ઝુલહિજ્જહ કે ઇબ્તેદાઈ દસ દિનોં કી અઝમત..!!

 ઝુલહિજ્જહ કે ઇબ્તેદાઈ દસ દિનોં કી અઝમત..!!


ઇમામ ઇબ્નુલ જૌઝી રહિમહુલ્લાહ ફરમાતે હૈં:


“જાન લો, અલ્લાહ તુમ પર રહમ ફરમાએ! તુમ્હારે યે દસ દિન આમ દસ દિનોં જેસે નહીં હૈં, બલ્કે ઇન મેં દસ અઝીમ ફઝીલતેં જમા હૈં:


❶ અલ્લાહ અઝ્ઝ વ જલ્લ ને ઇન દિનોં કી કસમ ખાઈ હૈ, ચુનાંચે ફરમાયા:

﴿وَلَيَالٍ عَشْرٍ﴾

“ઔર દસ રાતોં કી કસમ।”


ઔર જબ અઝમત વાલા રબ કિસી ચીઝ કી કસમ ખાયે તો યે ઉસ ચીઝ કી અઝમત કી દલીલ હોતી હૈ।


❷ અલ્લાહ તઆલા ને ઇન્હેં “અય્યામે માલૂમાત” કરાર દિયા હૈ, ફરમાયા:

﴿وَيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ فِي أَيَّامٍ مَعْلُومَاتٍ﴾

“ઔર તાકે વહ મુકર્રરા દિનોં મેં અલ્લાહ કા નામ ઝિક્ર કરેં।”


હઝરત ઇબ્ને અબ્બાસ રઝિયલ્લાહુ અન્હુમા ફરમાતે હૈં:

“ઇસ સે મુરાદ ઝુલહિજ્જહ કે દસ દિન હૈં।”


❸ રસૂલુલ્લાહ ﷺ ને ગવાહી દી હૈ કે યે દુનિયા કે સબ સે અફઝલ દિન હૈં।


❹ નબી ﷺ ને ઇન દિનોં મેં નેક આઅમાલ કરને કી તરગીબ દી હૈ।


❺ આપ ﷺ ને ઇન દિનોં મેં કસરત સે તસ્બીહ, તહમીદ ઔર તહલીલ કા હુકમ દિયા હૈ।


❻ ઇન દિનોં મેં યૌમે તરવિયા (આઠ ઝુલહિજ્જહ) આતા હૈ।


❼ ઇનહી દિનોં મેં યૌમે અરફા આતા હૈ, ઔર ઉસ દિન કા રોજા દો સાલ કે ગુનાહોં કા કફ્ફારા બનતા હૈ।


❽ ઇનહી દિનોં મેં મુઝદલિફા કી રાત યાની “લૈલતુલ જમઅ” આતી હૈ।


❾ ઇન દિનોં મેં હજ અદા કિયા જાતાં હૈ, જો ઇસ્લામ કે પાંચ અર્કાન મેં સે એક અઝીમ રુકન હૈ।


❿ ઇનહી દિનોં મેં કુરબાની અદા કી જાતી હૈ, જો મિલ્લતે ઇબ્રાહીમી ઔર શરીઅતે મોહમ્મદિયા કી એક અઝીમ નિશાની હૈ।”


📚 અત્તબ્સિરા લિબ્નિલ જૌઝી: ૨/૧૨૭


ઇબ્ને મંઝૂર સનાબલી

ઝિલ હિજ્જહ કે રોજે – ખાસ તોર પર યૌમે અરફા કા રોજા*

 *ઝિલ હિજ્જહ કે રોજે – ખાસ તોર પર યૌમે અરફા કા રોજા*


હઝરત અબૂ કતાદા રઝિયલ્લાહુ અનહુ સે રિવાયત હૈ કિ

રસૂલુલ્લાહ ﷺ ને ફરમાયા:

“મુઝે અલ્લાહ તઆલા સે ઉમ્મીદ હૈ કિ અરફા કે દિન કા રોજા એક સાલ પહલે ઔર એક સાલ બાદ કે ગુનાહોં કા કફ્ફારા બન જાયેગા।”

વઝાહત: ઇસ હદીસ સે માલૂમ હોતા હૈ કિ ઝિલ હિજ્જહ કી 9 તારીખ યાની યૌમે અરફા કા રોજા બહુત બડી ફઝીલત રખતા હૈ। જો લોગ હજ પર ન હોં, ઉનકે લિયે ઇસ દિન કા રોજા રખના મુસ્તહબ ઔર અઝીમ સવાબ કા કામ હૈ। અલ્લાહ તઆલા અપની રહમત સે પિછલે ઔર આને વાલે એક-એક સાલ કે ગુનાહ માફ ફરમા દેતા હૈ।

સહીહ મુસ્લિમ: હદીસ 1162


*મકતબા અલ ફુરકાન સમી પાટણ*

تقویۃ الایمان



سوال نمبر 1: سب سے پہلے کس چیز کی اصلاح ضروری ہے؟
جواب: سب سے پہلے عقیدہ (ایمان) کی اصلاح ضروری ہے۔


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سوال نمبر 2: اللہ کا بندوں پر کیا حق ہے اور بندوں کا اللہ پر کیا حق ہے؟
جواب:
اللہ کا بندوں پر حق: وہ صرف اللہ کی عبادت کریں اور کسی کو شریک نہ ٹھہرائیں۔
بندوں کا اللہ پر حق: جو شرک نہ کرے، اللہ اسے عذاب نہیں دے گا۔


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سوال نمبر 3: ایمان میں خلل کن چیزوں سے پڑتا ہے؟
جواب: ایمان میں خلل شرک، بدعت، نفاق اور گناہوں سے پڑتا ہے۔


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سوال نمبر 4: کیا اس شخص کی عبادت قبول ہوگی جس کے ایمان میں خلل ہو؟
جواب: نہیں، جس کے ایمان میں خلل ہو (خاص طور پر شرک)، اس کی عبادت قبول نہیں ہوتی۔


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سوال نمبر 5: دین پر چلنے کے لیے سب سے بہترین راہ کون سی ہے؟
جواب: دین پر چلنے کے لیے سب سے بہترین راہ قرآن و حدیث کی پیروی ہے۔


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سوال نمبر 6: اگر کسی مسئلے میں اختلاف ہو جائے تو کیا کرنا چاہیے؟
جواب: اختلاف کی صورت میں قرآن و حدیث کی طرف رجوع کرنا چاہیے۔


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سوال نمبر 7: قرآن و حدیث کو سمجھنے میں عقل اور نقل سے کیا مراد ہے؟
جواب:
عقل: انسان کی سمجھ بوجھ
نقل: قرآن و حدیث کے دلائل
اصل بنیاد نقل (قرآن و حدیث) ہے، عقل اس کو سمجھنے میں مدد دیتی ہے۔


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سوال نمبر 8: جنت اور دوزخ کا مختصر تعارف بیان کریں؟
جواب:
جنت: نیک لوگوں کے لیے انعام کی جگہ
دوزخ: گناہگاروں کے لیے سزا کی جگہ


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سوال نمبر 9: شہادتین کا حقیقی اور مفہوم کیا ہے؟
جواب:
شہادتین: لا إله إلا الله محمد رسول الله
مفہوم: اللہ کے سوا کوئی معبود نہیں، اور محمد ﷺ اللہ کے رسول ہیں۔


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سوال نمبر 10: توحید اور رسالت کیا ہے؟ شرک اور بدعت کس کو کہتے ہیں؟
جواب:
توحید: اللہ کو ایک ماننا
رسالت: نبی ﷺ کو اللہ کا رسول ماننا
شرک: اللہ کے ساتھ کسی کو شریک کرنا
بدعت: دین میں نئی بات شامل کرنا


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سوال نمبر 11: "تقویۃ الایمان" کس فن کی کتاب ہے؟
جواب: یہ عقیدہ (ایمانیات) کی کتاب ہے۔


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سوال نمبر 12: اس کتاب میں کن چیزوں کے بارے میں گفتگو ہوئی ہے؟
جواب: اس کتاب میں توحید، شرک کی پہچان اور صحیح عقیدہ کے بارے میں گفتگو کی گئی ہے۔


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اگر آپ چاہیں تو میں ان سب کو یاد کرنے کے لیے آسان طریقہ (short notes) بھی بنا سکتا ہوں۔

ગુજરાતી અહસ્નુલ બયાન download karo

ગુજરાતી અહસ્નુલ બયાન download karo
https://drive.google.com/file/d/1BueELWjnNMZRh3gkaSb7ZJFq9yrqbANq/view?usp=drivesdk

*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ चालीस अहादीस*

*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ चालीस अहादीस*
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लेखक: शैख़ अस'अद आज़मी 
(जामि'आ सलफ़िया बनारस)

हिंदी अनुवाद: अब्दुल मतीन सैयद
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हदीष नंबर:1

नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(1)

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لَأَرْبَعِ لِمَالِهَا وَلِحَسَبِهَا وَلِجَمَالِهَا وَ لِدِينِهَا، فَاظْفَرُ بِذَاتِ الدِّيْنِ تَرِبَتْ يَدَاكَ.}
[بخاری:٤٧٠۰ ، مسلم:٢٦٦١]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: 'औरत से चार चीज़ों की वज्ह (कारण) से निकाह (विवाह) किया जाता है: उसके माल की वज्ह (कारण) से, उसके ख़ानदानी हसब-ओ-नसब की वज्ह से, उसके हुस्न-ओ-जमाल (ख़ूबसूरती/सुंदरता) की वज्ह से, और उसके दीन की वज्ह (कारण) से, लिहाज़ा (इसलिए) तुम दीन-दार 'औरत (महिला) से (शादी कर के) कामयाबी (सफलता) हासिल करो, तुम्हारे हाथ ख़ाक-आलूद हों।
[सहीह बुख़ारी:4700, सहीह मुस्लिम:2661]

व्याख्या: 
 इस हदीष में बताया गया है कि लोग अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त अपनी होने वाली बीवी (पत्नी) के अंदर चार चीज़ें तलाश करते हैं 1-माल-ओ-दौलत वाली हो, 2-ऊँचे-घराने की हो, 3-ख़ूबसूरत हो, 4-दीन-दार हो।
 लेकिन मुसलमानों को हमारे नबी ﷺ ने यह ताकीद की (अनुरोध किया) है कि बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त सिर्फ़ उसकी दीन-दारी को देखें, दीन-दार बीवी को अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी/life partner) बनाएं, क्यूँकि (इसलिए कि) अस्ल (वास्तविक) सरमाया (धन-दौलत/पुंजी) दीन ही है जिस पर दुनिया-ओ-आख़िरत की कामयाबी (सफलता) का दार-ओ-मदार है, बाक़ी तीनों चीज़ें दीन-दारी के मुक़ाबले में कोई ख़ास अहमियत (महत्व) नहीं रखतीं।
 नेक बीवी पूरे घर के माहौल (वातावरण) को बेहतर बनाएगी, इस के साथ ही उसके बत्न (कोख/पेट) से जन्म लेने वाली औलाद पर भी नेकी के आसार (गुण) होंगे, दीन-दार और नेक 'औरत (महिला) अपने बच्चों को भी गुमराही के रास्ते पर नहीं छोड़ेगी, बल्कि (किंतु) उन को अच्छी तर्बियत (परवरिश) देगी।
 इस के बर-'अक्स (उल्टा/विरुद्ध) दीन-ओ-अख़्लाक़ (अच्छे आचरण/शिष्टाचार) से 'आरी (वंचित) 'औरत से न घर का माहौल बेहतर होगा और न ही वो अपने बच्चों को भलाई और नेकी के रास्ते पर चलने की तर्बियत (शिक्षा) दे सकेगी, जो लोग दुनिया की चमक-दमक और उसकी रंगीनियों में महव (मगन/मस्त) होकर बीवी या बहू के इंतिख़ाब (चयन/choice) के वक़्त दीन-दारी के पहलू (उद्देश्य) को नज़र-अंदाज़ कर देते हैं और बड़े घरानों (ख़ानदानों) गोरी-चमड़ी (गोरा रंग) और माल-ओ-दौलत के पीछे भागते हैं वो अक्सर (बहुत बार) बा'द में पछताते हैं और उनकी ज़िंदगी का सुकून दरहम-बरहम हो जाता है, हम अपने गिर्द-ओ-पेश (आसपास) का जाइज़ा लें तो इस की मुत'अद्दिद (कई/अनेक) मिसालें मिल जाएंगी।
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हदीष नंबर:2

नेक बीवी (पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice)(2)*

{عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ :
تَخَيَّرُوا لِنُطَفِكُمْ، فَانْكِحُوا الْأَكْفَاءَ وَأَنْكِحُوا إِلَيْهِمْ}
[ابن ماجه:١٩٥٨ - صحيح الجامع:۲۹۲۸]
तर्जमा: हज़रत 'आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: अपने नुत्फ़े (औलाद) के लिए बेहतर (बीवी/पत्नी) का इंतिख़ाब (चयन/choice) करो, और कुफ़ू से शादी करो और कराओ।
[इब्ने माजा:1958, सहीह अल-जामे':2928]

व्याख्या:
 अपनी होने वाली औलाद की बेहतरी और भलाई की फ़िक्र (चिंता) इंसान को शादी से पहले और बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (choice/चयन) के वक़्त (समय) ही से होनी चाहिए, इस बात को इस हदीष में एक नए और तमसीली (मिसाली) उस्लूब (शैली/अंदाज़) में बयान किया गया है, जिस तरह यह बात मुसल्लम (साबित-शुदा) है कि अच्छी और ज़रख़ेज़ (उपजाऊ) ज़मीन ही से अच्छी खेती और अच्छी पैदावार होती है और महज़ (केवल) बीज का अच्छा होना काफ़ी नहीं, इसी तरह अच्छी और सालेह (नेक) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए नेक-सीरत बीवी ज़रूरी है, सिर्फ़ (केवल) शौहर (husband) का नेक और सालेह (परहेज़गार) होना काफ़ी (बस/पर्याप्त) नहीं।
 निकाह के बाद शौहर बीवी से मुजाम'अत (हमबिस्तरी) के ज़री'आ (द्वारा) उसके रहिम (गर्भ) में अपना नुतफ़ा (वीर्य) मुंतक़िल करता है, यह मनी' (वीर्य) औलाद के हुसूल (प्राप्ति) के लिए बीज की हैसियत रखती है और 'औरत का रहिम (गर्भ) उसके लिए ज़मीन और खेत का दर्जा रखता है, इस रहिम (गर्भ) और इस ज़मीन की अच्छाई और ख़राबी इससे पैदा होने वाली शय (वस्तु) पर ज़रूर असर-अंदाज़ होगी, बद-'अक़ीदा (बे-दीन) बद-ख़ुल्क़ (बद-अख़्लाक़) बद-चलन (बद-कार) और दूसरी ख़राबियों में मुब्तला (व्यस्त) 'औरत से सालेह (पाक-दामन) पाकबाज़ (परहेज़गार) और नेक औलाद की तवक़्क़ो' (उम्मीद) नहीं की जा सकती ऐसी 'औरत ख़ुद अपने शौहर (पति/husband) के लिए मुसीबत और दर्द-ए-सर (उलझन) रहती है, अगर वो मालदार, ख़ूबसूरत और नामी-गिरामी (मशहूर) घराने की भी हो तो अपने शौहर को सुकून हम (आदि) नहीं पहुंचा सकती, चे जाए कि (बड़ी बात है कि) उसके लिए ऐसी औलाद जने जो उसकी आँखों की ठंडक और उसके दिल के सुरूर (मन की ख़ुशी) का ज़री'आ बने।
 क़ुरआन-ए-करीम ने:
{لِلْخَبِيثِينَ وَالخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَاتِ، وَالطَّيِّبَاتُ لِلطَّيِّبِينَ وَالطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَاتِ}
[سوره نور:٢٦]
तर्जमा: ख़बीस (नापाक) 'औरतें ख़बीस (नापाक) मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और ख़बीस मर्द ख़बीस 'औरतों के लाइक़ हैं और पाक 'औरतें पाक मर्दों के लाइक़ (योग्य) हैं और पाक मर्द पाक 'औरतों के लाइक़ हैं।
[सूरा अन्-नूर:26]
 के ज़री'आ (द्वारा) लोगों को मुतनब्बे (सावधान) कर दिया गया है कि अच्छे लोग अच्छी और पाक-दामन 'औरतों ही को रिश्ता-ए-इज़दिवाज (निकाह) में मुंसलिक (शामिल) करें, इस तरह एक सालेह (नेक) और पाकबाज़ ख़ानदान और मु'आशरा (समाज) का क़ियाम मुमकिन (संभव) हो सकेगा, जिस में पलने बढ़ने वाले अफ़राद नेक-सीरत और 'उम्दा (अच्छी) ख़सलत ('आदत/स्वभाव) वाले होंगे।
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हदीष नंबर:3

