*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ चालीस अहादीस*
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लेखक: शैख़ अस'अद आज़मी
(जामि'आ सलफ़िया बनारस)
हिंदी अनुवाद: अब्दुल मतीन सैयद
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हदीष नंबर:1
नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(1)
{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لَأَرْبَعِ لِمَالِهَا وَلِحَسَبِهَا وَلِجَمَالِهَا وَ لِدِينِهَا، فَاظْفَرُ بِذَاتِ الدِّيْنِ تَرِبَتْ يَدَاكَ.}
[بخاری:٤٧٠۰ ، مسلم:٢٦٦١]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: 'औरत से चार चीज़ों की वज्ह (कारण) से निकाह (विवाह) किया जाता है: उसके माल की वज्ह (कारण) से, उसके ख़ानदानी हसब-ओ-नसब की वज्ह से, उसके हुस्न-ओ-जमाल (ख़ूबसूरती/सुंदरता) की वज्ह से, और उसके दीन की वज्ह (कारण) से, लिहाज़ा (इसलिए) तुम दीन-दार 'औरत (महिला) से (शादी कर के) कामयाबी (सफलता) हासिल करो, तुम्हारे हाथ ख़ाक-आलूद हों।
[सहीह बुख़ारी:4700, सहीह मुस्लिम:2661]
व्याख्या:
इस हदीष में बताया गया है कि लोग अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त अपनी होने वाली बीवी (पत्नी) के अंदर चार चीज़ें तलाश करते हैं 1-माल-ओ-दौलत वाली हो, 2-ऊँचे-घराने की हो, 3-ख़ूबसूरत हो, 4-दीन-दार हो।
लेकिन मुसलमानों को हमारे नबी ﷺ ने यह ताकीद की (अनुरोध किया) है कि बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त सिर्फ़ उसकी दीन-दारी को देखें, दीन-दार बीवी को अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी/life partner) बनाएं, क्यूँकि (इसलिए कि) अस्ल (वास्तविक) सरमाया (धन-दौलत/पुंजी) दीन ही है जिस पर दुनिया-ओ-आख़िरत की कामयाबी (सफलता) का दार-ओ-मदार है, बाक़ी तीनों चीज़ें दीन-दारी के मुक़ाबले में कोई ख़ास अहमियत (महत्व) नहीं रखतीं।
नेक बीवी पूरे घर के माहौल (वातावरण) को बेहतर बनाएगी, इस के साथ ही उसके बत्न (कोख/पेट) से जन्म लेने वाली औलाद पर भी नेकी के आसार (गुण) होंगे, दीन-दार और नेक 'औरत (महिला) अपने बच्चों को भी गुमराही के रास्ते पर नहीं छोड़ेगी, बल्कि (किंतु) उन को अच्छी तर्बियत (परवरिश) देगी।
इस के बर-'अक्स (उल्टा/विरुद्ध) दीन-ओ-अख़्लाक़ (अच्छे आचरण/शिष्टाचार) से 'आरी (वंचित) 'औरत से न घर का माहौल बेहतर होगा और न ही वो अपने बच्चों को भलाई और नेकी के रास्ते पर चलने की तर्बियत (शिक्षा) दे सकेगी, जो लोग दुनिया की चमक-दमक और उसकी रंगीनियों में महव (मगन/मस्त) होकर बीवी या बहू के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त दीन-दारी के पहलू (उद्देश्य) को नज़र-अंदाज़ कर देते हैं और बड़े घरानों (ख़ानदानों) गोरी-चमड़ी (गोरा रंग) और माल-ओ-दौलत के पीछे भागते हैं वो अक्सर (बहुत बार) बा'द में पछताते हैं और उनकी ज़िंदगी का सुकून दरहम-बरहम हो जाता है, हम अपने गिर्द-ओ-पेश (आसपास) का जाइज़ा लें तो इस की मुत'अद्दिद (कई/अनेक) मिसालें मिल जाएंगी।
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हदीष नंबर:2
नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(2)*
{عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ :
تَخَيَّرُوا لِنُطَفِكُمْ، فَانْكِحُوا الْأَكْفَاءَ وَأَنْكِحُوا إِلَيْهِمْ}
[ابن ماجه:١٩٥٨ - صحيح الجامع:۲۹۲۸]
तर्जमा: हज़रत 'आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: अपने नुत्फ़े (औलाद) के लिए बेहतर (बीवी/पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice) करो, और कुफ़ू से शादी करो और कराओ।
[इब्ने माजा:1958, सहीह अल-जामे':2928]
व्याख्या:
अपनी होने वाली औलाद की बेहतरी और भलाई की फ़िक्र (चिंता) इंसान को शादी से पहले और बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त (समय) ही से होनी चाहिए, इस बात को इस हदीष में एक नए और तमसीली (मिसाली) उस्लूब (शैली/अंदाज़) में बयान किया गया है, जिस तरह यह बात मुसल्लम (साबित-शुदा) है कि अच्छी और ज़रख़ेज़ (उपजाऊ) ज़मीन ही से अच्छी खेती और अच्छी पैदावार होती है और महज़ (केवल) बीज का अच्छा होना काफ़ी नहीं, इसी तरह अच्छी और सालेह (नेक) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए नेक-सीरत बीवी ज़रूरी है, सिर्फ़ (केवल) शौहर (husband) का नेक और सालेह (परहेज़गार) होना काफ़ी (बस/पर्याप्त) नहीं।
