیا ، آپ نے وہاں ایک آدمی کو 'قل ہو اللہ أحد اللہ الصمد' پڑھتے ہوئے سنا، تو رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:' واجب ہوگئی'۔ میں نے کہا : کیا چیز واجب ہوگئی؟ آپ نے فرمایا:'جنت (واجب ہوگئی )'

જાન દે દેના શિર્ક સે આસાન હૈ

જાન દે દેના શિર્ક સે આસાન હૈ



*હઝરત અબુ દર્દા રઝી*. સે રિવાયત. તે ઉન્હોને  કહા મેરે   જીગરી દોસ્ત રસુલુલ્લાહ  ( ﷺ) ને   નસીહત કરતે હુએ ફરમાયા કે અલ્લાહ કે સાથ કિસી ચિઝ કો શરીક ન  કરના  અગરચે તુઝે ટુકડે  ટુકડે કર દિયા યા તુઝે જલા દિયા જાથે,


ઔર ફર્ઝ નમાઝ જાન બૂઝકર મત છોડના જીસ ને ફર્ઝ નમાઝ  જાન બુઝ કર છોડ દિયા તો ઉસે (અલ્લાહ કી હિફાજત કા) ઝિમમા ખતમ હો જાતા હૈ ઔર શરાબ ન પીના ક્યુ કે શરાબ હર બુરાઈ કી ચાબી હૈ
،‏‏‏‏ عَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ،‏‏‏‏ قَالَ:‏‏‏‏ أَوْصَانِي خَلِيلِي صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْلَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ شَيْئًا،‏‏‏‏ وَإِنْ قُطِّعْتَ وَحُرِّقْتَ،‏‏‏‏ وَلَا تَتْرُكْ صَلَاةً مَكْتُوبَةً مُتَعَمِّدًا،‏‏‏‏ فَمَنْ تَرَكَهَا مُتَعَمِّدًا فَقَدْ بَرِئَتْ مِنْهُ الذِّمَّةُ،‏‏‏‏ وَلَا تَشْرَبْ الْخَمْرَ،‏‏‏‏ فَإِنَّهَا مِفْتَاحُ كُلِّ شَرٍّ.
(ઇબ્ને માઝા 4034)

હદીસે સે પાક સે માલુમ હુઆ કે તૌહિદ કે લિયે જાન ભી કુર્બાન કરની પડે તો સઆદત હૈ દુસરી બાત યે માલુમ હુઈ કે શિર્ક કે બાદ સબસે બડા ગુના નમાઝ કા છોડના હૈ જો કુફર કે બરાબર હે તીસરી બાત યે માલુમ હુઈ કે અકલ અલ્લાહ કી બહોત બડી નેઅમત હૈ નશા વાલી ચિઝ ઇસ્તિમાલ કર કે ઈસ નેઅમત ખરાબ કરના અલ્લાહ કી ના શુક્રી હૈ..

*મકતબા અલ ફૂર્કાન સમી ગુજરાત-*