नेक बीवी (पत्नी) के कुछ और औसाफ़ (ख़ूबियाँ)*

{عَنْ مَعْقِلِ بْنِ يَسَارٍ قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَقَالَ :
إِنِّي أَصَبْتُ امْرَأَةً ذَاتَ حَسَبٍ وَمَنْصِبٍ إِلَّا أَنَّهَا لَا تَلِدُ أَفَاتَزَوَّجُهَا؟ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّانِيَةَ فَنَهَاهُ، ثُمَّ آتَاهُ الثَّالِثَةَ فَهَاهُ، فَقَالَ: تَزَوَّجُوا الوَدُودَ الوَلُوُدَ، فَإِنِّي مُكَاثِرٌ بِكُمُ الأمم}
[سنن نسائی:۳۱۷۵ ، ابو داود:١٧٥٤ - صحيح الجامع:٢٩٤٠]
तर्जमा: माक़िल बिन यसार रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक आदमी रसूल ﷺ के पास आया और कहा: एक शरीफ़ ख़ानदान और क़द्र-ओ-मंज़िलत ('इज़्ज़त) वाली ख़ातून (महिला) के बारे में मुझे जानकारी मिली है मगर उसके यहाँ पैदाइश नहीं होती, क्या मैं उससे शादी कर लूं ? आप ﷺ ने उनको मना' फ़रमाया, वो दोबारा (दूसरी बार) आए और सेह-बारा (तीसरी बार) आए और आप ﷺ ने मना' फ़रमाया और कहा कि ज़्यादा मोहब्बत करने वाली और ज़्यादा बच्चे जनने वाली 'औरत से शादी करो, क्यूँकि (इसलिए कि) में (क़ियामत के दिन) दूसरी क़ौमों के मुक़ाबले में तुम्हारी कसरत (ज़यादती) पर फ़ख़्र (गर्व) करूंगा।
[सुनन नसाई:3175, अबू दाऊद:1754, सहीह अल-जामे':2940]

व्याख्या:
 इस हदीष में सराहत (वज़ाहत) से यह बात बयान कर दी गई कि शादी के मक़ासिद (उद्देश्य) में अहम (महत्वपूर्ण) मक़्सद औलाद का हुसूल (प्राप्ति) भी है, शादी महज़ (केवल/सिर्फ़) जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) या बीवी (पत्नी) और ससुराल वालों के मक़ाम-ओ-मर्तबा (प्रतिष्ठा/पद) से इस्तिफ़ादा (नफ़ा' उठाने) के लिए नहीं होती, इसलिए अगर क़राइन (आसार/लक्षण) वग़ैरा से 'औरत का बाँझपन मा'लूम हो जाए तो उससे शादी से इज्तिनाब (किनारा-कशी/उपेक्षा) कर के ऐसी 'औरत का इंतिख़ाब (choice/चयन) किया जाए जिस के अंदर अफ़्ज़ाइश-ए-नस्ल (संतान-वृद्धि) की इस्तिता'अत (क्षमता) हो।
 हदीष नंबर (1) की तरह इस हदीष में भी बीवी (पत्नी) के इंतिख़ाब (चयन/choice) के मे'यार (जाँच/परख) की निशान-दही (पहचान) की गई है और 'अवाम (जनता/public) में राइज (प्रचलित/जारी) मे'यार (तरीक़ा/प्रणाली) पर न जाने की ताकीद की गई है, मुस्लिम घरानों में औलाद की कसरत (ज़्यादती/अधिकता) शरी'अत (दीन) को मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है क्यूंकि (इसलिए कि) क़ियामत के दिन जब तमाम अंबिया अपनी अपनी उम्मतों के साथ आएंगे तो उम्मत-ए-मुहम्मदिय्या उन सब के बीच सबसे बड़ी उम्मत होगी और यह चीज़ हमारे नबी के लिए बा'इस-ए-इफ़्तिख़ार (सम्मान का कारण) होगी।
 इस में कोई शक नहीं कि औलाद की कसरत (ज़्यादती) के साथ उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) भी शर'ई मतलूब (आवश्यक/ज़रूरी) है, नेक, दीन-पसंद और आ'ला (श्रेष्ठ/'उम्दा) अख़्लाक़-ओ-सिफ़ात (आचरण) के हामिल लोगों पर ही फ़ख़्र (गर्व) किया जाता है और उनकी मौजूदगी (हाज़िरी) से ख़ुशी और मसर्रत (प्रसन्नता) होती है, न कि दीन-बेज़ार (दीन से निराश) और सीरत-ओ-किरदार (चाल-चलन) से तेही-दस्त (महरूम) लोगों से, इसलिए औलाद की कसरत (ज़्यादती) को तर्बियत (ता'लीम) के 'अमल से जुदा (अलग) कर के नहीं देखा जाना चाहिए, जिस तरह औलाद की कसरत शर'ई मतलूब (ज़रूरी) है ठीक उसी तरह उनकी अच्छी तर्बियत (परवरिश) मतलूब (ज़रूरी) है, अलहम्दुलिल्लाह इस वक़्त (समय) ता'दाद (संख्या) के ए'तिबार से मुसलमान 'ईसाईयों (christians) के बा'द दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं, मगर उन में इस्लामी तर्बियत (शिक्षा) की बड़ी कमी है, जिस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने की सख़्त (बहुत) ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:4

जिमा' (हमबिस्तरी) के वक़्त की दु'आ और तर्बियत (शिक्षा/ता'लीम)*

{عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: "لَوْ أَنَّ أَحَدَكُمْ إِذَا أَرَادَ أَنْ يَأْتِيَ أَهْلَهُ قَالَ: بِسْمِ اللَّهِ للَّهُمَّ جَنِّبْنَا الشَّيْطَانَ وَجَنبِ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا ، فَإِنَّهُ إِنْ يُقَدَّرُ بَيْنَهُمَا وَلَدٌ فِي ذَلِكَ لَمْ يَضُرَّهُ شَيْطَانٌ"}
[بخاری:٣٢٧۱ ، مسلم:١٤٣٤]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम में से कोई आदमी अपनी बीवी (पत्नी) से जिमा' (हमबिस्तरी) का इरादा करे और यह दु'आ पढ़ ले "शुरू' करता हूं अल्लाह के नाम से, ऐ अल्लाह तू हमें शैतान से महफ़ूज़ (सुरक्षित) रख और शैतान को इस चीज़ (औलाद) से दूर रख जो तू हमें 'अता करे तो अगर उस जिमा' (हमबिस्तरी) से उनकी तक़दीर में औलाद लिखी होगी तो शैतान उसको नुक़्सान नहीं पहुंचाएगा"।
[सहीह बुख़ारी:3271, सहीह मुस्लिम:1434]

व्याख्या:
 बच्चों की तर्बियत (परवरिश) और उनकी इस्लाह-ओ-फ़लाह पर ध्यान देने के मवाक़े' (मौक़े'/अवसर) में से एक मौक़ा' यह भी बताया गया है कि जिमा' (संभोग) और हमबिस्तरी को सिर्फ़ जिंसी-तस्कीन (sexual/संतोष) का ज़री'आ (माध्यम) न समझा जाए बल्कि (किंतु) उस मौक़ा' (अवसर) पर भी इंसान अल्लाह को याद रखे, साथ ही अपनी आने वाली औलाद की शैतान से हिफ़ाज़त को भी मद्द-ए-नज़र (सामने) रखे, उसके लिए मज़कूरा दु'आ का विर्द करने (दोहराने/पढ़ने) की उसको हिदायत (रहनुमाई) की गई है और इसका फ़ाइदा यह बतलाया गया है कि अगर इस जिमा' (हमबिस्तरी) के नतीजे में कोई बच्चा वुजूद (अस्तित्व) में आता है तो वो शैतान के शर (शरारत/बुराई) से महफ़ूज़ (सुरक्षित) होगा।
 शरी'अत की नज़र में बच्चे का तहफ़्फ़ुज़ (हिफ़ाज़त) और शैतान और शैतानी आ'माल-व-हरकात (काम) से उसे बचाना किस-क़दर (कितना) अहम (ज़रूरी) है इसका अंदाज़ा (अनुमान) इस हदीष से लगाया जा सकता है, शरी'अत (दीन) की हकीमाना (हिकमत से भरी) निगाहें (नज़रें) बहुत दूर तक देखती हैं, अल्लाह रब्ब-उल-'इज़्ज़त इंसान और सारी काइनात का ख़ालिक़ है मख़्लूक़ के नफ़-ओ-नुक़्सान और सलाह-ओ-फ़साद (भलाई और बिगाड़) को उससे बेहतर कौन समझ सकता है, यह उसका 'ऐन (ख़ास) एहसान है कि उसने अपने बंदों को शरी'अत के नूर (रोशनी) से नवाज़ा है और ऐसे बेशुमार (असंख्य) हक़ाइक़ (सच्चाई) से आगाह (सूचित/alert) किया है जिन (जिस) का उन्हें क़त'अन (हरगिज़/बिल्कुल) 'इल्म नहीं था।
 आज नाफ़रमान और बे-राह (गुमराह) औलाद की कसरत (भरमार) से हमारा मु'आशरा (समाज) शाकी (फ़रियादी) है, नई-नस्ल की अकसरिय्यत (बहुसंख्यक/majority) शैतान के नस्ब-कर्दा (लगाईं हुई) जाल में बड़ी तेज़ी से फँसती जा रही है, इसके अस्बाब (कारण) में से एक अहम (मुख्य) सबब (कारण) मज़कूरा हिदायत-ए-नबवी (हमबिस्तरी के समय की दु'आ) से ग़ाफ़िल (बे-ख़बर) होना ज़ाहिर (स्पष्ट) है, और यह कहना मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) होगा कि शादी-शुदा जोड़ों की अकसरिय्यत (majority/बहुसंख्यक) इन ता'लीमात-व-हिदायात (मार्ग-दर्शन) से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित) है लिहाज़ा (इसलिए) इस पर 'अमल का सवाल ही कहां पैदा होता है।
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हदीष नंबर:5

बच्चे के लिए जीने का हक़*

{عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ!
أَيُّ الذَّنْبِ أَعْظَمُ؟ قَالَ :
أَنْ تَجْعَلَ لِلَّهِ نِدًّا وَهُوَ خَلَقَكَ، قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تَقْتُلَ وَلَدَكَ خَشْيَةَ أَنْ يَطْعَمَ مَعَكَ. قُلْتُ : ثُمَّ أَيُّ؟ قَالَ : أَنْ تُزَانِي حَلِيْلَةَ جَارِكَ}
[بخاری:٦٠٠١ ، مسلم:٢٥٧]
तर्जमा: हज़रत 'अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ से कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! सबसे बड़ा गुनाह कौन सा है ? आप ने फ़रमाया: सबसे बड़ा गुनाह यह है कि तुम अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराओ, हालांकि अल्लाह ही ने तुम को पैदा किया है, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: यह है कि तुम अपने बच्चों को इस डर से क़त्ल कर दो कि वो भी तुम्हारे साथ खाएंगे, मैंने पूछा फिर कौन सा गुनाह ? आप ने फ़रमाया: वो यह है कि तुम अपनी पड़ोसन के साथ ज़िना (बद-कारी/व्यभिचार) करो।
[सहीह बुख़ारी:6001, सहीह मुस्लिम:257]

व्याख्या:
 इस हदीष में शिर्क के बा'द सबसे बड़ा गुनाह यह बतलाया गया है कि आदमी अपनी औलाद (संतान) को इस डर से क़त्ल कर दे कि वो ज़िंदा रहेगी तो खाने पीने में वो भी शरीक (शामिल) होगी जिस से वो मु'आशी (आर्थिक) तंगी में मुब्तला (ग्रस्त) हो जाएगा, इस्लाम से क़ब्ल (पहले) इस क़बीह-फ़े'ल (बुरे काम) का बा'ज़ (कुछ) लोग इर्तिकाब (पाप/गुनाह) करते थे, इसी वज्ह (कारण) से क़ुरआन-ए-करीम में भी सराहत (वज़ाहत) से इस का तज़्किरा (बयान) कर के इस से रोका गया है और यह कहा गया है कि सबको रिज़्क़ (रोज़ी) फ़राहम (उपलब्ध) करने वाले हम हैं।
 दर-हक़ीक़त (वास्तव में) यह 'अमल (काम) बल्कि (किंतु) यह तसव्वुर (ख़याल) ही इंसान की माद्दा-परस्ती (materialism/मुंकिर-ए-ख़ुदा) और उसके हिर्स-ओ-हवस (लालच और इर्ष्या) की इंतिहा (हद/सीमा) को पहुंचने की 'अलामत (निशानी) है, आज की मुहज़्ज़ब (शिक्षित) और तरक़्क़ी-याफ़ता (विकसित) दुनिया में इस तसव्वुर (ख़याल/योजना) को सरकारी सरपरस्ती (समर्थन/सहायता) हासिल हो चुकी है और मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) बहानों से इस्क़ात-ए-हमल (गर्भपात/abortion) और दूसरे तरीक़ों से बच्चों के क़त्ल-ए-'आम का सिलसिला जारी है, फिर भी दुनिया हुक़ूक़-ए-इंसानी (human rights) और हुक़ूक़-ए-अतफ़ाल (बच्चों के अधिकार) का ढँडोरा पीटती है और अपने आप को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन (civilization/culture) का 'अलम-बरदार (प्रचारक) और इंसानियत (मानवता) का सबसे बड़ा बही-ख़्वाह (ख़ैर-ख़्वाह/शुभचिंतक) मानती है।
 इस्लाम ने आज से चौदह-सौ (1400) साल पहले इस फ़ासिद (ख़राब) नज़रिये (ideologies) की क़बाहत (बुराईयों) को आशकारा (व्यक्त/ज़ाहिर) करते हुए इस मज़मूम-हरकत (बुरे 'अमल) पर पाबंदी लगा दी थी और बच्चों को ज़िंदा रहने का न सिर्फ़ हक़ (अधिकार) 'अता किया बल्कि उनको जुमला (सब/समग्र) इंसानी-हुक़ूक़ (मानवीय अधिकार) से नवाज़ा।
 इस हदीष के ज़री'ए (द्वारा) गोया (मानो) अल्लाह के रसूल ﷺ ने लोगों को यह बावर (भरोसा) कराया है कि कभी अपनी औलाद को अपने लिए बोझ न तसव्वुर (ख़याल) करो, और इस फ़िक्र (चिंता) से परेशान न रहो कि मैं उनको कहां से खिलाने पिलाने और दीगर (अन्य) ज़रूरियात का इंतिज़ाम (बंदोबस्त) करूंगा, जिस ज़ात (हस्ती) ने आप को रिज़्क़ (रोज़ी/खाना) फ़राहम (उपलब्ध) किया है वही उनको भी फ़राहम (उपलब्ध) करेगी, अगर इस तसव्वुर (ख़याल) से मुँह मोड़ कर तुम उनसे हक़-ए-हयात (जीने का अधिकार) सल्ब करने (छीन लेने) के मुजरिम (दोषी) पाए गए तो तुम बहुत बडे़ गुनाह के मुर्तकिब (अपराधी) माने जाओगे और अल्लाह के 'अज़ाब से तुम्हें दो-चार होना पड़ेगा।
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हदीष नंबर:6