निकाह के बाद शौहर बीवी से मुजाम'अत (हमबिस्तरी) के ज़री'आ (द्वारा) उसके रहिम (गर्भ) में अपना नुतफ़ा (वीर्य) मुंतक़िल करता है, यह मनी' (वीर्य) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए बीज की हैसियत रखती है और 'औरत का रहिम (गर्भ) उसके लिए ज़मीन और खेत का दर्जा रखता है, इस रहिम (गर्भ) और इस ज़मीन की अच्छाई और ख़राबी इससे पैदा होने वाली शय (वस्तु) पर ज़रूर असर-अंदाज़ होगी, बद-'अक़ीदा (बे-दीन) बद-ख़ुल्क़ (बद-अख़्लाक़) बद-चलन (बद-कार) और दूसरी ख़राबियों में मुब्तला (व्यस्त) 'औरत से सालेह (पाक-दामन) पाकबाज़ (परहेज़गार) और नेक औलाद की तवक़्क़ो' (उम्मीद) नहीं की जा सकती ऐसी 'औरत ख़ुद अपने शौहर (पति/husband) के लिए मुसीबत और दर्द-ए-सर (उलझन) रहती है, अगर वो मालदार, ख़ूबसूरत और नामी-गिरामी (मशहूर) घराने की भी हो तो अपने शौहर को सुकून हम (आदि) नहीं पहुंचा सकती, चे जाए कि (बड़ी बात है कि) उसके लिए ऐसी औलाद जने जो उसकी आँखों की ठंडक और उसके दिल के सुरूर (मन की ख़ुशी) का ज़री'आ बने।
क़ुरआन-ए-करीम ने:
{لِلْخَبِيثِينَ وَالخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَاتِ، وَالطَّيِّبَاتُ لِلطَّيِّبِينَ وَالطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَاتِ}
[سوره نور:٢٦]
तर्जमा: ख़बीस (नापाक) 'औरतें ख़बीस (नापाक) मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और ख़बीस मर्द ख़बीस 'औरतों के लाइक़ हैं और पाक 'औरतें पाक मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और पाक मर्द पाक 'औरतों के लाइक़ हैं।
[सूरा अन्-नूर:26]
के ज़री'आ (द्वारा) लोगों को मुतनब्बे (सावधान) कर दिया गया है कि अच्छे लोग अच्छी और पाक-दामन 'औरतों ही को रिश्ता-ए-इज़दिवाज (निकाह) में मुंसलिक (शामिल) करें, इस तरह एक सालेह (नेक) और पाकबाज़ ख़ानदान और मु'आशरा (समाज) का क़ियाम मुमकिन (संभव) हो सकेगा, जिस में पलने बढ़ने वाले अफ़राद नेक-सीरत और 'उम्दा (अच्छी) ख़सलत ('आदत/स्वभाव) वाले होंगे।
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हदीष नंबर:3
नेक बीवी (पत्नी) के कुछ और औसाफ़ (ख़ूबियाँ)*
{عَنْ مَعْقِلِ بْنِ يَسَارٍ قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَقَالَ :
إِنِّي أَصَبْتُ امْرَأَةً ذَاتَ حَسَبٍ وَمَنْصِبٍ إِلَّا أَنَّهَا لَا تَلِدُ أَفَاتَزَوَّجُهَا؟ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّانِيَةَ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّالِثَةَ فَهَاهُ، فَقَالَ: تَزَوَّجُوا الوَدُودَ الوَلُوُدَ، فَإِنِّي مُكَاثِرٌ بِكُمُ الأمم}
[سنن نسائی:۳۱۷۵ ، ابو داود:١٧٥٤ - صحيح الجامع:٢٩٤٠]
तर्जमा: माक़िल बिन यसार रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक आदमी रसूल ﷺ के पास आया और कहा: एक शरीफ़ ख़ानदान और क़द्र-ओ-मंज़िलत ('इज़्ज़त) वाली ख़ातून (महिला) के बारे में मुझे जानकारी मिली है मगर उसके यहाँ पैदाइश नहीं होती, क्या मैं उससे शादी कर लूं ? आप ﷺ ने उनको मना' फ़रमाया, वो दोबारा (दूसरी बार) आए और सेह-बारा (तीसरी बार) आए और आप ﷺ ने मना' फ़रमाया और कहा कि ज़्यादा मोहब्बत करने वाली और ज़्यादा बच्चे जनने वाली 'औरत से शादी करो, क्यूँकि (इसलिए कि) में (क़ियामत के दिन) दूसरी क़ौमों के मुक़ाबले में तुम्हारी कसरत (ज़यादती) पर फ़ख़्र (गर्व) करूंगा।
[सुनन नसाई:3175, अबू दाऊद:1754, सहीह अल-जामे':2940]
व्याख्या:
इस हदीष में सराहत (वज़ाहत) से यह बात बयान कर दी गई कि शादी के मक़ासिद (उद्देश्य) में अहम (महत्वपूर्ण) मक़्सद औलाद का हुसूल (प्राप्ति) भी है, शादी महज़ (केवल/सिर्फ़) जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) या बीवी (पत्नी) और ससुराल वालों के मक़ाम-ओ-मर्तबा (प्रतिष्ठा/पद) से इस्तिफ़ादा (नफ़ा' उठाने) के लिए नहीं होती, इसलिए अगर क़राइन (आसार/लक्षण) वग़ैरा से 'औरत का बाँझपन मा'लूम हो जाए तो उससे शादी से इज्तिनाब (किनारा-कशी/उपेक्षा) कर के ऐसी 'औरत का इंतिख़ाब (choice/चयन) किया जाए जिस के अंदर अफ़्ज़ाइश-ए-नस्ल (संतान-वृद्धि) की इस्तिता'अत (क्षमता) हो।
हदीष नंबर (1) की तरह इस हदीष में भी बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के मे'यार (जाँच/परख) की निशान-दही (पहचान) की गई है और 'अवाम (जनता/public) में राइज (प्रचलित/जारी) मे'यार (तरीक़ा/प्रणाली) पर न जाने की ताकीद की गई है, मुस्लिम घरानों में औलाद की कसरत (ज़्यादती/अधिकता) शरी'अत (दीन) को मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है क्यूंकि (इसलिए कि) क़ियामत के दिन जब तमाम अंबिया अपनी अपनी उम्मतों के साथ आएंगे तो उम्मत-ए-मुहम्मदिय्या उन सब के बीच सबसे बड़ी उम्मत होगी और यह चीज़ हमारे नबी के लिए बा'इस-ए-इफ़्तिख़ार (सम्मान का कारण) होगी।
इस में कोई शक नहीं कि औलाद की कसरत (ज़्यादती) के साथ उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) भी शर'ई मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है, नेक, दीन-पसंद और आ'ला (श्रेष्ठ/'उम्दा) अख़्लाक़-ओ-सिफ़ात (आचरण) के हामिल लोगों पर ही फ़ख़्र (गर्व) किया जाता है और उनकी मौजूदगी (हाज़िरी) से ख़ुशी और मसर्रत (प्रसन्नता) होती है, न कि दीन-बेज़ार (दीन से निराश) और सीरत-ओ-किरदार (चाल-चलन) से तेही-दस्त (महरूम) लोगों से, इसलिए औलाद की कसरत (ज़्यादती) को तर्बियत (ता'लीम) के 'अमल से जुदा (अलग) कर के नहीं देखा जाना चाहिए, जिस तरह औलाद की कसरत शर'ई मतलूब (ज़रूरी) है ठीक उसी तरह उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) मतलूब (ज़रूरी) है, अलहम्दुलिल्लाह इस वक़्त (समय) ता'दाद (संख्या) के ए'तिबार से मुसलमान 'ईसाईयों (christians) के बा'द दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं, मगर उन में इस्लामी तर्बियत (शिक्षा) की बड़ी कमी है, जिस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने की सख़्त (बहुत) ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:4
जिमा' (हमबिस्तरी) के वक़्त की दु'आ और तर्बियत (शिक्षा/ता'लीम)*
{عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: "لَوْ أَنَّ أَحَدَكُمْ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْتِيَ أَهْلَهُ قَالَ: بِسْمِ اللَّهِ للَّهُمَّ جَنِّبْنَا الشَّيْطَانَ وَجَنبِ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا ، فَإِنَّهُ إِنْ يُقَدَّرُ بَيْنَهُمَا وَلَدٌ فِي ذَلِكَ لَمْ يَضُرَّهُ شَيْطَانٌ"}
[بخاری:٣٢٧۱ ، مسلم:١٤٣٤]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम में से कोई आदमी अपनी बीवी (पत्नी) से जिमा' (हमबिस्तरी) का इरादा करे और यह दु'आ पढ़ ले "शुरू' करता हूं अल्लाह के नाम से, ऐ अल्लाह तू हमें शैतान से महफ़ूज़ (सुरक्षित) रख और शैतान को इस चीज़ (औलाद) से दूर रख जो तू हमें 'अता करे तो अगर उस जिमा' (हमबिस्तरी) से उनकी तक़दीर में औलाद लिखी होगी तो शैतान उसको नुक़्सान नहीं पहुंचाएगा"।
[सहीह बुख़ारी:3271, सहीह मुस्लिम:1434]
व्याख्या:
बच्चों की तर्बियत (परवरिश) और उनकी इस्लाह-ओ-फ़लाह पर ध्यान देने के मवाक़े' (मौक़े'/अवसर) में से एक मौक़ा' यह भी बताया गया है कि जिमा' (संभोग) और हमबिस्तरी को सिर्फ़ जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) का ज़री'आ (माध्यम) न समझा जाए बल्कि (किंतु) उस मौक़ा' (अवसर) पर भी इंसान अल्लाह को याद रखे, साथ ही अपनी आने वाली औलाद की शैतान से हिफ़ाज़त को भी मद्द-ए-नज़र (सामने) रखे, उसके लिए मज़कूरा दु'आ का विर्द करने (दोहराने/पढ़ने) की उसको हिदायत (रहनुमाई) की गई है और इसका फ़ाइदा यह बतलाया गया है कि अगर इस जिमा' (हमबिस्तरी) के नतीजे में कोई बच्चा वुजूद (अस्तित्व) में आता है तो वो शैतान के शर (शरारत/बुराई) से महफ़ूज़ (सुरक्षित) होगा।
शरी'अत की नज़र में बच्चे का तहफ़्फ़ुज़ (हिफ़ाज़त) और शैतान और शैतानी आ'माल-व-हरकात (काम) से उसे बचाना किस-क़दर (कितना) अहम (ज़रूरी) है इसका अंदाज़ा (अनुमान) इस हदीष से लगाया जा सकता है, शरी'अत (दीन) की हकीमाना (हिकमत से भरी) निगाहें (नज़रें) बहुत दूर तक देखती हैं, अल्लाह रब्ब-उल-'इज़्ज़त इंसान और सारी काइनात का ख़ालिक़ है मख़्लूक़ के नफ़-ओ-नुक़्सान और सलाह-ओ-फ़साद (भलाई और बिगाड़) को उससे बेहतर कौन समझ सकता है, यह उसका 'ऐन (ख़ास) एहसान है कि उसने अपने बंदों को शरी'अत के नूर (रोशनी) से नवाज़ा है और ऐसे बेशुमार (असंख्य) हक़ाइक़ (सच्चाई) से आगाह (सूचित/alert) किया है जिन (जिस) का उन्हें क़त'अन (हरगिज़/बिल्कुल) 'इल्म नहीं था।
आज नाफ़रमान और बे-राह (गुमराह) औलाद की कसरत (भरमार) से हमारा मु'आशरा (समाज) शाकी (फ़रियादी) है, नई-नस्ल की अकसरिय्यत (बहुसंख्यक/majority) शैतान के नस्ब-कर्दा (लगाईं हुई) जाल में बड़ी तेज़ी से फँसती जा रही है, इसके अस्बाब (कारण) में से एक अहम (मुख्य) सबब (कारण) मज़कूरा हिदायत-ए-नबवी (हमबिस्तरी के समय की दु'आ) से ग़ाफ़िल (बे-ख़बर) होना ज़ाहिर (स्पष्ट) है, और यह कहना मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) होगा कि शादी-शुदा जोड़ों की अकसरिय्यत (majority/बहुसंख्यक) इन ता'लीमात-व-हिदायात (मार्ग-दर्शन) से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित) है लिहाज़ा (इसलिए) इस पर 'अमल का सवाल ही कहां पैदा होता है।
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हदीष नंबर:5
बच्चे के लिए जीने का हक़*
{عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ!
أَيُّ الذَّنْبِ أَعْظَمُ؟ قَالَ :
أَنْ تَجْعَلَ لِلَّهِ نِدًّا وَهُوَ خَلَقَكَ، قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تَقْتُلَ وَلَدَكَ خَشْيَةَ أَنْ يَطْعَمَ مَعَكَ. قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تُزَانِي حَلِيْلَةَ جَارِكَ}
[بخاری:٦٠٠١ ، مسلم:٢٥٧]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ से कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! सबसे बड़ा गुनाह कौन सा है ? आप ने फ़रमाया: सबसे बड़ा गुनाह यह है कि तुम अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराओ, हालांकि अल्लाह ही ने तुम को पैदा किया है, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: यह है कि तुम अपने बच्चों को इस डर से क़त्ल कर दो कि वो भी तुम्हारे साथ खाएंगे, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: वो यह है कि तुम अपनी पड़ोसन के साथ ज़िना (बद-कारी/व्यभिचार) करो।