खजूर चबा कर मुँह में देना*

{عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ:
وُلِدَ لِي غُلَامٌ، فَآتَيْتُ بِهِ النَّبِيُّ اللهِ، فَسَمَّاهُ إِبْرَاهِيمَ ، فَحَنَّكَهُ بِتَمْرَةٍ وَدَعَا لَهُ بِالْبَرَكَةِ ، وَدَفَعَهُ إِلَيَّ ، وَكَانَ أَكْبَرَ وَلَدِ أَبِي مُوسَى}
[بخاری:۵۷۳۰ ، مسلم:۳۹۹۷]
तर्जमा: हज़रत अबू मूसा अश'अरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है वो कहते हैं कि मेरे यहाँ एक बच्चा पैदा हुआ, मैं उस बच्चे को लेकर नबी-ए-करीम ﷺ की ख़िदमत (सेवा) में हाज़िर हुआ, आप ﷺ ने उसका नाम इब्राहीम रखा, खजूर चबा कर उसके मुंह में रखा, उसके लिए बरकत की दु'आ की और उसके बा'द उसे मेरे हवाले किया, यह अबू मूसा के सबसे बड़े साहब-ज़ादे (बेटा) थे।
[सहीह बुख़ारी:5730, सहीह मुस्लिम:3997]

व्याख्या:
 इस मफ़्हूम (अर्थ/meaning) की मुत'अद्दिद (अनेक/कई) हदीषें हैं जिन से मा'लूम होता है कि सहाबा-ए-किराम अपने नौ-मौलूद (newborn/नवजात) बच्चों को नबी ﷺ के पास ले जाते, आप ﷺ अपनी गोद में बच्चों को लेते और खजूर या छूहारा (dried date) वग़ैरा अपने मुंह में चबा कर उस बच्चे के मुंह में डालते और उसकी ख़ैर-ओ-भलाई के लिए दु'आ भी फ़रमाते।
 बच्चों की अच्छी तर्बियत (शिक्षा) और इस्लामी आदाब-ओ-ता'लीमात से उन्हें जोड़े रखने की कोशिश में से एक कोशिश यह भी है कि पैदाइश के बा'द किसी नेक-ओ-सालेह (परहेज़गार) शख़्स के मुंह से चबाई हुई चीज़ उस बच्चे के मुंह में डाली जाए, हो सकता है कि उस बुज़ुर्ग के सलाह-ओ-तक़्वा (परहेज़-गारी) का असर बच्चे पर भी आए, बच्चे के बत्न (पेट) में पहुंचने वाली इब्तिदाई (शुरू'आती) ग़िज़ाओं (भोजन) में पाक-तीनत (अच्छे आचरण वाले) लोगों के लु'आब-ए-दहन (थूक/saliva) का पहुंचाना उसको हमेशा पाक और हलाल रोज़ी खिलाने की स'ई (कोशिश) का भी इशारा (संकेत) है, इसी तरह 'आलिम-ए-बा-'अमल और सालेह (नेक) शख़्स से बच्चे के हक़ में ख़ैर-ओ-बरकत की दु'आ कराना भी इसी नुक़्ता-ए-नज़र से है।
 ग़ौर करें कि किन किन तरीक़ों से शरी'अत बच्चों की अच्छी तर्बियत (परवरिश) का इंतिज़ाम करती है और इस चीज़ पर किस-क़दर (कितनी) तवज्जोह (ध्यान) सर्फ़ (उपयोग) करती है, क्या मुस्लिम मु'आशरों (societys) में नौ-मौलूद (नवजात/newborn) बच्चों के साथ ऐसा एहतिमाम (बंदोबस्त) किया जाता है ? और क्या मुस्लिम वालिदैन (माँ-बाप) अपने बच्चों की तर्बियत (परवरिश) के त'अल्लुक़ (संबंध) से इतने मुतफ़क्किर (फ़िक्र-मंद/चिंतित) नज़र आते हैं ? अगर नहीं तो इस की तरफ़ तवज्जोह (ध्यान) देने और इस हदीष में मज़कूर (वर्णन/उल्लेखित) 'अमल को अपने घरों और अपने बच्चों पर नाफ़िज़ (लागू/जारी) करने की ज़रूरत है।
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हदीष नंबर:7

नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का 'अक़ीक़ा*

{عَنْ سَمُرَةَ بْنِ جُنُدُبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ :
كُلُّ غُلَامٍ رَهِينَةٌ بِعَقِيقَتِهِ تُذْبَحُ عَنْهُ يَوْمَ سَابِعِهِ وَيُسَمِّى فِيهِ وَيُحْلَقُ رَأْسُهُ}
[ترمذی:١٤٤٢ ، ابو داود:٢٤٥٥ ، نسائی:٤١٤٩ , ابن ماجه:٣١٥٦، احمد:۱۹۲۲۵- صحيح الجامع:٤٥٤١]
तर्जमा: हज़रत समुरा बिन जुंदुब रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: हर बच्चा अपने 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) गिरवी होता है, सातवें दिन उसकी तरफ़ से 'अक़ीक़ा किया जाएगा, उसी रोज़ (दिन) उसका नाम रखा जाएगा और उसका सर मूनडा जाएगा।
[तिर्मिज़ी:1442, अबू दाऊद:2455, नसाई:4149, इब्ने माजा:3156, अहमद:19225, सहीह अल-जामे':4541]

व्याख्या:
 बच्चे की पैदाइश (जन्म) के बा'द उसकी जिस्मानी (शारीरिक) और अख़्लाक़ी (नैतिक) व ईमानी तर्बियत (परवरिश) के सिलसिले की एक कड़ी यह भी है कि सातवें दिन उसकी जानिब (तरफ़) से 'अक़ीक़े का जानवर ज़ब्ह किया जाए, उसका नाम रखा जाए और उसके सर का बाल मूनडा जाए, 'अक़ीक़ा के 'इवज़ (बदले) बच्चे के गिरवी होने का कई मतलब बयान किया गया है जिस में एक राजेह (सहीह) मतलब इमाम अहमद बिन हंबल का बयान-कर्दा (किया हुआ) है कि इससे मुराद वालिदैन (माँ-बाप) की सिफ़ारिश है, या'नी अगर उस बच्चा का 'अक़ीक़ा न किया गया और वो बचपन ही में इंतिक़ाल (निधन/मृत्यु) कर गया तो वो बच्चा अपने वालिदैन (माँ-बाप) के हक़ में सिफ़ारिश नहीं करेगा।
[تحفة الاحوذی:95,94/5]
 'अक़ीक़ा एक इस्लामी शि'आर (तरीक़ा) और नबी-ए-करीम ﷺ की सुन्नत है, बच्चे की तरफ़ से 'अक़ीक़ा में दो बकरा या बकरी और बच्ची की तरफ़ से एक बकरा या बकरी ज़ब्ह करना मसनून (जायज़) है, अलबत्ता (लेकिन) बच्चे (लड़के) की तरफ़ से एक जानवर भी ज़ब्ह करना साबित है।
 'अक़ीक़ा सातवें दिन करना मसनून (जायज़) है, बिला-किसी शदीद (सख़्त) 'उज़्र (मजबूरी) के इस को टालना मुनासिब (ठीक) नहीं, अगर किसी वज्ह (कारण) से सातवें दिन 'अक़ीक़ा न किया जा सका तो बा'द में जब मुयस्सर (संभव/उपलब्ध) हो कर लिया जाए, अलबत्ता (लेकिन) हत्तल-इमकान (जहाँ तक मुम्किन हो) जल्दी करनी चाहिए।
 'अक़ीक़ा के फ़वाइद (फ़ाइदे) मुत'अद्दिद (अनेक) हैं, बा'ज़ (कुछ/चंद) फ़वाइद (फ़ाइदे) बयान करते हुए इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह लिखते हैं कि नौ-मौलूद (newborn/नवजात) की आमद (आने) के मौक़ा' (अवसर) पर यह जानवर ज़ब्ह किया जाता है, इस का फ़ाइदा यह है कि बच्चे को गिरवी रहने से नजात (छुटकारा) दिलाता है, 'अक़ीक़ा बाप को औलाद की सिफ़ारिश मुयस्सर (उपलब्ध) कराता है, 'अक़ीक़ा बच्चे का फ़िदया है जो बच्चे को शैतान के शर (शरारत) से बचाता है, 'अक़ीक़े का एक फ़ाइदा यह भी है कि उसकी वज्ह (कारण) से सातवें दिन दोस्त-ओ-अहबाब और 'अज़ीज़-ओ-अक़ारिब (रिश्तेदार) जम' (इकट्ठा) होते हैं और बच्चे को दु'आ-व-तबरीक (आशीर्वाद) से नवाज़ते हैं।
[तोहफ़तुल-मौदूद बा-अहकाम अल-मौलूद, पेज नंबर:57]
 नाम रखने और सर मुँडवाने से मुत'अल्लिक़ (बारे में) गुफ़्तुगू (बात-चीत) आगे आ रही है।
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हदीष नंबर:8

*नौ-मौलूद (नवजात/newborn) का सर मुँडवाना*

{عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ:
"عَقَّ رَسُولُ اللَّهِ اللهُ عَنِ الحَسَنِ بِشَاةٍ وَقَالَ: يَا فَاطِمَةُ ! اِخْلِقِي رَأْسَهُ وَتَصَدَّقِي بِزِنَةِ شَعْرِهِ فِضَّةٌ، فَوَزَنَتُهُ، فَكَانَ وَزْنُهُ دِرْهَمًا أَوْ بَعْضَ دِرْهَمٍ"}
[صحیح سنن ترمذي:١٢٢٦]
तर्जमा: हज़रत 'अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल ﷺ ने हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की जानिब (तरफ़) से एक बकरी का 'अक़ीक़ा किया, और हज़रत फ़ातिमा से फ़रमाया कि बच्चे का सर मूंड कर उसके बालों के वज़्न-भर (बराबर/समान) चाँदी सदक़ा करो, उन्होंने बालों का वज़्न किया तो एक दिरहम या उससे कुछ कम थे।
[सहीह सुनन तिर्मिज़ी:1226]

व्याख्या:
 दूसरी हदीष से मा'लूम होता है कि सर मूँडने का 'अमल (काम/कार्य) बच्चे की पैदाइश के सातवें दिन अंजाम दिया जाएगा, सर का बाल उतार देने से सर की सफ़ाई हो जाती है, मसामात (छिद्र/छेद) खुल जाते हैं और मैल-कुचैल भी साफ़ हो जाती है, तिब्बी (medical) नुक़्ता-ए-नज़र (दृष्टिकोण) से इस के और दूसरे फ़वाइद (फ़ाइदे) भी हैं, बाल मूँडने के बा'द उसके हम-वज़्न (समान/बराबर) चाँदी सदक़ा करना चाहिए, ता-कि (इसलिए कि) ग़रीबों और मिस्कीनों की ज़रूरत भी पूरी हो।
 अक्सर (बहुत से) वालिदैन (माँ-बाप) शरी'अत (दीन) की इन ता'लीमात से ना-वाक़िफ़ (अपरिचित/अनजान) रहते हैं, और 'अक़ीक़ा के दिन ग़ैर-ज़रूरी (फ़ुज़ूल/फ़ालतू) रस्म-ओ-रिवाज की तकमील (पूरा करने) में मसरूफ़ (व्यस्त/busy) रहते हैं, हमारी शरी'अत ने दीगर (अन्य) उमूर (कामों) की तरह बच्चों से मुत'अल्लिक़ (बारे में) हर मोड़ पर रहनुमाई (guidance) की है और उनकी जिस्मानी-व-अख़्लाक़ी (शारीरिक और नैतिक) हर तरह की तर्बियत (परवरिश) से मुत'अल्लिक़ (बारे में) वाज़ेह (स्पष्ट/साफ़) हिदायात दी हैं, इन हिदायात पर 'अमल (पालन) करना और उन्हें बा'इस-ए-ख़ैर-ओ-बरकत तसव्वुर (ख़याल) करना चाहिए, इस में दीन-ओ-दुनिया दोनों की फ़लाह-ओ-कामयाबी (सफलता/भलाई) मुज़्मर (पोशीदा) है।
 आज देखा जाता है कि क्या बच्चे क्या बड़े, बालों के रख-रखाव (देख-भाल) में फ़िल्मी एक्टरों और गाने बजाने वालों की नक़्क़ाली (अनुकरण) में एक दूसरे से आगे भागने की कोशिश में मसरूफ़ (व्यस्त) हैं, उसके पीछे वो अच्छा-ख़ासा (बहुत) पैसा और वक़्त भी बर्बाद करते हैं, ऐसा किसी भी तरह मुनासिब (ठीक/उचित) नहीं है, वालिदैन (माँ-बाप) की यह ज़िम्मेदारी है कि दीगर (अन्य) चीज़ों की निगरानी और देख-रेख के साथ अपने बच्चों और मातहतों (अधीनों) की वज़'-क़त' (वेशभूषा) और उनके बालों की तज़य्युन-ओ-तरतीब (सजावट) पर भी निगाह (नजर) रखें, जब हमारी शरी'अत ने बच्चे की पैदाइश के पहले ही हफ़्ते में उसके बाल को अपनी तवज्जोह (ध्यान) का मरकज़ बनाया तो यह गोया (मानो) इस बात की तरफ़ इशारा है कि बच्चे के वालिदैन (माँ-बाप) आइंदा (भविष्य में) इस चीज़ को अपनी ज़िम्मेदारी में दाख़िल समझें।
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हदीष नंबर:9

*बच्चों के अच्छे नाम*

{عَنْ أَبِي وَهَبِ الْجُشَمِيِّ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
(تَسَمَّوا بِأَسْمَاءِ الْأَنْبِيَاءِ) وَأَحَبُّ الْأَسْمَاءِ إِلَى اللَّهِ: عَبْدُ اللَّهِ وَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ، وَأَصْدَقُهَا حَارِتٌ وَهَمَّامٌ
وَأَقْبَحُهَا حَرْبٌ وَمُرَّةٌ}
[ابو داود:٤۲۹۹ ، نسائی:۳۵۰۹ ، احمد:۱۸۲۵۸ - الصحيحة: ١٠٤٠]
तर्जमा: हज़रत अबू वहब जुश्मी कहते हैं कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया: तुम अंबिया-ए-किराम वाले नाम रखा करो, अल्लाह-त'आला के नज़दीक सबसे पसंदीदा नाम 'अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान हैं, और तमाम नामों में सदाक़त व सच्चाई वाले नाम हारिस और हमाम हैं, और सबसे बुरे नाम हर्ब (जंग) और मुर्रा (कड़वा) हैं।
[अबू दाऊद:4299, नसाई:3509, अहमद:18258, अल-सहीहा:1040]