[सहीह बुख़ारी:6001, सहीह मुस्लिम:257]
व्याख्या:
इस हदीष में शिर्क के बा'द सबसे बड़ा गुनाह यह बतलाया गया है कि आदमी अपनी औलाद (संतान) को इस डर से क़त्ल कर दे कि वो ज़िंदा रहेगी तो खाने पीने में वो भी शरीक (शामिल) होगी जिस से वो मु'आशी (आर्थिक) तंगी में मुब्तला (ग्रस्त) हो जाएगा, इस्लाम से क़ब्ल (पहले) इस क़बीह-फ़े'ल (बुरे काम) का बा'ज़ (कुछ) लोग इर्तिकाब (पाप/गुनाह) करते थे, इसी वज्ह (कारण) से क़ुरआन-ए-करीम में भी सराहत (वज़ाहत) से इस का तज़्किरा (बयान) कर के इस से रोका गया है और यह कहा गया है कि सबको रिज़्क़ (रोज़ी) फ़राहम (उपलब्ध) करने वाले हम हैं।
दर-हक़ीक़त (वास्तव में) यह 'अमल (काम) बल्कि (किंतु) यह तसव्वुर (ख़याल) ही इंसान की माद्दा-परस्ती (materialism/मुंकिर-ए-ख़ुदा) और उसके हिर्स-ओ-हवस (लालच और इर्ष्या) की इंतिहा (हद/सीमा) को पहुंचने की 'अलामत (निशानी) है, आज की मुहज़्ज़ब (शिक्षित) और तरक़्क़ी-याफ़ता (विकसित) दुनिया में इस तसव्वुर (ख़याल/योजना) को सरकारी सरपरस्ती (समर्थन/सहायता) हासिल हो चुकी है और मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) बहानों से इस्क़ात-ए-हमल (गर्भपात/abortion) और दूसरे तरीक़ों से बच्चों के क़त्ल-ए-'आम का सिलसिला जारी है, फिर भी दुनिया हुक़ूक़-ए-इंसानी (human rights) और हुक़ूक़-ए-अतफ़ाल (बच्चों के अधिकार) का ढँडोरा पीटती है और अपने आप को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन (civilization/culture) का 'अलम-बरदार (प्रचारक) और इंसानियत (मानवता) का सबसे बड़ा बही-ख़्वाह (ख़ैर-ख़्वाह/शुभचिंतक) मानती है।
इस्लाम ने आज से चौदह-सौ (1400) साल पहले इस फ़ासिद (ख़राब) नज़रिये (ideologies) की क़बाहत (बुराईयों) को आशकारा (व्यक्त/ज़ाहिर) करते हुए इस मज़मूम-हरकत (बुरे 'अमल) पर पाबंदी लगा दी थी और बच्चों को ज़िंदा रहने का न सिर्फ़ हक़ (अधिकार) 'अता किया बल्कि उनको जुमला (सब/समग्र) इंसानी-हुक़ूक़ (मानवीय अधिकार) से नवाज़ा।
इस हदीष के ज़री'ए (द्वारा) गोया (मानो) अल्लाह के रसूल ﷺ ने लोगों को यह बावर (भरोसा) कराया है कि कभी अपनी औलाद को अपने लिए बोझ न तसव्वुर (ख़याल) करो, और इस फ़िक्र (चिंता) से परेशान न रहो कि मैं उनको कहां से खिलाने पिलाने और दीगर (अन्य) ज़रूरियात का इंतिज़ाम (बंदोबस्त) करूंगा, जिस ज़ात (हस्ती) ने आप को रिज़्क़ (रोज़ी/खाना) फ़राहम (उपलब्ध) किया है वही उनको भी फ़राहम (उपलब्ध) करेगी, अगर इस तसव्वुर (ख़याल) से मुँह मोड़ कर तुम उनसे हक़-ए-हयात (जीने का अधिकार) सल्ब करने (छीन लेने) के मुजरिम (दोषी) पाए गए तो तुम बहुत बडे़ गुनाह के मुर्तकिब (अपराधी) माने जाओगे और अल्लाह के 'अज़ाब से तुम्हें दो-चार होना पड़ेगा।
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हदीष नंबर:6
खजूर चबा कर मुँह में देना*
{عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ:
وُلِدَ لِي غُلَامٌ، فَآتَيْتُ بِهِ النَّبِيُّ اللهِ، فَسَمَّاهُ إِبْرَاهِيمَ ، فَحَنَّكَهُ بِتَمْرَةٍ وَدَعَا لَهُ بِالْبَرَكَةِ ، وَدَفَعَهُ إِلَيَّ ، وَكَانَ أَكْبَرَ وَلَدِ أَبِي مُوسَى}
[بخاری:۵۷۳۰ ، مسلم:۳۹۹۷]
तर्जमा: हज़रत अबू मूसा अश'अरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है वो कहते हैं कि मेरे यहाँ एक बच्चा पैदा हुआ, मैं उस बच्चे को लेकर नबी-ए-करीम ﷺ की ख़िदमत (सेवा) में हाज़िर हुआ, आप ﷺ ने उसका नाम इब्राहीम रखा, खजूर चबा कर उसके मुंह में रखा, उसके लिए बरकत की दु'आ की और उसके बा'द उसे मेरे हवाले किया, यह अबू मूसा के सबसे बड़े साहब-ज़ादे (बेटा) थे।
[सहीह बुख़ारी:5730, सहीह मुस्लिम:3997]
व्याख्या:
इस मफ़्हूम (अर्थ/meaning) की मुत'अद्दिद (अनेक/कई) हदीषें हैं जिन से मा'लूम होता है कि सहाबा-ए-किराम अपने नौ-मौलूद (newborn/नवजात) बच्चों को नबी ﷺ के पास ले जाते, आप ﷺ अपनी गोद में बच्चों को लेते और खजूर या छूहारा (dried date) वग़ैरा अपने मुंह में चबा कर उस बच्चे के मुंह में डालते और उसकी ख़ैर-ओ-भलाई के लिए दु'आ भी फ़रमाते।
बच्चों की अच्छी तर्बियत (शिक्षा) और इस्लामी आदाब-ओ-ता'लीमात से उन्हें जोड़े रखने की कोशिश में से एक कोशिश यह भी है कि पैदाइश के बा'द किसी नेक-ओ-सालेह (परहेज़गार) शख़्स के मुंह से चबाई हुई चीज़ उस बच्चे के मुंह में डाली जाए, हो सकता है कि उस बुज़ुर्ग के सलाह-ओ-तक़्वा (परहेज़-गारी) का असर बच्चे पर भी आए, बच्चे के बत्न (पेट) में पहुंचने वाली इब्तिदाई (शुरू'आती) ग़िज़ाओं (भोजन) में पाक-तीनत (अच्छे आचरण वाले) लोगों के लु'आब-ए-दहन (थूक/saliva) का पहुंचाना उसको हमेशा पाक और हलाल रोज़ी खिलाने की स'ई (कोशिश) का भी इशारा (संकेत) है, इसी तरह 'आलिम-ए-बा-'अमल और सालेह (नेक) शख़्स से बच्चे के हक़ में ख़ैर-ओ-बरकत की दु'आ कराना भी इसी नुक़्ता-ए-नज़र से है।
ग़ौर करें कि किन किन तरीक़ों से शरी'अत बच्चों की अच्छी तर्बियत (परवरिश) का इंतिज़ाम करती है और इस चीज़ पर किस-क़दर (कितनी) तवज्जोह (ध्यान) सर्फ़ (उपयोग) करती है, क्या मुस्लिम मु'आशरों (societys) में नौ-मौलूद (नवजात/newborn) बच्चों के साथ ऐसा एहतिमाम (बंदोबस्त) किया जाता है ? और क्या मुस्लिम वालिदैन (माँ-बाप) अपने बच्चों की तर्बियत (परवरिश) के त'अल्लुक़ (संबंध) से इतने मुतफ़क्किर (फ़िक्र-मंद/चिंतित) नज़र आते हैं ? अगर नहीं तो इस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने और इस हदीष में मज़कूर (वर्णन/उल्लेखित) 'अमल को अपने घरों और अपने बच्चों पर नाफ़िज़ (लागू/जारी) करने की ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:7
नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का 'अक़ीक़ा*
{عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنُدُبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ :
كُلُّ غُلَامٍ رَهِينَةٌ بِعَقِيقَتِهِ تُذْبَحُ عَنْهُ يَوْمَ سَابِعِهِ وَيُسَمِّى فِيهِ وَيُحْلَقُ رَأْسُهُ}
[ترمذی:١٤٤٢ ، ابو داود:٢٤٥٥ ، نسائی:٤١٤٩ , ابن ماجه:٣١٥٦، احمد:۱۹۲۲۵- صحيح الجامع:٤٥٤١]
तर्जमा: हज़रत समुरा बिन जुंदुब रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: हर बच्चा अपने 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) गिरवी होता है, सातवें दिन उसकी तरफ़ से 'अक़ीक़ा किया जाएगा, उसी रोज़ (दिन) उसका नाम रखा जाएगा और उसका सर मूनडा जाएगा।
[तिर्मिज़ी:1442, अबू दाऊद:2455, नसाई:4149, इब्ने माजा:3156, अहमद:19225, सहीह अल-जामे':4541]
व्याख्या:
बच्चे की पैदाइश (जन्म) के बा'द उसकी जिस्मानी (शारीरिक) और अख़्लाक़ी (नैतिक) व ईमानी तर्बियत (परवरिश) के सिलसिले की एक कड़ी यह भी है कि सातवें दिन उसकी जानिब (तरफ़) से 'अक़ीक़े का जानवर ज़ब्ह किया जाए, उसका नाम रखा जाए और उसके सर का बाल मूनडा जाए, 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) बच्चे के गिरवी होने का कई मतलब बयान किया गया है जिस में एक राजेह (सहीह) मतलब इमाम अहमद बिन हंबल का बयान-कर्दा (किया हुआ) है कि इससे मुराद वालिदैन (माँ-बाप) की सिफ़ारिश है, या'नी अगर उस बच्चा का 'अक़ीक़ा न किया गया और वो बचपन ही में इंतिक़ाल (निधन/मृत्यु) कर गया तो वो बच्चा अपने वालिदैन (माँ-बाप) के हक़ में सिफ़ारिश नहीं करेगा।
[تحفة الاحوذی:95,94/5]
'अक़ीक़ा एक इस्लामी शि'आर (तरीक़ा) और नबी-ए-करीम ﷺ की सुन्नत है, बच्चे की तरफ़ से 'अक़ीक़ा में दो बकरा या बकरी और बच्ची की तरफ़ से एक बकरा या बकरी ज़ब्ह करना मसनून (जायज़) है, अलबत्ता (लेकिन) बच्चे (लड़के) की तरफ़ से एक जानवर भी ज़ब्ह करना साबित है।
'अक़ीक़ा सातवें दिन करना मसनून (जायज़) है, बिला-किसी शदीद (सख़्त) 'उज़्र (मजबूरी) के इस को टालना मुनासिब (ठीक) नहीं, अगर किसी वज्ह (कारण) से सातवें दिन 'अक़ीक़ा न किया जा सका तो बा'द में जब मुयस्सर (संभव/उपलब्ध) हो कर लिया जाए, अलबत्ता (लेकिन) हत्तल-इमकान (जहाँ तक मुम्किन हो) जल्दी करनी चाहिए।
'अक़ीक़ा के फ़वाइद (फ़ाइदे) मुत'अद्दिद (अनेक) हैं, बा'ज़ (कुछ/चंद) फ़वाइद (फ़ाइदे) बयान करते हुए इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह लिखते हैं कि नौ-मौलूद (newborn/नवजात) की आमद (आने) के मौक़ा' (अवसर) पर यह जानवर ज़ब्ह किया जाता है, इस का फ़ाइदा यह है कि बच्चे को गिरवी रहने से नजात (छुटकारा) दिलाता है, 'अक़ीक़ा बाप को औलाद की सिफ़ारिश मुयस्सर (उपलब्ध) कराता है, 'अक़ीक़ा बच्चे का फ़िदया है जो बच्चे को शैतान के शर (शरारत) से बचाता है, 'अक़ीक़े का एक फ़ाइदा यह भी है कि उसकी वज्ह (कारण) से सातवें दिन दोस्त-ओ-अहबाब और 'अज़ीज़-ओ-अक़ारिब (रिश्तेदार) जम' (इकट्ठा) होते हैं और बच्चे को दु'आ-व-तबरीक (आशीर्वाद) से नवाज़ते हैं।
[तोहफ़तुल-मौदूद बा-अहकाम अल-मौलूद, पेज नंबर:57]
नाम रखने और सर मुँडवाने से मुत'अल्लिक़ (बारे में) गुफ़्तुगू (बात-चीत) आगे आ रही है।
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हदीष नंबर:8
*नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का सर मुँडवाना*
{عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ:
"عَقَّ رَسُولُ اللَّهِ اللهُ عَنِ الحَسَنِ بِشَاةٍ وَقَالَ: يَا فَاطِمَةُ ! اِخْلِقِي رَأْسَهُ وَتَصَدَّقِي بِزِنَةِ شَعْرِهِ فِضَّةٌ، فَوَزَنَتُهُ، فَكَانَ وَزْنُهُ دِرْهَمًا أَوْ بَعْضَ دِرْهَمٍ"}
[صحیح سنن ترمذي:١٢٢٦]
तर्जमा: हज़रत 'अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की जानिब (तरफ़) से एक बकरी का 'अक़ीक़ा किया, और हज़रत फ़ातिमा से फ़रमाया कि बच्चे का सर मूंड कर उसके बालों के वज़्न-भर (बराबर/समान) चाँदी सदक़ा करो, उन्होंने बालों का वज़्न किया तो एक दिरहम या उससे कुछ कम थे।