व्याख्या:
 बच्चों के त'अल्लुक़ (संबंध) से वालिदैन (माँ-बाप) की यह भी ज़िम्मेदारी है कि उनका अच्छा और मुवाफ़िक़-ए-शर'अ (शरी'अत के मुताबिक़) नाम रखें, अच्छे नामों का इंतिख़ाब (चयन/choice) करते वक़्त शरी'अत की मंशा (मर्ज़ी) को नज़र-अंदाज़ न किया जाए, अच्छे इस्म (नाम) से अच्छे मुसम्मा (शख़्सियत/व्यक्तित्व) की झलक मिलती है, इसलिए बच्चों का नाम रखते वक़्त उन नामों के म'आनी-ओ-मफ़ाहीम (अर्थ/मतलब) पर भी नज़र (ध्यान) रखा जाए, सिर्फ़ (केवल) ज़ाहिरी और सौती-हुस्न (अलफ़ाज़ की ख़ूबसूरती) को न देखा जाए।
 ऐसे तमाम नामों से परहेज़ करना (बचना) चाहिए जिनके म'आनी (मतलब/meanings) ख़राब हो (जैसे: 'आसिया- नाफ़रमानी करने वाली) और जिनसे बद-शुगूनी वाले म'आनी (मतलब) ज़ाहिर होते हो (जैसे: जमरा- आग का अंगारा) और जो अल्लाह की ज़ात के साथ ख़ास हो (जैसे: अल-अहद, अल-समद) और जिन में 'अब्द (बंदे) की निस्बत (संबंध) अल्लाह के 'अलावा किसी और की तरफ़ की गई हो (जैसे: अब्दुल हुसैन- हुसैन का बंदा) और ऐसे नाम जिन से इस्लामी तशख़्ख़ुस (प्रतिष्ठा) पर हर्फ़ (इल्ज़ाम) आए या ग़ैर-मुस्लिमों की मुशाबहत (समानता) लाज़िम आए, मज़्कूरा-बाला हदीष में चंद (कुछ) अच्छे नाम ब-तौर-ए-मिसाल (उदाहरण के तौर पर) पेश किए गए हैं और बा'ज़ (कुछ) ना-मुनासिब (ना-पसंदीदा) नामों की निशान-दही (पहचान) भी की गई है।
 अगर ना-वाक़िफ़ियत (अनजाने/अज्ञानता) की बिना-पर किसी का कोई ना-मुनासिब (ना-पसंदीदा) नाम रख दिया गया हो तो वाक़फ़ियत (जानकारी/'इल्म) होने के बा'द उसको बदल देना चाहिए, बा'ज़ (कुछ) लोग यह ए'तिक़ाद (भरोसा) रखते हैं कि नाम बदलने पर नए सिरे से (दूसरी बार) 'अक़ीक़ा करना होगा, ऐसा ए'तिक़ाद (यक़ीन) दुरुस्त नहीं है, अगर अच्छे और ख़राब नामों में तमीज़ (फ़र्क़) करना आदमी के बस में न हो तो उसे अहल-ए-'इल्म से रुजू' करना चाहिए।
 अफ़सोस के इस वक़्त मुसलमानों में ऐसे नाम ब-कसरत (बहुत ज़्यादा) राइज (प्रचलित/common) हैं जो शर'ई (दीनी) और मा'नवी (वास्तविक) ए'तिबार (विचार) से महल्ल-ए-नज़र (doubtful) हैं, 'इल्म (शिक्षा) की कमी, अग़्यार (ग़ैरों) की तक़लीद (नक़्ल/पैरवी) और कुछ दूसरे अस्बाब (कारण) की बिना पर इन नामों का चलन 'आम है, 'उलमा को चाहिए कि इस सिलसिले में 'अवाम (जनता/public) की रहनुमाई करें और उनके अंदर इस त'अल्लुक़ (संबंध) से बेदारी पैदा करें।
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हदीष नंबर:10

              *ख़त्ना*

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
الفِطْرَةُ خَمْسٌ، أَوْ خَمْسٌ مِنَ الفِطْرَةِ : الخِتَانُ وَالاسْتِحْدَادُ، وَتَقْلِيمُ الْأَطْفَارِ، وَنَتْفُ الأَبْطِ وَقَصُّ : الشارب}
[بخاری:۵۸۸۹، مسلم:٥٩٧]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: फ़ितरी चीज़ें पांच हैं (या फ़रमाया) पाँच चीज़ें फ़ितरी हैं: ख़त्ना करना, ज़ेर-ए-नाफ़ के बाल साफ़ करना, नाख़ुन तराशना (काटना) बग़ल के बाल उखेड़ना और मूँछ काटना।
[सहीह बुख़ारी:5889, सहीह मुस्लिम:597]

व्याख्या:
 या'नी इन ख़सलतों (आदतों) पर इस तरह 'अमल (पालन) करना चाहिए जैसे यह इंसान की फ़ितरत ('आदत/स्वभाव) और ख़मीर (फ़ितरत/nature) का हिस्सा हैं, बा'ज़ (कुछ) रिवायतों में कुछ दूसरे कामों का भी तज़्किरा (उल्लेख/वर्णन) है, बहर-हाल (फिर भी) इन कामों की बड़ी अहमियत है और इंसानी तहारत-व-नज़ाफ़त (पवित्रता/सफ़ाई) का भी यह बहुत बड़ा हिस्सा हैं जिस का ए'तिराफ़ (इक़रार) 'अहद-ए-जदीद (आधुनिक काल) के अतिब्बा (doctors) और साइंस-दानों ने भी किया है।
 ख़त्ना एक बहुत ही अहम (ख़ास) दीनी शि'आर (पहचान) और अहल-ए-इस्लाम (मुसलमानों) की बहुत बड़ी शनाख़्त (निशानी) है, दीगर (अन्य) अंबिया के यहाँ भी इस पर 'अमल का तज़्किरा (उल्लेख) मिलता है, 'अहद-ए-हाज़िर (आधुनिक काल) में 'उलूम-ए-जदीदा (modern sciences) के माहेरीन (experts/विशेषज्ञों) का तो इस की ज़रूरत-व-अहमियत पर एक तरह से इत्तिफ़ाक़ (सहमति) है, और बहुत से ग़ैर-मुस्लिम अर्बाब-ए-'अक़्ल-ओ-दानिश (सूझबूझ वाले लोग) इस्लाम का इक़रार (स्वीकार) न करते हुए भी इस सुन्नत पर 'आमिल ('अमल करने वाले) और कार-बंद (पालन करने वाले) हैं, एड्स जैसे मोहलिक (घातक) और ला-'इलाज (incurable) मरज़ (बीमारी) से तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा/हिफ़ाज़त) के लिए अतिब्बा (डॉक्टर) ने ख़त्ना को सबसे बड़ा ज़री'आ (उपाय) क़रार दिया है।
 ख़त्ना 'उम्र (आयु/age) के किसी भी हिस्सा में कराया जा सकता है, अलबत्ता (लेकिन) बचपन में कराने में ज़्यादा सुहूलत (आसानी) और फ़ाइदा है, वालिदैन (माँ-बाप) और सर-परस्तों की ज़िम्मेदारियों में से एक ज़िम्मेदारी यह भी है कि अपने बच्चों और मातहतों को इस मरहला (चरण) से गुज़ारने का बंदोबस्त करें, और इस्लाम की इस रहनुमाई (निर्देश ) पर बिला-ताख़ीर 'अमल की कोशिश करें, अलहम्दुलिल्लाह इस त'अल्लुक़ (संबंध) से मुसलमानों में बेदारी (निगरानी/व्यवस्था) पाई जाती है, काश कि वो इस सुन्नत पर 'अमल के साथ इस्लाम के इम्तियाज़ (पहचान/विशेषता) और आफ़ाक़ियत से भी वाक़िफ़ (परिचित) होते और दूसरों को वाक़िफ़ (परिचित) कराते।
 अगर किसी वज्ह (कारण) से बचपन में ख़त्ना नहीं कराया जा सका तो बा'द में किसी भी वक़्त उसे ज़रूर कर लिया जाए, भले बुढ़ापे की 'उम्र (age/आयु) को पहुंच चुका हो, इसी तरह जो ग़ैर-मुस्लिम इस्लाम में दाख़िल होते हैं अगर वो मख़्तून नहीं हैं तो उनका भी ख़त्ना कराया जाएगा।
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हदीष नंबर:11

*तर्बियत (परवरिश) में वालिदैन (माँ-बाप) का किरदार*

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهِ
عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلَّا يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَحِّسَانِهِ، كَمَا تُنْتَجُ البَهِيمَةُ بَهِيمَةٌ جَمُعَاءَ، هَلْ تُحِسُّونَ فِيهَا مِنْ جَدْعَاءَ ؟}
[بخاری: ۱۲۷۰، مسلم:٤٨٠٣]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: हर बच्चा दीन-ए-फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ-बाप उसे यहूदी, नसरानी ('ईसाई) या मजूसी (अग्निपूजक) बना देते हैं, जैसे जानवर सहीह-ओ-सालिम (स्वस्थ/तंदुरुस्त) बच्चा को जन्म देता है क्या उसमें तुम्हें कोई कान कटा नज़र आता है ?
[सहीह बुख़ारी:1270, सहीह मुस्लिम:4803]

व्याख्या:
 बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में वालिदैन (माँ-बाप) का जो अहम (महत्वपूर्ण/ख़ास) किरदार (काम) होता है यह हदीष इस को वाज़ेह (स्पष्ट/ज़ाहिर) कर रही है, एक बच्चा जब इस दुनिया में आँखें खोलता है तो उसके अंदर फ़ितरी (क़ुदरती/स्वाभाविक) तौर पर इस्लाम और तौहीद को क़ुबूल करने की सलाहिय्यत (योग्यता) होती है, अगर उस को किसी दूसरे नए 'अक़ीदे और मज़हब (धर्म) की तरफ़ न मोड़ा जाए बल्कि उसके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वो मुसलमान और मुवह्हिद (तौहीद-परस्त/monotheist) ही रहेगा, लेकिन चूँकि बच्चा अपने वालिदैन (माँ-बाप) के साथ बराबर रहता है, उनके अक़्वाल-ओ-आ'माल (बातें और काम) को बराबर सुनता और देखता है, उनकी रहनुमाई (निर्देश/guidance) में ज़िंदगी गुज़ारता है, इस लिए धीरे-धीरे उनके ही 'अक़ीदे की छाप उसके ज़ेहन-ओ-दिमाग़ (mind/बुद्धि) पर पड़ जाती है, चुनांचे (इसलिए) यहूदी वालिदैन (माँ-बाप) के बीच पलने वाला बच्चा यहूदी बन जाता है, इसी तरह 'ईसाई (क्रिश्चियन) मजूसी (अग्निपूजक/zoroaster) और दीगर (दूसरे) 'अक़ीदा (धर्म) के वालिदैन (माँ-बाप) के बीच रहने वाला उस 'अक़ीदा का रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) हामिल हो जाता है।
 'अक़ीदा के साथ अख़्लाक़-ओ-'आदात (आचरण/habits) और दीगर (अन्य) मु'आमलात (काम-काज) में भी वालिदैन (माता-पिता) की तक़लीद (पैरवी) और उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलने की मिसालें (उदाहरण) देखने को मिलती हैं, बच्चा अपने माँ-बाप और गिर्द-ओ-पेश (आसपास) के लोगों को बीड़ी-सिगरेट पीते देखता है तो वो भी इब्तिदाअन (शुरू'-शुरू' में) नक़्क़ाली (अनुकरण) में पीता है फिर उसका 'आदी हो जाता है, नमाज़ पढ़ते और तिलावत करते देखता है तो वो भी इन कामों की अदाएगी की कोशिश करता है।
 इसलिए वालिदैन (माँ-बाप) को बच्चों की तर्बियत (परवरिश) के सिलसिले (विषय) में बहुत हस्सास (होशियार) रहना चाहिए, उनके सामने किसी भी महल्ल-ए-नज़र (doubtful/ग़ैर-वाजिब) और मा'यूब (बुरे) काम से गुरेज़ करना (दूर रहना) चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे अख़्लाक़-ओ-'आदात (आचरण/habits) से ख़ुद मुज़य्यन (तैयार) होकर उनको भी इस की जानिब (तरफ़) राग़िब (आकर्षित) करना चाहिए।
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हदीष नंबर:12

*बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में माँ का किरदार*

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺ:
خَيْرُ نِسَاءِ رَكِبْنَ الْإِبْلَ صَالِحُ نِسَاءِ قُرَيْشٍ، أَحْنَاهُ عَلَى وَلَدٍ فِي صِغَرِهِ وَأَرْعَاهُ عَلَى زَوْجٍ فِي ذَاتِ يَدِهِ}
[بخاری:٤٩٤٦ ، مسلم:٤٥٩١]
तर्जमा: हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: ऊँट की सवारी करने वाली 'औरतों में से सबसे बेहतर क़ुरैश की नेक 'औरतें हैं, जो बच्चों से ज़्यादा प्यार करती हैं और शौहर (पति) के माल-ओ-अस्बाब (property) की ज़्यादा हिफ़ाज़त करती हैं।
[सहीह बुख़ारी:4946, सहीह मुस्लिम:4591]

(ऊँट की सवारी करने वालों से मुराद 'अरब के लोग हैं क्यूँकि (इसलिए कि) ऊँट की सवारी का ज़्यादा रिवाज 'अरबों के यहाँ ही है)
[फ़त्ह-उल-बारी:9/28]