[सहीह सुनन तिर्मिज़ी:1226]
व्याख्या:
दूसरी हदीष से मा'लूम होता है कि सर मूँडने का 'अमल (काम/कार्य) बच्चे की पैदाइश के सातवें दिन अंजाम दिया जाएगा, सर का बाल उतार देने से सर की सफ़ाई हो जाती है, मसामात (छिद्र/छेद) खुल जाते हैं और मैल-कुचैल भी साफ़ हो जाती है, तिब्बी (medical) नुक़्ता-ए-नज़र (दृष्टिकोण) से इस के और दूसरे फ़वाइद (फ़ाइदे) भी हैं, बाल मूँडने के बा'द उसके हम-वज़्न (समान/बराबर) चाँदी सदक़ा करना चाहिए, ता-कि (इसलिए कि) ग़रीबों और मिस्कीनों की ज़रूरत भी पूरी हो।
अक्सर (बहुत से) वालिदैन (माँ-बाप) शरी'अत (दीन) की इन ता'लीमात से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित/अनजान) रहते हैं, और 'अक़ीक़ा के दिन ग़ैर-ज़रूरी (फ़ुज़ूल/फ़ालतू) रस्म-ओ-रिवाज की तकमील (पूरा करने) में मसरूफ़ (व्यस्त/busy) रहते हैं, हमारी शरी'अत ने दीगर (अन्य) उमूर (कामों) की तरह बच्चों से मुत'अल्लिक़ (बारे में) हर मोड़ पर रहनुमाई (guidance) की है और उनकी जिस्मानी-व-अख़्लाक़ी (शारीरिक और नैतिक) हर तरह की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ (बारे में) वाज़ेह (स्पष्ट/साफ़) हिदायात दी हैं, इन हिदायात पर 'अमल (पालन) करना और उन्हें बा'इस-ए-ख़ैर-ओ-बरकत तसव्वुर (ख़याल) करना चाहिए, इस में दीन-ओ-दुनिया दोनों की फ़लाह-ओ-कामयाबी (सफलता/भलाई) मुज़्मर (पोशीदा) है।
आज देखा जाता है कि क्या बच्चे क्या बड़े, बालों के रख-रखाव (देख-भाल) में फ़िल्मी एक्टरों और गाने बजाने वालों की नक़्क़ाली (अनुकरण) में एक दूसरे से आगे भागने की कोशिश में मसरूफ़ (व्यस्त) हैं, उसके पीछे वो अच्छा-ख़ासा (बहुत) पैसा और वक़्त भी बर्बाद करते हैं, ऐसा किसी भी तरह मुनासिब (ठीक/उचित) नहीं है, वालिदैन (माँ-बाप) की यह ज़िम्मेदारी है कि दीगर (अन्य) चीज़ों की निगरानी और देख-रेख के साथ अपने बच्चों और मातहतों (अधीनों) की वज़'-क़त' (वेशभूषा) और उनके बालों की तज़य्युन-ओ-तरतीब (सजावट) पर भी निगाह (नजर) रखें, जब हमारी शरी'अत ने बच्चे की पैदाइश के पहले ही हफ़्ते में उसके बाल को अपनी तवज्जोह (ध्यान) का मरकज़ बनाया तो यह गोया (मानो) इस बात की तरफ़ इशारा है कि बच्चे के वालिदैन (माँ-बाप) आइंदा (भविष्य में) इस चीज़ को अपनी ज़िम्मेदारी में दाख़िल समझें।
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हदीष नंबर:9
*बच्चों के अच्छे नाम*
{عَنْ أَبِي وَهَبِ الْجُشَمِيِّ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
(تَسَمَّوا بِأَسْمَاءِ الْأَنْبِيَاءِ) وَأَحَبُّ الْأَسْمَاءِ إِلَى اللَّهِ: عَبْدُ اللَّهِ وَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ، وَأَصْدَقُهَا حَارِتٌ وَهَمَّامٌ
وَأَقْبَحُهَا حَرْبٌ وَمُرَّةٌ}
[ابو داود:٤۲۹۹ ، نسائی:۳۵۰۹ ، احمد:۱۸۲۵۸ - الصحيحة: ١٠٤٠]
तर्जमा: हज़रत अबू वहब जुश्मी कहते हैं कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया: तुम अंबिया-ए-किराम वाले नाम रखा करो, अल्लाह-त'आला के नज़दीक सबसे पसंदीदा नाम 'अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान हैं, और तमाम नामों में सदाक़त व सच्चाई वाले नाम हारिस और हमाम हैं, और सबसे बुरे नाम हर्ब (जंग) और मुर्रा (कड़वा) हैं।
[अबू दाऊद:4299, नसाई:3509, अहमद:18258, अल-सहीहा:1040]
व्याख्या:
बच्चों के त'अल्लुक़ (संबंध) से वालिदैन (माँ-बाप) की यह भी ज़िम्मेदारी है कि उनका अच्छा और मुवाफ़िक़-ए-शर'अ (शरी'अत के मुताबिक़) नाम रखें, अच्छे नामों का इंतिख़ाब (चयन/choice) करते वक़्त शरी'अत की मंशा (मर्ज़ी) को नज़र-अंदाज़ न किया जाए, अच्छे इस्म (नाम) से अच्छे मुसम्मा (शख़्सियत/व्यक्तित्व) की झलक मिलती है, इसलिए बच्चों का नाम रखते वक़्त उन नामों के म'आनी-ओ-मफ़ाहीम (अर्थ/मतलब) पर भी नज़र (ध्यान) रखा जाए, सिर्फ़ (केवल) ज़ाहिरी और सौती-हुस्न (अलफ़ाज़ की ख़ूबसूरती) को न देखा जाए।
ऐसे तमाम नामों से परहेज़ करना (बचना) चाहिए जिनके म'आनी (मतलब/meanings) ख़राब हो (जैसे: 'आसिया- नाफ़रमानी करने वाली) और जिनसे बद-शुगूनी वाले म'आनी (मतलब) ज़ाहिर होते हो (जैसे: जमरा- आग का अंगारा) और जो अल्लाह की ज़ात के साथ ख़ास हो (जैसे: अल-अहद, अल-समद) और जिन में 'अब्द (बंदे) की निस्बत (संबंध) अल्लाह के 'अलावा किसी और की तरफ़ की गई हो (जैसे: अब्दुल हुसैन- हुसैन का बंदा) और ऐसे नाम जिन से इस्लामी तशख़्ख़ुस (प्रतिष्ठा) पर हर्फ़ (इल्ज़ाम) आए या ग़ैर-मुस्लिमों की मुशाबहत (समानता) लाज़िम आए, मज़्कूरा-बाला हदीष में चंद (कुछ) अच्छे नाम ब-तौर-ए-मिसाल (उदाहरण के तौर पर) पेश किए गए हैं और बा'ज़ (कुछ) ना-मुनासिब (ना-पसंदीदा) नामों की निशान-दही (पहचान) भी की गई है।
अगर ना-वाक़िफ़ियत (अनजाने/अज्ञानता) की बिना-पर किसी का कोई ना-मुनासिब (ना-पसंदीदा) नाम रख दिया गया हो तो वाक़फ़ियत (जानकारी/'इल्म) होने के बा'द उसको बदल देना चाहिए, बा'ज़ (कुछ) लोग यह ए'तिक़ाद (भरोसा) रखते हैं कि नाम बदलने पर नए सिरे से (दूसरी बार) 'अक़ीक़ा करना होगा, ऐसा ए'तिक़ाद (यक़ीन) दुरुस्त नहीं है, अगर अच्छे और ख़राब नामों में तमीज़ (फ़र्क़) करना आदमी के बस में न हो तो उसे अहल-ए-'इल्म से रुजू' करना चाहिए।
अफ़सोस के इस वक़्त मुसलमानों में ऐसे नाम ब-कसरत (बहुत ज़्यादा) राइज (प्रचलित/common) हैं जो शर'ई (दीनी) और मा'नवी (वास्तविक) ए'तिबार (विचार) से महल्ल-ए-नज़र (doubtful) हैं, 'इल्म (शिक्षा) की कमी, अग़्यार (ग़ैरों) की तक़लीद (नक़्ल/पैरवी) और कुछ दूसरे अस्बाब (कारण) की बिना पर इन नामों का चलन 'आम है, 'उलमा को चाहिए कि इस सिलसिले में 'अवाम (जनता/public) की रहनुमाई करें और उनके अंदर इस त'अल्लुक़ (संबंध) से बेदारी पैदा करें।
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हदीष नंबर:10
*ख़त्ना*
{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
الفِطْرَةُ خَمْسٌ، أَوْ خَمْسٌ مِنَ الفِطْرَةِ : الخِتَانُ وَالاسْتِحْدَادُ، وَتَقْلِيمُ الْأَطْفَارِ، وَنَتْفُ الأَبْطِ وَقَصُّ : الشارب}
[بخاری:۵۸۸۹، مسلم:٥٩٧]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: फ़ितरी चीज़ें पांच हैं (या फ़रमाया) पाँच चीज़ें फ़ितरी हैं: ख़त्ना करना, ज़ेर-ए-नाफ़ के बाल साफ़ करना, नाख़ुन तराशना (काटना) बग़ल के बाल उखेड़ना और मूँछ काटना।
[सहीह बुख़ारी:5889, सहीह मुस्लिम:597]
व्याख्या:
या'नी इन ख़सलतों (आदतों) पर इस तरह 'अमल (पालन) करना चाहिए जैसे यह इंसान की फ़ितरत ('आदत/स्वभाव) और ख़मीर (फ़ितरत/nature) का हिस्सा हैं, बा'ज़ (कुछ) रिवायतों में कुछ दूसरे कामों का भी तज़्किरा (उल्लेख/वर्णन) है, बहर-हाल (फिर भी) इन कामों की बड़ी अहमियत है और इंसानी तहारत-व-नज़ाफ़त (पवित्रता/सफ़ाई) का भी यह बहुत बड़ा हिस्सा हैं जिस का ए'तिराफ़ (इक़रार) 'अहद-ए-जदीद (आधुनिक काल) के अतिब्बा (doctors) और साइंस-दानों ने भी किया है।
ख़त्ना एक बहुत ही अहम (ख़ास) दीनी शि'आर (पहचान) और अहल-ए-इस्लाम (मुसलमानों) की बहुत बड़ी शनाख़्त (निशानी) है, दीगर (अन्य) अंबिया के यहाँ भी इस पर 'अमल का तज़्किरा (उल्लेख) मिलता है, 'अहद-ए-हाज़िर (आधुनिक काल) में 'उलूम-ए-जदीदा (modern sciences) के माहेरीन (experts/विशेषज्ञों) का तो इस की ज़रूरत-व-अहमियत पर एक तरह से इत्तिफ़ाक़ (सहमति) है, और बहुत से ग़ैर-मुस्लिम अर्बाब-ए-'अक़्ल-ओ-दानिश (सूझबूझ वाले लोग) इस्लाम का इक़रार (स्वीकार) न करते हुए भी इस सुन्नत पर 'आमिल ('अमल करने वाले) और कार-बंद (पालन करने वाले) हैं, एड्स जैसे मोहलिक (घातक) और ला-'इलाज (incurable) मरज़ (बीमारी) से तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा/हिफ़ाज़त) के लिए अतिब्बा (डॉक्टर) ने ख़त्ना को सबसे बड़ा ज़री'आ (उपाय) क़रार दिया है।
ख़त्ना 'उम्र (आयु/age) के किसी भी हिस्सा में कराया जा सकता है, अलबत्ता (लेकिन) बचपन में कराने में ज़्यादा सुहूलत (आसानी) और फ़ाइदा है, वालिदैन (माँ-बाप) और सर-परस्तों की ज़िम्मेदारियों में से एक ज़िम्मेदारी यह भी है कि अपने बच्चों और मातहतों को इस मरहला (चरण) से गुज़ारने का बंदोबस्त करें, और इस्लाम की इस रहनुमाई (निर्देश ) पर बिला-ताख़ीर 'अमल की कोशिश करें, अलहम्दुलिल्लाह इस त'अल्लुक़ (संबंध) से मुसलमानों में बेदारी (निगरानी/व्यवस्था) पाई जाती है, काश कि वो इस सुन्नत पर 'अमल के साथ इस्लाम के इम्तियाज़ (पहचान/विशेषता) और आफ़ाक़ियत से भी वाक़िफ़ (परिचित) होते और दूसरों को वाक़िफ़ (परिचित) कराते।
अगर किसी वज्ह (कारण) से बचपन में ख़त्ना नहीं कराया जा सका तो बा'द में किसी भी वक़्त उसे ज़रूर कर लिया जाए, भले बुढ़ापे की 'उम्र (age/आयु) को पहुंच चुका हो, इसी तरह जो ग़ैर-मुस्लिम इस्लाम में दाख़िल होते हैं अगर वो मख़्तून नहीं हैं तो उनका भी ख़त्ना कराया जाएगा।
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हदीष नंबर:11
*तर्बियत (परवरिश) में वालिदैन (माँ-बाप) का किरदार*
{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهِ
عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلَّا يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَحِّسَانِهِ، كَمَا تُنْتَجُ البَهِيمَةُ بَهِيمَةٌ جَمُعَاءَ، هَلْ تُحِسُّونَ فِيهَا مِنْ جَدْعَاءَ ؟}
[بخاری: ۱۲۷۰، مسلم:٤٨٠٣]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: हर बच्चा दीन-ए-फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ-बाप उसे यहूदी, नसरानी ('ईसाई) या मजूसी (अग्निपूजक) बना देते हैं, जैसे जानवर सहीह-ओ-सालिम (स्वस्थ/तंदुरुस्त) बच्चा को जन्म देता है क्या उसमें तुम्हें कोई कान कटा नज़र आता है ?