व्याख्या:
 इस हदीष में नेक बीवी (पत्नी) की सिफ़ात (ख़ूबी/गुण) में बच्चों के प्यार और अमानत-ओ-दियानत (हिफ़ाज़त और ईमानदारी) को बयान किया गया है, या'नी (अर्थात) बीवी के इंतिख़ाब (चयन/पसंद) के वक़्त इन सिफ़ात (ख़ूबी) को मद्द-ए-नज़र (सामने) रखा जाए और इन सिफ़ात (ख़ूबी) से मुत्तसिफ़ (ख़ूबियाँ रखने वाली) 'औरतों को ज़ौजिय्यत (निकाह) में लाया जाए।
 बच्चों की तर्बियत (परवरिश) में माँ का किरदार (काम/role) बेहद (बहुत) अहम (ख़ास) होता है और शफ़क़त-ओ-मोहब्बत (दया/ममता) और प्यार के बरताव (व्यवहार) का बच्चों की नफ़्सियात (psychology) पर बड़ा असर होता है, यह प्यार बच्चे को माँ से ही मिलता है क्यूँकि (इसलिए कि) उसका ज़्यादातर (अधिकतर/mostly) वक़्त माँ के साथ गुज़रता (बीतता) है, इस इब्तिदाई (शुरू'आती) मरहला (चरण/stage) ही में बच्चे को अगर माँ का प्यार नहीं मिला, या प्यार के ब-जाए (बदले में) हमेशा डाँट-डपट, ज़ज्र-ओ-तौबीख़ (ला'नत-मलामत) और बात बात पर (हमेशा) पिटाई झेलनी पड़े तो बच्चा ज़िद्दी हो जाता है और अच्छे 'आदात-ओ-अतवार (स्वभाव और व्यवहार) से उसकी आरास्तगी (तैयारी) मुश्किल हो जाती है।
 जदीद (नई/modern) तहज़ीब (culture) ने तो बच्चों से उनकी माँओं का प्यार और लुत्फ़-ओ-मोहब्बत (दया/प्रेम) ही छीन लिया है, मुलाज़मत (नौकरी) और आमदनी (income) का चक्कर बच्चे को माँ से मिलने का मौक़ा' कम देता है, दूसरा यह कि फैशन-ज़दा (fashionable) माँएं अपनी गोद में बच्चों को रखने और खिलाने में गोया (मानो) अपनी तौहीन (बे'इज़्ज़ती) महसूस (feel) करती हैं, नतीजा (मतलब) यह बच्चे ख़ादिमाओं (नौकरानियों) की गोद में मिलते हैं, ज़ाहिर (स्पष्ट) बात है कि उजरत (मज़दूरी) पर काम करने वाली यह ख़ादिमाएं (नौकरानियां) बच्चों को माँ जैसा प्यार नहीं दे सकती, अगर यह ख़ादिमाएं (नौकरानियां) 'अक़ीदा-ओ-अख़्लाक़ (ईमान और अच्छे स्वभाव) की ख़राबी में मुब्तला हों तो यह ख़राबी बच्चों में भी मुंतक़िल होना लाज़िमी अम्र (समस्या) है।
 लिहाज़ा (इसलिए) मांओं की यह ज़िम्मेदारी है कि अपने नौनिहालों (बच्चों) को अपने से क़रीब (पास) रखें, उनके साथ शफ़क़त (मामता/रहम) और प्यार का बरताव (व्यवहार) करें और उनकी हमा-जिहत (हर तरफ़ से) नश्व-ओ-नुमा (परवरिश) का ख़याल रखें, ता-कि (इसलिए कि) आगे चल कर यह बच्चे उनकी आँखों की ठंडक बनें।
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બચ્ચોં કી તરબિયત (પરવરિશ) સે મુતઅલ્લિક ચાલીસ અહાદીસ

બચ્ચોં કી તરબિયત (પરવરિશ) સે મુતઅલ્લિક ચાલીસ અહાદીસ

લેખક: શૈખ અસઅદ આઝમી
(જામિઆ સલફિયા બનારસ)



હદીસ નંબર: 1

નેક બીવી (પત્ની) કા ઇન્તીખાબ (ચયન)

{عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ:
تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لِأَرْبَعٍ لِمَالِهَا وَلِحَسَبِهَا وَلِجَمَالِهَا وَلِدِينِهَا، فَاظْفَرْ بِذَاتِ الدِّينِ تَرِبَتْ يَدَاكَ}
[બુખારી: 4700, મુસ્લિમ: 2661]

તરજુમા: હઝરત અબૂ હુરૈરા રઝિયલ્લાહુ અન્હુ સે રિવાયત છે કે નબી કરીમ ﷺ ને ફરમાયા: “ઔરત સે ચાર ચીજોં કી વજહ સે નિકાહ કિયા જાતા હૈ: ઉસ્કે માલ કી વજહ સે, ઉસ્કે ખાનદાની હસબ-ઓ-નસબ કી વજહ સે, ઉસ્કે હુસ્ન-ઓ-જમાલ કી વજહ સે, ઔર ઉસ્કે દીન કી વજહ સે, લેહાઝા તુમ દીનદાર ઔરત સે નિકાહ કરો, કામયાબ હો જાઓગે.”

વ્યાખ્યા:
ઇસ હદીસ મેં બતાયા ગયા હૈ કે લોગ પોતાની શરીક-એ-હયાત (પત્ની) કે ઇન્તીખાબ કે વકત ચાર ચીજોં દેખતે હૈં:
1- માલ-ઓ-દૌલત,
2- ઊંચે ખાનદાન,
3- હુસ્ન-ઓ-જમાલ,
4- દીનદારી।

લેકિન નબી કરીમ ﷺ ને તાકીદ ફરમાઇ હૈ કે પત્ની કા ઇન્તીખાબ કરતી વખતે દીનદારી કો અહમિયત દો। દીનદાર પત્ની હી અસલી સરમાયા હૈ, જિસ પર દુનિયા ઔર આખિરત કી કામયાબી કા દર-ઓ-મદાર હૈ। બાકી તીન ચીજેં દીનદારી કે મુકાબલે મેં કિસી ખાસ અહમિયત નહીં રાખતીં।

નેક બીવી ઘર કે માહોલ કો બહતર બનાવેતી હૈ ઔર ઉસ્કી કોખ સે પેદા હોને વાલી ઔલાદ પર ભી નેકી કે અસરાત હોંગે। દીનદાર ઔરત અપને બચ્ચોં કો અચ્છી તરબિયત દેતી હૈ ઔર ગુમરાહી સે બચાતી હૈ।

ઇસ કે બરઅક્સ, જો ઔરત દીન ઔર અખલાક સે ખાલી હો, તો ના ઘર કા માહોલ બહતર હોતો હૈ ઔર ના હી બચ્ચોં કી સાચી તરબિયત હો પાતી હૈ। જો લોગ સિરફ દુનિયા કી ચમક-દમક, દૌલત ઔર ખૂબસૂરતી કે પીછે ભાગતે હૈં, વો અકસર બાદ મેં પછતાતે હૈં ઔર ઉનકી જિંદગી કા સુકૂન ખરાબ હો જાતો હૈ।

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અલ-અકીદહ

 બિસ્મિલ્લાહિર રહમાનિર રહીમ


અલ-અકીદહ


બિલા શુબહ સારી ત’અરીફ અલ્લાહ હી કે લિએ લાઈક હે. હમ ઉસકી ત'અરીફ કરતે હૈં ઔર ઉસીસે મદદ તલબ કરતે હૈં. ઔર ઉસીકી બારગાહમેં તવબા કરતે હૈ. હમ અપને નફસકી બુરાઈ ઔર હમારે બુરે અ'અમાલકી નહૂસતસે અલ્લાહકી પનાહ ચાહતે હૈં. અલ્લાહ જિસકો હિદાયતદે, ઉસે કોઈ ગુમરાહ નહીં કર સકતા ઔર જિસકો અલ્લાહ ગુમરાહ કર દે, ઉસે કોઈ હિદાયત નહીં દે સકતા. હમ ગવાહી દેતે હૈં કે તન્હા અલ્લાહ કે સિવા કોઈ મ'અબૂદે બરહક નહીં હે. ઉસકા કોઈ હિસ્સેદાર નહીં હે. ઔર હમ ગવાહી દેતે હૈં કે મુહમ્મદ  ઉસકે બંદે ઔર ઉસકે રસૂલ હે. અલ્લાહકી રહમત હો આપ પર ઔર આપ કે ઘરવાલોં પર ઔર આપ ; કે તમામ સાથીયોં ૫૨.

અલ્લાહ તઆલા કુરઆનમેં ફરમાતા હે :


તરજુમાઃ અય ઈમાન વાલો ! અલ્લાહ સે ઈતનાહી ડરો જીતના ઉસસે ડરના ચાહિયે ઔર દેખો મરતે દમ તક મુસલમાન હી રહના. (સૂરઃ આલે ઈમરાન - ૧૦૨)


તરજુમા : અય ઈન્સાનોં ! ડરો અપને રબસે, જિસને તુમકો એક હી જાનસે પયદા ફરમાયા. ઔર ઉસીસે ઉસકા જોળાભી બનાદિયા. ફિર ઉન દોનોસે બહુતસે મર્દ ઔર ઔરત બના કર દુનિયામેં કૈલા દિયે, અલ્લાહ સે ડરતે રહો જિસકે નામ પર રહમકી દરખ્વાસ્ત કરતે હોં (ઔર આપસમેં વાસ્તા દેતે હો ઔર રિશ્તે-નાતેકા ભી ખ્યાલ રખ્ખો ઔર ભૂલો મત કે) અલ્લાહકી તુમ પર કળી નિગરાની હે. (સૂરઃ નિસાઅ-૧)


તરજુમા : અય ઈમાનવાલોં ! અલ્લાહસે ડરો ! ( ઉસકી ઈતાઅત કરતે હુએ) બાત સીધી ઔર ઠીક ઠીક કરો. ઐસા કરોગે, તો અલ્લાહ તુમ્હારે કામ સંવાર દેગા ઔર તુમ્હારે કુસૂર મુઆફ કર દેગા. ઔર (સુન લો) જો કોઈભી કહા માન ગયા અલ્લાહકા ઔર ઉસકે રસૂલકા, તો વો બળી ભારી કામયાબી હાસિલ કર ચુકા. (સૂરઃ અહઝાબ-૭૦)

સબસે સચ્ચી બાત અલ્લાહકી કિતાબ હે. ઔર બેહતરીન રાહ મુહમ્મદ કી રાહ હે. દીને ઈસ્લામમેં સબસે ખતરનાક ઔર બુરી વો ચીઝેં ઔર વો બાતે હેં જિન્હે ઈન્સાનને કુરઆન ઔર હદીષકી રોશનીસે હટકર ખૂદ અપની તરફસે ઘડકર ઈસ્લામમેં દાખિલ કર દી હો. ઐસી હી બાતોંકો બિદઅત કહા જાતા હે. ઔર હર બિદઅત ગુમરાહી હે. ઔર હર ગુમરાહી જહન્નમ મેં લે જાએગી.

જિન્નાત ઔર ઈન્સાનોંકા મકસદે વુજૂદ


હમ સબકો યે મ’અલૂમ હોના ચાહીએ કે અલ્લાહ તબારક વ તઆલાને હર ચીઝકો કોઈ ન કોઈ હિકમત ઔર મકસદ સામને રખકર પૈદા ફરમાયા હૈ.


જિસકો વો જાનતા હે ઔર ચાહતા હે. મુસલમાનકે લિએ યે ઝરૂરી હે કે વો હુક્મે ઈલાહીકો કુબૂલ કરે ઔર ફરમાંબરદારી ઈખ્તિયાર કરે. ઈસ હુકમે ઈલાહીકી મસ્લિહત વ હિકમત ઉસકી સમઝમેં આ ગઈ, તો સોને પર સુહાગા હે. ઔર અગર હુકમે ઈલાહીકી હિકમત સમઝમે નહી આતી, તબભી, ઉસકો હુકમે ઈલાહીકા માનના ઝરૂરી વ લાઝમી હે. ક્યૂકે ઈન્સાની અકલ હર હિકમતકો સમઝ નહીં સકતી હે. સહાબા કિરામ (રઝિ.) કુરઆન વ અહાદીષમેં બયાન કિએ હુએ અહકામકી ઈતાઅત કરતે થે. ઔર હરામ કી હુઈ બાતો સે દૂર-દૂર રહતે થે. હિકમત વ મસ્લિહતકે જાનનેકે પીછે ન પળતે થે.


હઝરત ઉમર (રઝિ.) કા વાકિઆ ઈસ બાતકી બેહતરીન મિષાલ હે. હઝરત ઉમર (રઝિ.) જબ હજરે અસ્વદકો બોસા દેનેકે લિએ આએ તો ફરમાયા, ‘“મેં અચ્છી તરહ જાનતા હૂં કે તૂ પથ્થર હે, ન કિસીકો નુકસાન પહુંચા સકતા હે ઔર ન ફાએદહ. અગર મૈં રસૂલુલ્લાહ ુદ કો તુઝે ચૂમતે હુએ ન દેખતા તો મૈં તુઝકો ન ચૂમતા.” (બુખારી, મુસ્લિમ)


અલ્લાહ તબારક વ તઆલાને જિન્નો વ ઈન્સાનોકો એક અઝીમુશાન હિકમતકે તહત પૈદા ફરમાયા હે. વો હિકમત વ મકસદ સિર્ફ તન્હા અલ્લાહ સુબ્હાનહુ વ તઆલાકી બંદગી કરના હે.


તરજુમા : મૈંને જિન્નાતોં ઔર ઈન્સાનોંકો અપની ઈબાદતકે લિ પયદા કિયા હૈ. (સૂરઃ ઝારિયાત-૫૬)


બંદગી ઔર ઈબાદત સે મકસૂદ, તૌહીદ હે. અલ્લાહ અઝ વ જલ્લ-ઈસ બાતકો સાફ તૌર પર બયાન કિયા હૈ.


તરજુમા ઃ જબકે ઉન્હેં સિર્ફ યહી હુકમ દિયા ગયા થા, કે એક અલ્લાહ કી યકસુ હોકર ઈબાદત કરેં ઔર અપના દીન ઉસીકે લિએ ખાલિસ ઔર નમાઝ કાઈમ કરેં ઔર ઝકાત અદા કરેં. ઈન્તેઝામી બંદોબસ્ત વાલા યહી અસલ દીન હૈ.

 (સૂર:બય્યિનહ-૫)

ترجمہ قرآن

سورۃ الماعون
 Surah Al-Ma'un 107
  بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ ۝١
فَذَٰلِكَ الَّذِي يَدُعُّ الْيَتِيمَ ۝٢
وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ ۝٣
فَوَيْلٌ لِلْمُصَلِّينَ ۝٤
الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ ۝٥
الَّذِينَ هُمْ يُرَاءُونَ ۝٦
وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ ۝٧
سورۃ الماعون مکی ہے، اس میں سات آیتیں، اور ایک رکوع ہے ۔ تفسیر سورۃ الماعون نام : آخری آیت میں لفظ ﴿ الماعون آیا ہے، یہی اس سورت کا نام رکھ دیا گیا ہے اس کے دو نام اور ہیں، سورۃ الدین اور سورۃ الیتیم زمانہ نزول : عطاء اور جابر کے نزدیک یہ سورت مکی ہے اور یہی ابن عباس (رض) کا بھی ایک قول ہے اور قتادہ اور دیگر علماء کے نزدیک مدنی ہے ابن مردویہ نے ابن عباس (رض) سے روایت کی ہے کہ ﴿ أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ Ĭ مکہ میں نازل ہوئی تھی۔

[١] دین کے چار معنی :۔ دین کا لفظ چار معنوں میں آتا ہے۔ (١) اللہ تعالیٰ کی کامل اور مکمل حاکمیت (٢) انسان کی مکمل عبودیت اور بندگی (٣) قانون جزا و سزا (٤) قانون جزا و سزا کے نفاذ کی قدرت۔ کفار مکہ ان چاروں باتوں کے منکر تھے۔ وہ صرف ایک اللہ ہی کو الٰہ نہیں مانتے تھے بلکہ اپنی عبادت میں دوسرے معبودوں کو بھی شریک کرتے تھے۔ اللہ کے قانون جزا و سزا کے بھی منکر تھے اور آخرت کے بھی۔ اس آیت میں اگرچہ بظاہر خطاب آپ صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم کو ہے لیکن تبصرہ کفار مکہ پر ہے کہ انکار آخرت نے ان میں کون سی معاشرتی اور اخلاقی برائیاں پیدا کردی تھیں

أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ


ترجمہ جوناگڑھی
کیا تو نے دیکھا جو (روز) جزا کو جھٹلاتا ہے (١)۔


تفسیر فہم القرآن
فہم القرآن: (آیت 1 سے 7) ربط سورت : قریش کی ناشکری اور کفر و شرک کا سب سے بڑا سبب یہ تھا کہ وہ قیامت کی جواب دہی کے عقیدہ پر یقین نہیں رکھتے تھے۔ ” اَلدِّیْنِ“ کا لفظ قرآن مجید نے کئی معنوں میں استعمال کیا ہے۔ سیاق وسباق کے حوالے سے دیکھا جائے تو یہاں ” اَلدِّیْنِ“ کا لفظ قیامت کے لیے استعمال ہوا ہے۔ ارشاد ہوا کہ کیا آپ نے اس شخص کو نہیں دیکھا جو قیامت کو جھٹلاتا ہے یہ ایسا شخص ہے جو یتیم کو دھکے دیتا ہے اور مسکین کو کھانا کھلانے کی ترغیب نہیں دیتا۔ یاد رہے کہ جس شخص کا قیامت پر ایمان نہیں ہوتا وہ نیکی اس جذبے کے ساتھ نہیں کرتا کہ مرنے کے بعد اسے اس کا اجر دیا جائے گا۔ ایسا شخص مال کی محبت میں دوسرے لوگوں سے سخت اور حریص ہوتا ہے وہ ایسی جگہ پر مال خرچ نہیں کرتا جہاں اسے کسی مفاد کے حصول کی توقع نہیں ہوتی، یہی وجہ ہے کہ اس شخص کے بارے میں کہا گیا ہے کہ آپ ایسے شخص کے کردار کو نہیں جانتے جو یتیم کو دھکے دیتا ہے اور دوسرے کو مسکین کو کھانا کھلانے کی تلقین نہیں کرتا۔ یہاں مسکین کو خود کھانانہ کھلانے کی بجائے دوسرے کو ترغیب نہ دینے کی بات کی گئی ہے جس کا واضح مطلب یہ ہے کہ آدمی کو نہ صرف خود یتیم اور مسکین کے حقوق کا خیال رکھنا چاہیے بلکہ دوسروں کو بھی ان کے حقوق ادا کرنے کی تلقین کرنی چاہیے۔ جس معاشرے میں یتیم کو دھکے دیئے جائیں اور مسکین بھوکے پھریں وہ معاشرہ اعتقاداً یا عملاً قیامت کا منکر ہوتا ہے اور باہمی محبت سے محروم ہوجاتا ہے اس سے نفرتیں جنم لیتی ہیں، جس معاشرے میں نفرتیں ایک حد سے آگے بڑھ جائیں، وہ معاشرہ ٹوٹ پھوٹ کا شکار ہوجاتا ہے اور بالآخر اس قوم کا وجود باقی نہیں رہتا۔ ایسے معاشرے اور قوم کودنیا میں بھی اپنے کیے کی سزا ملتی ہے اور آخرت میں بھی اس سے مسؤلیّت ہوگی۔ اعتقاداً یا عملاً قیامت کی تکذیب کرنے والے شخص کی حالت یہ ہوتی ہے کہ اس کے دل میں نماز پڑھنے کا جذبہ پیدا نہیں ہوتا اگر عادتاً یا ماحول کی مجبوری سے اسے نماز پڑھنی پڑے تو وہ نماز سے بے خبر ہوتا ہے کیونکہ یہ لوگ عادتاً یا لوگوں کو دکھانے کے لیے نماز پڑھتے ہیں اس لیے ایسے لوگ اخلاقی اعتبار سے اس قدر گرے ہوئے ہوتے ہیں کہ اپنے عزیز و اقرباء اور اڑوس پڑوس میں برتنے کے لیے معمولی چیز بھی کسی کو نہیں دیتے۔ مثلاً ماچس، نمک، مرچ، استعمال کرنے کے لیے چھری، کلہاڑی، سائیکل اور انتہائی مجبوری کے وقت اپنی گاڑی پر کسی کو سوار کرنے کے لیے تیار نہیں ہوتے۔” ساھون“ کے مفسرین نے چار مفہوم ذکر کیے ہیں۔ 1۔ نماز پڑھنا مگر اکثر اوقات نماز کے مقصد سے بے خبررہنا۔ 2۔ وقت پر نماز ادا کرنے کی بجائے بے وقت اٹھنا اور جلدی جلدی ٹھونگے مارنا۔ 3۔ پانچ نمازیں پڑھنے کی بجائے کچھ کو چھوڑ دینا۔ ٤۔ کلیتاً نماز کی ادائیگی سے غافل رہنا۔ (عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ (رض) أَنَّ النَّبِیَّ (ﷺ) بَعَثَ مُعَاذًا إِلَی الْیَمَنِ فَقَالَ اُدْعُھُمْ إِلٰی شَھَادَۃِ أَنْ لَّاإِلٰہَ إِلَّا اللّٰہُ وَأَنِّیْ رَسُوْلُ اللّٰہِ فَإِنْ ھُمْ أَطَاعُوْا لِذٰلِکَ فَأَعْلِمْھُمْ أَنَّ اللّٰہَ قَدِ افْتَرَضَ عَلَیْھِمْ خَمْسَ صَلَوَاتٍ فِیْ کُلِّ یَوْمٍ وَّلَیْلَۃٍ فَإِنْ ھُمْ أَطَاعُوْا لِذٰلِکَ فَأَعْلِمْھُمْ أَنَّ اللّٰہَ افْتَرَضَ عَلَیْھِمْ صَدَقَۃً فِیْ أَمْوَالِھِمْ تُؤْخَذُ مِنْ أَغْنِیَائِھِمْ وَتُرَدُّ عَلٰی فُقَرَائِھِمْ) (رواہ البخاری : کتاب الزکوٰۃ، باب وجوب الزکوٰۃ) ” حضرت عبداللہ بن عباس (رض) بیان کرتے ہیں نبی کریم (ﷺ) نے حضرت معاذ (رض) کو یمن کی طرف بھیجتے ہوئے فرمایا کہ یمن والوں کو دعوت دینا کہ وہ گواہی دیں کہ اللہ کے علاوہ کوئی معبود نہیں اور یقیناً میں اللہ کا رسول ہوں اگر وہ آپ کی بات مان لیں تو انہیں بتلائیں کہ اللہ تعالیٰ نے ان پر دن رات میں پانچ نمازیں فرض کی ہیں اگر وہ اس کو بھی مان لیں تو انہیں بتاؤ کہ اللہ تعالیٰ نے ان پر ان کے اموال میں زکوٰۃ فرض کی ہے جو ان کے امیروں سے لے کر ان کے غریبوں میں تقسیم کی جائے گی۔“ (عَنِ ابْنِ الزُّبَیْرِ یَقُولُ سَمِعْتُ رَسُول اللَّہ (ﷺ) یَقُولُ لَیْسَ الْمُؤْمِنُ الَّذِی یَشْبَعُ وَجَارُہُ جَائِعٌ إِلَی جَنْبِہِ) (رواہ البیھیقی : باب صاحِبِ الْمَالِ لاَ یَمْنَعُ الْمُضْطَرَّ فَضْلاً إِنْ کَانَ عِنْدَہُ) ” حضرت عبداللہ بن زبیر (رض) کہتے ہیں کہ میں نے نبی اکرم (ﷺ) کو فرماتے سنا۔ وہ شخص مومن نہیں ہوسکتا جس نے سیر ہو کر کھایا لیکن اس کا ہمسایہ اس کے پہلو میں بھوکا رہا۔“ (عَنْ سَہْلٍ (رض) قَالَ رَسُول اللّٰہِ (ﷺ) أَنَا وَکَافِلُ الْیَتِیمِ فِی الْجَنَّۃِ ہَکَذَا وَأَشَار بالسَّبَّابَۃِ وَالْوُسْطٰی، وَفَرَّجَ بَیْنَہُمَا شَیْئًا) (رواہ البخاری : باب فضل من یعول یتیما) ” حضرت سہل (رض) بیان کرتے ہیں رسول اللہ (ﷺ) نے فرمایا : میں اور یتیم کی کفالت کرنے والا جنت میں اس طرح ہوں گے۔ آپ نے شہادت اور درمیانی انگلی سے اشارہ فرمایا اور ان کے درمیان تھوڑا سافاصلہ رکھا۔“ ( عَنْ عَبْدِ اللہِ الْمُزَنِیّ قَالَ قَالَ (ﷺ) إِذَا اشْتَرَی أَحَدُکُمْ لَحْمًا فَلْیُکْثِرْ مَرَقَتَہُ فَإِنْ لَمْ یَجِدْ لَحْمًا أَصَابَ مَرَقَۃً وَہُوَ أَحَدُ اللَّحْمَیْنِ) (رواہ الترمذی : بَابُ مَا جَاءَ فِی إِکْثَارِ مَاءِ الْمَرَقَۃِ، ہَذَا حَدِیثٌ غَرِیبٌ) ” حضرت عبداللہ مزنی بیان کرتے ہیں رسول اللہ (ﷺ) نے فرمایا جب تم میں سے کوئی گوشت پکائے تو اس کا شوربا زیادہ بنائے کیونکہ اگر گوشت کم ہوجائے تو شوربا میسر ہوگا اور شوربا بھی گوشت کا حصہ ہے۔“ الدّین سے مراد : قانون (یوسف :76)، اطاعت (الزمر : 1تا3)، نظام حکومت (المومن :26)، دین (مذہب) (التوبہ :29) قیامت کے دن (الانفطار : 10تا 19، الفاتحہ :3) مزید تفصیل کے لیے ایک مرتبہ پھر البیّنہ کی تفسیر ملاحظہ فرمائیں۔ مسائل: 1۔ جو شخص یتیم کو دھکے دیتا ہے اور مسکین کو کھانا کھلانے کی ترغیب نہیں دیتا وہ اعتقاداً یا عملاً قیامت کو جھٹلاتا ہے۔ 2۔ ان نمازیوں کے لیے بربادی ہے جو اپنی نمازوں سے غافل رہتے ہیں۔ 3۔ وہ شخص بھی برباد ہوگا جو دکھلاوے کے لیے نماز ادا کرتا ہے۔ 4۔ اس شخص کے لیے ہلاکت ہوگی جو استعمال کے لیے معمولی چیزیں بھی ضرورت مند کو نہیں دیتا۔ تفسیر بالقرآن: قیامت کو جھٹلانے والے کی سزا : 1۔ اللہ تعالیٰ کی آیات اور آخرت کو جھٹلانے والوں کے اعمال ضائع ہوجائیں گے۔ (الاعراف :147) 2۔ آخرت کے منکروں کی خواہشات کے پیچھے نہیں لگنا چاہیے۔ ( الانعام :151) 3۔ قیامت کے منکر حسرت وافسوس کا اظہار کریں گے۔ (الانعام :31) (الفرقان :11) 4۔ قیامت کے منکر ” اللہ“ کی رحمت سے مایوس ہوں گے۔ (العنکبوت :23) 5۔ قیامت کو جھٹلانے اور لوگوں کو اللہ کے راستہ سے روکنے والے کے لیے جلا دینے والا عذاب ہوگا۔ (الحج :9) 6۔ اللہ کی آیات کے ساتھ کفر کرنے والے اور قیامت کو جھٹلانے والے عذاب میں مبتلا کیے جائیں گے۔ (الروم :16)

سورت کے اہم اسباق
یتیموں کے ساتھ اچھا سلوک کرنا چاہیے۔
غریبوں کی مدد کرنی چاہیے۔
نماز اخلاص کے ساتھ پڑھنی چاہیے۔
ریاکاری بہت بڑا گناہ ہے۔
چھوٹی چھوٹی مدد بھی نیکی ہے۔
   سورۃ الكوثر
(إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ ۝ فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ ۝ إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ)
شانِ نزول
جب نبی کریم ﷺ کے صاحبزادے (خصوصاً حضرت قاسمؓ یا حضرت عبداللہؓ) کا انتقال ہوا تو کفارِ مکہ، خاص طور پر عاص بن وائل نے کہا کہ محمد ﷺ ابتر ہیں (یعنی ان کی نسل ختم ہوگئی، ان کے بعد ان کا نام لینے والا کوئی نہیں رہے گا)۔
اس پر اللہ تعالیٰ نے یہ سورت نازل فرمائی اور فرمایا کہ اصل میں آپ ﷺ کے دشمن ہی ابتر ہیں، اور اللہ نے آپ ﷺ کو الکوثر عطا فرمایا۔
تفسیر
1. إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ
ترجمہ:
بے شک ہم نے آپ کو کوثر عطا کیا۔
الکوثر کے معنی:
بہت زیادہ خیر۔
اور جنت میں ایک خاص نہر کا نام بھی ہے جو نبی ﷺ کو عطا کی گئی۔
2. فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ
ترجمہ:
پس آپ اپنے رب کے لیے نماز پڑھیں اور قربانی کریں۔
یعنی اللہ کی نعمت کے شکر میں خالص اللہ کے لیے عبادت کریں۔
3. إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ
ترجمہ:
بے شک آپ کا دشمن ہی بے نام و نشان ہے۔
یعنی جو آپ ﷺ سے دشمنی رکھتا ہے، اصل محروم وہی ہے۔

إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ — مزید تفسیر
لفظی ترجمہ
إِنَّا = بے شک ہم نے
أَعْطَيْنَاكَ = آپ کو عطا کیا
الْكَوْثَرَ = بہت زیادہ خیر
یعنی:
“بے شک ہم نے آپ ﷺ کو بہت زیادہ بھلائی عطا فرمائی ہے۔”
الکوثر کے معنی
1. کثرتِ خیر
اکثر مفسرین کے نزدیک الکوثر کا اصل معنی ہے:
بہت زیادہ اور بے شمار خیر
اس میں شامل ہیں:
نبوت
قرآنِ کریم
علم
حکمت
امتِ مسلمہ
شفاعت
مقامِ محمود
حوضِ کوثر
جنت کی نہر
یعنی اللہ تعالیٰ نے نبی کریم ﷺ کو دنیا و آخرت کی بے شمار نعمتیں عطا فرمائیں۔
2. جنت کی نہر
صحیح حدیث میں آیا ہے کہ الکوثر جنت کی ایک نہر ہے۔
نبی کریم ﷺ نے فرمایا:
هو نهرٌ أعطانيه ربي في الجنة
“وہ ایک نہر ہے جو میرے رب نے مجھے جنت میں عطا فرمائی ہے۔”
(صحیح بخاری)
اس کا پانی دودھ سے زیادہ سفید، شہد سے زیادہ میٹھا، اور اس کے کنارے موتیوں کے ہیں۔
اس آیت میں تسلی
کفار نبی ﷺ کو ابتر کہتے تھے، یعنی بے نسل اور بے نام۔
اللہ تعالیٰ نے جواب دیا کہ:
آپ محروم نہیں، بلکہ ہم نے آپ کو الکوثر عطا کیا ہے۔
یعنی آپ ﷺ کو اتنی عظیم نعمتیں دی گئی ہیں کہ دنیا و آخرت میں آپ کا ذکر ہمیشہ باقی رہے گا۔
آج پوری دنیا میں اذان، درود، نماز، خطبہ—ہر جگہ نبی ﷺ کا نام بلند ہے۔
سبق
اللہ کی نعمتوں پر شکر کرنا چاہیے
دشمنوں کی باتوں سے مایوس نہیں ہونا چاہیے
اصل عزت اللہ کے ہاتھ میں ہے
نبی ﷺ کی شان بہت بلند ہے
یہ ایک مختصر سورت ہے مگر اس میں نبی کریم ﷺ کی عظیم فضیلت بیان ہوئی ہے۔
         