[सहीह बुख़ारी:1270, सहीह मुस्लिम:4803]
व्याख्या:
बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में वालिदैन (माँ-बाप) का जो अहम (महत्वपूर्ण/ख़ास) किरदार (काम) होता है यह हदीष इस को वाज़ेह (स्पष्ट/ज़ाहिर) कर रही है, एक बच्चा जब इस दुनिया में आँखें खोलता है तो उसके अंदर फ़ितरी (क़ुदरती/स्वाभाविक) तौर पर इस्लाम और तौहीद को क़ुबूल करने की सलाहिय्यत (योग्यता) होती है, अगर उस को किसी दूसरे नए 'अक़ीदे और मज़हब (धर्म) की तरफ़ न मोड़ा जाए बल्कि उसके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वो मुसलमान और मुवह्हिद (तौहीद-परस्त/monotheist) ही रहेगा, लेकिन चूँकि बच्चा अपने वालिदैन (माँ-बाप) के साथ बराबर रहता है, उनके अक़्वाल-ओ-आ'माल (बातें और काम) को बराबर सुनता और देखता है, उनकी रहनुमाई (निर्देश/guidance) में ज़िंदगी गुज़ारता है, इस लिए धीरे-धीरे उनके ही 'अक़ीदे की छाप उसके ज़ेहन-ओ-दिमाग़ (mind/बुद्धि) पर पड़ जाती है, चुनांचे (इसलिए) यहूदी वालिदैन (माँ-बाप) के बीच पलने वाला बच्चा यहूदी बन जाता है, इसी तरह 'ईसाई (क्रिश्चियन) मजूसी (अग्निपूजक/zoroaster) और दीगर (दूसरे) 'अक़ीदा (धर्म) के वालिदैन (माँ-बाप) के बीच रहने वाला उस 'अक़ीदा का रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) हामिल हो जाता है।
'अक़ीदा के साथ अख़्लाक़-ओ-'आदात (आचरण/habits) और दीगर (अन्य) मु'आमलात (काम-काज) में भी वालिदैन (माता-पिता) की तक़लीद (पैरवी) और उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलने की मिसालें (उदाहरण) देखने को मिलती हैं, बच्चा अपने माँ-बाप और गिर्द-ओ-पेश (आसपास) के लोगों को बीड़ी-सिगरेट पीते देखता है तो वो भी इब्तिदाअन (शुरू'-शुरू' में) नक़्क़ाली (अनुकरण) में पीता है फिर उसका 'आदी हो जाता है, नमाज़ पढ़ते और तिलावत करते देखता है तो वो भी इन कामों की अदाएगी की कोशिश करता है।
इसलिए वालिदैन (माँ-बाप) को बच्चों की तर्बियत (परवरिश) के सिलसिले (विषय) में बहुत हस्सास (होशियार) रहना चाहिए, उनके सामने किसी भी महल्ल-ए-नज़र (doubtful/ग़ैर-वाजिब) और मा'यूब (बुरे) काम से गुरेज़ करना (दूर रहना) चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे अख़्लाक़-ओ-'आदात (आचरण/habits) से ख़ुद मुज़य्यन (तैयार) होकर उनको भी इस की जानिब (तरफ़) राग़िब (आकर्षित) करना चाहिए।
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हदीष नंबर:12
*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में माँ का किरदार*
{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ:
خَيْرُ نِسَاءِ رَكِبْنَ الْإِبْلَ صَالِحُ نِسَاءِ قُرَيْشٍ، أَحْنَاهُ عَلَى وَلَدٍ فِي صِغَرِهِ وَأَرْعَاهُ عَلَى زَوْجٍ فِي ذَاتِ يَدِهِ}
[بخاری:٤٩٤٦ ، مسلم:٤٥٩١]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: ऊँट की सवारी करने वाली 'औरतों में से सबसे बेहतर क़ुरैश की नेक 'औरतें हैं, जो बच्चों से ज़्यादा प्यार करती हैं और शौहर (पति) के माल-ओ-अस्बाब (property) की ज़्यादा हिफ़ाज़त करती हैं।
[सहीह बुख़ारी:4946, सहीह मुस्लिम:4591]
(ऊँट की सवारी करने वालों से मुराद 'अरब के लोग हैं क्यूँकि (इसलिए कि) ऊँट की सवारी का ज़्यादा रिवाज 'अरबों के यहाँ ही है)
[फ़त्ह-उल-बारी:9/28]
व्याख्या:
इस हदीष में नेक बीवी (पत्नी) की सिफ़ात (ख़ूबी/गुण) में बच्चों के प्यार और अमानत-ओ-दियानत (हिफ़ाज़त और ईमानदारी) को बयान किया गया है, या'नी (अर्थात) बीवी के इंतिख़ाब (चयन/पसंद) के वक़्त इन सिफ़ात (ख़ूबी) को मद्द-ए-नज़र (सामने) रखा जाए और इन सिफ़ात (ख़ूबी) से मुत्तसिफ़ (ख़ूबियाँ रखने वाली) 'औरतों को ज़ौजिय्यत (निकाह) में लाया जाए।
बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में माँ का किरदार (काम/role) बेहद (बहुत) अहम (ख़ास) होता है और शफ़क़त-ओ-मोहब्बत (दया/ममता) और प्यार के बरताव (व्यवहार) का बच्चों की नफ़्सियात (psychology) पर बड़ा असर होता है, यह प्यार बच्चे को माँ से ही मिलता है क्यूँकि (इसलिए कि) उसका ज़्यादातर (अधिकतर/mostly) वक़्त माँ के साथ गुज़रता (बीतता) है, इस इब्तिदाई (शुरू'आती) मरहला (चरण/stage) ही में बच्चे को अगर माँ का प्यार नहीं मिला, या प्यार के ब-जाए (बदले में) हमेशा डाँट-डपट, ज़ज्र-ओ-तौबीख़ (ला'नत-मलामत) और बात बात पर (हमेशा) पिटाई झेलनी पड़े तो बच्चा ज़िद्दी हो जाता है और अच्छे 'आदात-ओ-अतवार (स्वभाव और व्यवहार) से उसकी आरास्तगी (तैयारी) मुश्किल हो जाती है।
जदीद (नई/modern) तहज़ीब (culture) ने तो बच्चों से उनकी माँओं का प्यार और लुत्फ़-ओ-मोहब्बत (दया/प्रेम) ही छीन लिया है, मुलाज़मत (नौकरी) और आमदनी (income) का चक्कर बच्चे को माँ से मिलने का मौक़ा' कम देता है, दूसरा यह कि फैशन-ज़दा (fashionable) माँएं अपनी गोद में बच्चों को रखने और खिलाने में गोया (मानो) अपनी तौहीन (बे'इज़्ज़ती) महसूस (feel) करती हैं, नतीजा (मतलब) यह बच्चे ख़ादिमाओं (नौकरानियों) की गोद में मिलते हैं, ज़ाहिर (स्पष्ट) बात है कि उजरत (मज़दूरी) पर काम करने वाली यह ख़ादिमाएं (नौकरानियां) बच्चों को माँ जैसा प्यार नहीं दे सकती, अगर यह ख़ादिमाएं (नौकरानियां) 'अक़ीदा-ओ-अख़्लाक़ (ईमान और अच्छे स्वभाव) की ख़राबी में मुब्तला हों तो यह ख़राबी बच्चों में भी मुंतक़िल होना लाज़िमी अम्र (समस्या) है।
लिहाज़ा (इसलिए) मांओं की यह ज़िम्मेदारी है कि अपने नौनिहालों (बच्चों) को अपने से क़रीब (पास) रखें, उनके साथ शफ़क़त (मामता/रहम) और प्यार का बरताव (व्यवहार) करें और उनकी हमा-जिहत (हर तरफ़ से) नश्व-ओ-नुमा (परवरिश) का ख़याल रखें, ता-कि (इसलिए कि) आगे चल कर यह बच्चे उनकी आँखों की ठंडक बनें।
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