      سورہ اخلاص 

شان نزول سنن ترمذی 3364
                      ابی بن کعب 
ترجمہ : ابی بن کعب رضی اللہ عنہ سے روایت ہے، مشرکین نے رسول اللہ ﷺ سے کہا: آپ اپنے رب کا نسب ہمیں بتائیے۔ اس پر اللہ تعالیٰ نے { قُلْ ہُوَ اللَّہُ أَحَدٌ اللَّہُ الصَّمَدُ } ۱؎ نازل فرمائی، اور صمد وہ ہے جو نہ کسی سے پیدا ہوا اور نہ اس سے کوئی پیدا ہواہو، - اس لیے (اصول یہ ہے کہ ) جو بھی کوئی چیز پیدا ہوگی وہ ضرور مرے گی اور جو بھی کوئی چیز مرے گی اس کا وارث ہو گا، اور اللہ عزوجل کی ذات ایسی ہے کہ نہ وہ مرے گی اور نہ ہی اس کاکوئی وارث ہو گا، {وَلَمْ یَکُنْ لَہُ کُفُوًا أَحَدٌ} (اور نہ اس کا کوئی کفو (ہمسر) ہے، راوی کہتے ہیں: کفو یعنی اس کے مشابہ اور برابر کوئی نہیں ہے، اور نہ ہی اس جیسا کوئی ہے۔
                                فضیلت
 عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ أَنَّ رَجُلًا سَمِعَ رَجُلًا يَقْرَأُ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ يُرَدِّدُهَا فَلَمَّا أَصْبَحَ جَاءَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ وَكَأَنَّ الرَّجُلَ يَتَقَالُّهَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ إِنَّهَا لَتَعْدِلُ ثُلُثَ الْقُرْآنِ۔ بُخاری 5013
حضرت ابو سعید خدری رضی اللہ عنہ نے کہ ایک صحابی ( خود ابو سعید خدری ) نے ایک دوسرے صحابی ( قتادہ بن نعمان رضی اللہ عنہ ) اپنے ماں جائے بھائی کو دیکھا کہ وہ رات کو سورۃ قل ھو اللہ بار بار پڑھ رہے ہیں ۔ صبح ہوئی تو وہ صحابی ( ابو سعید رضی اللہ عنہ ) رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی خدمت میں حاضر ہوئے اور آنحضرت سے اس کا ذکر کیا گویا انہوں نے سمجھا کہ اس میں کوئی بڑا ثواب 
نہ ہوگا ۔ آنحضرت نے فرمایا کہ اس ذات کی قسم جس کے ہاتھ میں میری جان ہے ! یہ سورت قرآن مجید کے ایک تہائی حصہ کے برابر ہے۔

جو سورہ اخلاص سے محبت کرتا ہے اللہ اس سے محبت کرتا ہے
عَنْ عَائِشَةَ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَعَثَ رَجُلًا عَلَى سَرِيَّةٍ وَكَانَ يَقْرَأُ لِأَصْحَابِهِ فِي صَلَاتِهِمْ فَيَخْتِمُ بِقُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ فَلَمَّا رَجَعُوا ذَكَرُوا ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ سَلُوهُ لِأَيِّ شَيْءٍ يَصْنَعُ ذَلِكَ فَسَأَلُوهُ فَقَالَ لِأَنَّهَا صِفَةُ الرَّحْمَنِ وَأَنَا أُحِبُّ أَنْ أَقْرَأَ بِهَا فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخْبِرُوهُ أَنَّ اللَّهَ يُحِبُّهُ
بُخاری 7375
ام المؤمنین عائشہ رضی اللہ عنہ عنہما کی پرورش میں تھیں۔ انہوں نے عائشہ رضی اللہ عنہ سے بیان کیا کہ نبی کریم صلی اللہ علیہ وسلم نے ایک صاحب کو ایک مہم پر روانہ کیا ۔ وہ صاحب اپنے ساتھیوں کو نماز پڑھاتے تھے اور نماز میں ختم قل ھو اللہ احد پر کرتے تھے ۔ جو لوگ واپس آئے تو اس کا ذکر آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم سے کیا ۔ آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ ان سے پوچھو کہ وہ یہ طرز عمل کیوں اختیار کئے ہوئے تھے۔ چنانچہ لوگوں نے پوچھا تو انہوں نے کہا کہ وہ ایسا اس لیے کرتے تھے کہ یہ اللہ کی صفت ہے اور میں اسے پرھنا عزیز رکھتا ہوں ۔ آنحضرت صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ انہیں بتا دوں کہ اللہ بھی انہیں عزیز رکھتا ہے ۔


"سورۃ اخلاص کی تلاوت جنّت میں جانے کا ذریعہ ہے"
هُرَيْرَةَ قَالَ أَقْبَلْتُ مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَسَمِعَ رَجُلًا يَقْرَأُ قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ اللَّهُ الصَّمَدُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَجَبَتْ قُلْتُ وَمَا وَجَبَتْ قَالَ الْجَنَّةُ قَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ غَرِيبٌ لَا نَعْرِفُهُ إِلَّا مِنْ حَدِيثِ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ وَابْنُ حُنَيْنٍ هُوَ عُبَيْدُ بْنُ حُنَيْنٍ
بُخاری 2897
ترجمہ : ابوہریرہ رضی اللہ عنہ کہتے ہیں کہ میں نبی اکرمﷺ کے ساتھ آیا ، آپ نے وہاں ایک آدمی کو 'قل ہو اللہ أحد اللہ الصمد' پڑھتے ہوئے سنا، تو رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:' واجب ہوگئی'۔ میں نے کہا : کیا چیز واجب ہوگئی؟ آپ نے فرمایا:'جنت (واجب ہوگئی )'

જાન દે દેના શિર્ક સે આસાન હૈ

જાન દે દેના શિર્ક સે આસાન હૈ



*હઝરત અબુ દર્દા રઝી*. સે રિવાયત. તે ઉન્હોને  કહા મેરે   જીગરી દોસ્ત રસુલુલ્લાહ  ( ﷺ) ને   નસીહત કરતે હુએ ફરમાયા કે અલ્લાહ કે સાથ કિસી ચિઝ કો શરીક ન  કરના  અગરચે તુઝે ટુકડે  ટુકડે કર દિયા યા તુઝે જલા દિયા જાથે,


ઔર ફર્ઝ નમાઝ જાન બૂઝકર મત છોડના જીસ ને ફર્ઝ નમાઝ  જાન બુઝ કર છોડ દિયા તો ઉસે (અલ્લાહ કી હિફાજત કા) ઝિમમા ખતમ હો જાતા હૈ ઔર શરાબ ન પીના ક્યુ કે શરાબ હર બુરાઈ કી ચાબી હૈ
،‏‏‏‏ عَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ،‏‏‏‏ قَالَ:‏‏‏‏ أَوْصَانِي خَلِيلِي صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْلَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ شَيْئًا،‏‏‏‏ وَإِنْ قُطِّعْتَ وَحُرِّقْتَ،‏‏‏‏ وَلَا تَتْرُكْ صَلَاةً مَكْتُوبَةً مُتَعَمِّدًا،‏‏‏‏ فَمَنْ تَرَكَهَا مُتَعَمِّدًا فَقَدْ بَرِئَتْ مِنْهُ الذِّمَّةُ،‏‏‏‏ وَلَا تَشْرَبْ الْخَمْرَ،‏‏‏‏ فَإِنَّهَا مِفْتَاحُ كُلِّ شَرٍّ.
(ઇબ્ને માઝા 4034)

હદીસે સે પાક સે માલુમ હુઆ કે તૌહિદ કે લિયે જાન ભી કુર્બાન કરની પડે તો સઆદત હૈ દુસરી બાત યે માલુમ હુઈ કે શિર્ક કે બાદ સબસે બડા ગુના નમાઝ કા છોડના હૈ જો કુફર કે બરાબર હે તીસરી બાત યે માલુમ હુઈ કે અકલ અલ્લાહ કી બહોત બડી નેઅમત હૈ નશા વાલી ચિઝ ઇસ્તિમાલ કર કે ઈસ નેઅમત ખરાબ કરના અલ્લાહ કી ના શુક્રી હૈ..

*મકતબા અલ ફૂર્કાન સમી ગુજરાત-*

پانی پر دم کرنا

https://islamqa.info/ur/answers/21581/%D9%BE%D8%A7%D9%86%DB%8C-%D9%85%DB%8C%DA%BA-%D9%BE%DA%BE%D9%88%D9%86%DA%A9-%D9%85%D8%A7%D8%B1-%DA%A9%D8%B1-%D8%AF%D9%85-%DA%A9%D8%B1%D9%86%D8%A7

پانی پر دم کرنے کا حکم


پانی پر دم کرنے کا حکم

مقبول احمد سلفی
اسلامک دعوۃ سنٹر -طائف

پانی پر پھونک مارنے کی دو قسمیں ہيں ، ایک قسم جائز ہے اور ایک قسم ناجائز ۔
پہلی قسم :ایک پھونک مارنا تبرکاً ہے جو عموماً صوفیوں کے یہاں پایا جاتا ہے ،اس سے وہ برکت لیتے ہیں جبکہ نبی ﷺ کے علاوہ کسی کے آثار یا تھوک وپھونک سے برکت لینا حرام اورشرک کے قبیل سے ہے ۔
دوسری قسم :شرعی دم جسے عربی میں رقیہ شرعیہ کہتے ہیں وہ جائز ہے ،اس کا طریقہ یہ ہے کہ آدمی مسنون دعائیں پڑھ کر جسم پر پھونک مارے ، اسی طرح یہ بھی جائز ہے کہ ماثورہ دعائیں اور قرآنی آیات پڑھ کر آدمی پانی پر دم کرے اور اس کو پئے یا استعمال کرے۔اس کا ثبوت نبی ﷺ کے علاوہ صحابہ وتابعین وغیرہ سے ملتا ہے مگر یہ نہیں صحیح ہے کہ کاغذ پرکچھ لکھ کر پانی میں تحلیل کرے اورمریض کو اسے پئے ۔
دوسری قسم سے متعلق میں یہاں کچھ دلائل ذکر کرتا ہوں جن سے یہ معلوم ہوگا کہ قرآنی آیات ومسنون دعائیں پڑھ کر پانی پر پھونک سکتے ہیں ، اسے مریض کو پلاسکتے ہیں اور اس سے غسل بھی کراسکتے ہیں ،اس میں اللہ کی طرف سے شفا ہے ۔
(1) سیدہ عائشہ رضی اللہ عنہا بیان کرتی ہیں :
أَنَّ النَّبِىَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا أَوَى إِلَى فِرَاشِهِ كُلَّ لَيْلَةٍ جَمَعَ كَفَّيْهِ ثُمَّ نَفَثَ فِيهِمَا فَقَرَأَ فِيهِمَا ( قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ) وَ ( قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ ) وَ ( قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ) ثُمَّ يَمْسَحُ بِهِمَا مَا اسْتَطَاعَ مِنْ جَسَدِهِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ وَمَا أَقْبَلَ مِنْ جَسَدِهِ يَفْعَلُ ذَلِكَ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ(صحیح بخاری: 5017 )
ترجمہ: نبی کریم ﷺ جب اپنے بستر پر آرام کرتے تو ہر شب اپنے دونوں ہاتھ اکٹھے کر کے ان پر ’قل ہو اللہ احد‘ ’قل اعوذ برب الفلق‘ اور ’قل اعوذ برب الناس‘ پڑھ کر دم کرتے اور پھر دونوں ہتھیلیوں کو جہاں تک ممکن ہوتا اپنے جسم پر پھیر لیتے۔ پہلے سر، چہرے اور بدن کے اگلے حصے پر ہاتھ پھیرتے اور ایسا تین مرتبہ کرتے تھے۔
طریقہ استدلال : نبی ﷺ کا دونوں ہاتھوں پر پھونک مارنا اس بات کی دلیل ہے کہ پانی یا تیل پر بھی پھونک مارسکتے ہیں جیساکہ بدن پر۔ اگر کسی چیز پرپھونک سرے سے ممنوع ہوتی تو ہاتھ پر بھی ممنوع ہوتی۔
(2) حضرت عوف بن مالک اشجعی رضی اللہ تعالیٰ عنہ سے روایت ہے انہوں نے بیان کیا:
كنا نَرْقي في الجاهليةِ . فقلنا : يا رسولَ الله ِكيف ترى في ذلك ؟ فقال " اعرِضوا عليَّ رُقاكم . لا بأسَ بالرُّقى ما لم يكن فيه شِركٌ " .(صحيح مسلم:2200)
ترجمہ:ہم زمانہ جاہلیت میں دم کیا کرتے تھے ہم نے عرض کی: اللہ کے رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم ! اس کے بارے میں آپ کا کیا خیال ہے؟آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے فر ما یا :اپنے دم کے کلمات میرے سامنے پیش کرو دم میں کو ئی حرج نہیں جب تک اس میں شرک نہ ہو۔
طریقہ استدالال : یہ روایت عام ہے ، دم اگر شرکیہ قول سے پاک ہوتو پانی ، تیل اور ہاتھ وجسم سب پر پڑھ کر پھونک مارسکتے ہیں ۔
(3) عن علي - رضي الله عنه - قال : ( لدغت النبي صلى الله عليه وسلم عقرب وهو يصلي فلما فرغ قال :" لعن الله العقرب لا تدع مصليا ولا غيره " ثم دعا بماء وملح وجعل يمسح عليها ويقرأ بـ } قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ { و } قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ { و } قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ { ( السلسلة الصحيحة: 548 )
ترجمہ:حضرت علی ؓسے مروی ہے انہوں نے کہاکہ نبیﷺ نماز ادا فرمارہے تھے ایک بچھو نے آپکو ڈنک لگادیا,آپ نماز سے فارغ ہوئے تو فرمایا کہ اللہ تعالیٰ بچھو پر لعنت کرے جو نہ نبی کو نہ کسی دوسرے کو چھوڑتا ہے۔ پھر آپ نے پانی سے بھرا ہوا ایک برتن طلب فرمایا جس میں نمک آمیز کیا ہوا تھا اور آپ اس ڈنک زدہ جگہ کو نمک آمیز پانی میں برابر ڈبوتے رہے اور قل ھو اللہ احد اور معوذ تین پڑھ کر اس پر دم کرتے رہے یہاں تک کہ بالکل سکون ہوگیا۔
٭اس روایت کو علامہ البانی ؒ نے سلسلہ صحیحہ میں ذکر کیا ہے ۔
طریقہ استدلال : اس روایت سے تو صاف پتہ چلتا ہے کہ نبی ﷺ نے پانی پر دم کیا ہے ،وہ اس طرح کہ جہاں بچھو نے ڈنک مارا تھا اس جگہ نبی ﷺ نمک آمیز پانی انڈیل کر اسی پانی کی جگہ پھونک مار رہے تھے ۔ برتن میں پانی رکھ کر اس پر پھونکنا یا پانی کسی جگہ گراکر اس پر پھونکنا دونوں برابر ہے ۔
(4) عن رسولِ اللَّهِ صلَّى اللَّهُ عليهِ وسلَّمَ أنَّهُ دخلَ علَى ثابتِ بنِ قيسٍ - وَهوَ مريضٌ - فقالَ اكشفِ البأسَ ربَّ النَّاسِ عن ثابتِ بنِ قيسِ بنِ شمَّاسٍ ثمَّ أخذَ ترابًا من بَطحانَ فجعلَهُ في قدَحٍ ثمَّ نفثَ عليهِ بماءٍ وصبَّهُ عليهِ(سنن أبي داود:3885)
ترجمہ: رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم سیدنا ثابت بن قیس رضی اللہ عنہ کے ہاں آئے جبکہ وہ مریض تھے تو آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے دعا فرمائی : اے لوگوں کے پالنے والے ! اس تکلیف کو ثابت بن قیس بن شماس سے دور فرما دے ۔ پھر آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے وادی بطحان کی مٹی لی ,اسے ایک پیالے میں ڈالا پھر اس پر پانی پھونک کر ڈالا اور پھر اسے اس پر چھڑک دیا ۔
اس کی سند میں ایک راوی محمد بن یوسف ہیں جس کی وجہ سے اسے ضعیف قرار دیا گیا حالانکہ ابن حبان نے اس راوی کو ثقہ کہا ہے اور
حافظ ابن حجر ؒنے مقبول کہا ہے نیز اس روایت کو بطور استدلال فتح الباری کتاب الطب ، باب رقیۃالنبی ﷺمیں درج بھی کیا ہے ۔
شیخ ابن باز رحمہ اللہ نے جید کہا ہے ۔(الفوائد العلمية من الدروس البازية: 2/472)
اس روایت کا ایک شاھد بھی ہے جس سے اسےتقویت ملتی ہے جسے شیخ البانی ؒ نے صحیح قرار دیا ہے ۔
رافع بن خدیج رضی اللہ عنہ کہتے کہ میں نے نبی اکرم صلی اللہ علیہ وسلم کو فرماتے سنا:
الحمَّى من فيحِ جهنمَ فأبرِدوها بالماءِ فدخل على ابنٍ لعمارٍ فقال اكشِفْ الباسَ ربَّ الناسِ إلهَ الناسِ(صحيح ابن ماجه:2814)
ترجمہ: بخار جہنم کی بھاپ ہے، لہٰذا اسے پانی سے ٹھنڈا کرو ، پھر آپ صلی اللہ علیہ وسلم عمار کے ایک لڑکے کے پاس تشریف لے گئے ( وہ بیمار تھا ) اور یوں دعا فرمائی: «اكشف الباس رب الناس إله الناس» لوگوں کے رب، لوگوں کے معبود! ( اے اللہ ) تو اس بیماری کو دور فرما ۔
طریقہ استدلال : اس روایت میں صاف مذکور ہے کہ نبی ﷺ نے پہلے پانی پر دم کیا پھر وہ دم شدہ پانی وادی بطحان کی مٹی میں ملایا اور مریض پر جھڑک دیا۔ اس سے یہ بھی معلوم ہوا کہ دم شدہ پانی سے مریض کو غسل بھی دے سکتے ہیں ۔
(5) بخاری شریف میں ایک صحابی اور ان کی اہلیہ کا نبی ﷺ کے لئے خندق کے موقع سے کھانا پکانے کا ذکر ہے ، اس کا چند ٹکڑا یہاں پیش کرتا ہوں ۔
فقال رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم : ( لاتنزلن برمتكم، ولا تخبزن عجينتكم حتى أجيء ) . فجئت وجاء رسول الله صلَّى اللهُ عليه وسلَّم يقدم الناس حتى جئت امرأتي، فقالتْ : بك وبك، فقُلْت : قد فعلت الذي قُلْت، فأخرجت له عجينا فبصق فيه وبارك، ثم عمد إلى برمتنا فبصق وبارك(صحيح البخاري:4102)
رسول اللہ ﷺ نے فرمایا جب تک میں نہ آؤں تم ہانڈی چولہے پر سے نہ اتارنا اور نہ آٹے کی روٹیاں بنانا یہ سن کر میں ( گھر میں) آیا اور نبیﷺ لوگوں کو اپنے پیچھے لئے ہوئے آپﷺ آگے تشریف لائے ۔میں اپنی بیوی کےپاس آیاتووہ مجھے برابھلا کہنےلگیں۔میں نے کہا کہ تم نے جوکچھ مجھ سے کہا تھا میں نے حضور اکر م ﷺ کےسامنے عرض کردیا تھا۔آخر میری بیوی نےگندھا ہوا آٹا نکالا اور حضورﷺ نے ا س میں اپنے لعاب دہن کی آمیزش کردی اور برکت کی دعا کی پھر ہانڈی میں بھی آپ نے لعاب کی آمیزش کی اور برکت کی دعا کی ۔
طریقہ استدلال : اس حدیث میں صراحت موجودہے کہ نبی ﷺ نے اپنے لعاب کو گندھے ہوئے آٹے اور گوشت کی ہانڈی میں ملایا اور پھر برکت کی دعا کی ,جب آٹے اور گوشت میں لعاب کی آمیزش کرسکتے ہیں تو مسنون دعائیں پڑھ کر پانی پر بدرجہ اولی پھونک مار سکتے ہیں ۔
(6) حضرت انس رضی اللہ عنہ سے روایت ہے:
كانَ : يتنفَّسُ في الإناءِ ، ثلاثًا وزعمَ أنسٌ أنَّ رسولَ اللَّهِ صلَّى اللَّهُ علَيهِ وسلَّمَ كانَ يتنفَّسُ في الإناءِ ، ثلاثًا(صحيح ابن ماجه:2775)
ترجمہ: وہ برتن میں تین بار سا نس لیتے تھے ۔ اور انس ؓ نے بیا ن فرما یا کہ رسو ل اللہ برتن میں تین بار سانس لیتے تھے ۔
طریقہ استدلال : جہاں آپ ﷺ نے برتن میں سانس لینے سے منع کیا ہے وہیں آپ سے برتن میں سانس لینا بھی ثابت ہے توبرتن میں سانس لینے سے پانی پر دم کرنا استدلال کیا جاسکتا ہے ۔
(7) مصنف ابن ابی شیبہ میں سیدہ عائشہ رضی اللہ عنہا سے پانی پر دم کرنا صحیح سند کے ساتھ ثابت ہے ۔
عَنْ عَائِشَةَ " أَنَّهَا كَانَتْ لا تَرَى بَأْسًا أَنْ يُعَوَّذَ فِي الْمَاءِ ثُمَّ يُصَبَّ عَلَى الْمَرِيضِ (مصنف ابن أبي شيبة» كِتَابُ الطِّبِّ :رقم الحديث: 22895)
ترجمہ: حضرت عائشہ رضی اللہ عنہا سے روایت ہے کہ ان کے یہاں اس میں کوئی حرج نہیں کہ پانی میں دم کیا جائے پھر اسے مریض پر بہایا جائے ۔
ان تمام ادلہ سے ثابت ہوتا ہے کہ پانی پر دم کیا جاسکتا ہے اسی لئے اسلاف سے یہ عمل منقول بھی ہے ۔ یہ اور بات ہے کہ بعض علماء نے اس کے عدم جواز کا بھی فتوی دیا ہے مگر بہت سارے جید علماء نے اس کے جواز کا فتوی دیا ہے ۔
٭امام احمد بن حنبل کے بیٹے صالح فرماتے ہیں۔
بما اعتللت فيأخذ أبي قدحاً فيه ماء، فيقرأ عليه، ويقول لي: اشرب منه، واغسل وجهك ويديك. ونقل عبد الله أنه رأى أباه (يعني أحمد بن حنبل) يعوذ في الماء، ويقرأ عليه ويشربه، ويصب على نفسه منه(الآداب الشرعیۃ والمنح المرئیۃ:2/456)
ترجمہ: جب میں بیمار ہوتا تو میرے باپ پانی کا پیالہ لیتے اور اس پر پڑھتےاور مجھے کہتے کہ اس پانی میں سے پی لو اور اپنے ہاتھوں اور منہ کو دھو لو۔اس کے بعد فرماتے ہیں کہ میں اپنے باپ کو دیکھا کہ وہ پانی پر دم کرتے اور اس پر پڑھتے ،پھر اسے پی لیتے اور اپنے اوپر بہا لیتے تھے۔
٭محمدبن مفلح کہتے ہیں: عبداللہ نے نقل کیا ہے کہ انہوں نے اپنے والد کو پانی میں پڑھ کر پیتے ہوئے اور اپنے اوپر ڈالتے ہوئے دیکھا۔( الآداب الشرعية – 2 / 441 )
٭شیخ الاسلام ابن القیم لکھتے ہیں: ایک وقت میں مکہ میں بیمار تھا ، میں ڈاکٹر اور دوا سے محروم تھاتو میں سورہ فاتحہ سے علاج کرتا تھا، اس کا طریقہ یہ تھا کہ زمزم کا پانی لیتا اور اس میں برابر سورہ فاتحہ پڑھتااور پھر اسے پیتا، تو مجھے اس سے مکمل شفا مل گئی۔ (زاد المعاد ج3 ص 188)
٭ شیخ ابن باز رحمہ اللہ سے جب کسی نے پانی اور تیل پر قرآن ومسون دعائیں پڑھ کر دم کرنے اور مریض کو پلانے اور غسل دینے کی بابت سوال کیا گیا تو شیخ نے فرمایا :
لا حرج في الرقية بالماء ثم يشرب منه المريض أو يغتسل به، كل هذا لا بأس به، الرقى تكون على المريض بالنفث عليه، وتكون في ماء يشربه المريض أو يتروَّش به، كل هذا لا بأس به۔(موقع بن باز ڈاٹ آرگزڈاٹ ایس اے)
ترجمہ: پانی کے ساتھ دم جسے مریض پی لے یا اس سے غسل کرلے اس میں کوئی حرج نہیں ،دم براہ راست مریض پر پھونک کر بھی ہوتا ہے ، اور پانی پر دم بھی ہوتا ہے جو مریض کو پلایا جائے اس پر چھڑکا جائے اس میں کوئی مضائقہ نہیں۔
٭ اکثروبیشتر علمائے کرام نے جادو کے علاج کے تحت پانی پر دم کرنا ذکر کیا ہےاور سحر زدہ شخص پہ علماء ہوں یا عاملین یہی عمل متواتر کرتے ہیں یہاں تک کہ اکثر کو اللہ کی توفیق سے سحر سے نجات مل جاتی ہے ۔
ایک شبہ کا ازالہ :
احادیث سے پتہ چلتا ہے کہ آپ ﷺ نے پانی پہ پھونکنے سے بھی منع کیا ہے، اسی سبب بعض علماء نے پانی اور تیل وغیرہ پر دم کرنے سے منع کیا ہے ۔ نبی ﷺ کا فرمان ہے : إذا شرب أحدكم فلا يتنفس في الإناء (صحیح البخاری :5630)
ترجمہ: تم میں سے جب کوئی پانی پئے تو برتن میں نہ سانس لے۔
اس حدیث میں سانس لینے کی ممانعت ہے ، ایک حدیث میں پھونکنے کی ممانعت ہے ، وہ اس طرح سے ہے۔
عن ابنِ عبَّاسٍ قالَ : نَهى رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليْهِ وسلَّمَ أنْ يُتنفَّسَ في الإناءِ ، أو يُنفَخَ فيهِ(صحيح أبي داود:3728)
ترجمہ: سیدنا عبداللہ بن عباس رضی اللہ عنہما سے مروی ہے کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے برتن میں سانس لینے یا اس میں پھونک مارنے سے منع فرمایا ہے ۔
اس کا جواب یہ ہے کہ عام پینے والے پانی میں سانس لینے یا اس میں پھونک مارنے کی ممانعت ہےکیونکہ حدیث میں پینے کے لفظ کے ساتھ ممانعت وارد ہے لیکن جس پانی پر دم کرنا ہو وہ مستثنی ہے یعنی دم کرتے وقت پانی پر پھونک مار سکتے ہیں جیساکہ اوپر کئی روایات ذکر کی گئی ہیں ۔
آج سائنسی علوم سے پتہ چلتا ہے کہ پھونک سے جراثیم خارج ہوتے ہیں جو انسان کے لئے نقصان دہ ہیں مگر قرآن کریم یا مسنون اذکار پڑھنے سے ایک قسم کی تاثیر پیدا ہوتی ہے اسی لیے پھونک مریض کے لئے نفع بخش ہے ، اگر پڑھ کر پھونکنے سے بھی نقصان کا پہلو نکلتا تو مریض کو شفا نہ ملتی جبکہ حقیقت اس کے برخلاف ہے ۔ مریض کے جسم پر یا پانی پر دم کرکے مریض کو پلایا جائے فائدہ مند ہے ۔ یہ اللہ کی طرف سے بندوں پربہت بڑا احسان ہے ۔بغیر پڑھے پھونکنا اور وہ کتاب پڑھ کے پھونکنا جسے شفا قرار دیا گیا ہے دونوں میں بڑا واضح فرق ہے ۔بنابریں یہ کہا جائے گا کہ پانی پر پڑھ کر دم کرنے میں کوئی حرج نہیں جبکہ پانی پیتے وقت بغیر پڑھے پھونکنا منع ہے اور سلف نے دم والی احادیث سے یہی مفہوم سمجھا ہے ، اس پر ان کا عمل بھی رہا ہے اور نصوص کو سمجھنے کے لئے سلف کی فہم مقدم ہے ۔
امام احمد بن حنبلؒ، شیخ الاسلام ابن تیمیہ ؒ، حافظ ابن کثیر ؒاور شیخ ابن بازؒ وغیرھم کے علاوہ شیخ صالح عثیمین ،عبدالله بن عبدالرحمن الجبرين, عبدالعزيز القحطاني,نووي, محمد بن ايراهيم آل الشيخ, صالح بن فوزان الفوزان, عبدالعزيز الراجحي, الشيخ صالح بن عبدالعزيز آل الشيخ,شیخ محمد بن ابراہیم اور جمہور اہل علم پانی پر دم کرنے کو جائز قرار دیتے ہیں۔
Last edited: اپریل

سوال : بارش میں دو نمازوں کو جمع کر کے پڑھنا کیسا ہے ؟

 *بارِش میں دَو نَمازیں جمع کر کے پڑھنا:*


تحریر: فضیلۃ الشیخ غلام مصطفےٰ ظہیر اَمن پوری حفظہ اللہ.


سوال : بارش میں دو نمازوں کو جمع کر کے پڑھنا کیسا ہے ؟


جواب: بارش میں دو نمازوں کو جمع کر کے پڑھنا جائز ہے، جیسا کہ :


◈ امام الائمہ، ابن خزیمہ رحمہ اللہ فرماتے ہیں :


ولم يختلف علماء الحجاز ان الجمع بين الصلاتين فى المطر جائز. 


”علماءِ حجاز کا اس بات پر اتفاق ہے کہ بارش میں دو نمازوں کو جمع کرنا جائز ہے۔“ 


[صحيح ابن خزيمة 85/2 ]


◈ سعید بن جبیر تابعی رحمہ اللہ تعلق کہتے ہیں کہ صحابی رسول سیدنا عبد اللہ بن عباس رضی اللہ عنہا نے بیان فرمایا :


جمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بين الظهر والعصر، والمغرب والعشاء بالمدينة، فى غير خوف، ولا مطر (وفي لفظ : ولا سفر)، قلت لابن عباس : لم فعل ذلك ؟ قال : كي لا يخرج أمته .


’’رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے مدینہ منورہ میں ظہر و عصر اور مغرب و عشا کو بغیر کسی خوف اور بارش (ایک روایت میں بغیر کسی خوف اور سفر) کے جمع کیا۔ (سعید من جبیر کہتے ہیں : ) میں نے سیدنا ابن عباس رضی اللہ عنہما سے دریافت کیا کہ آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے ایسا کیوں کیا؟ فرمایا : اس لئے کہ آپ صلى الله عليه وسلم کی امت پر کوئی مشقت نہ ہو۔ “


 [صحيح مسلم : 54/705، 50]


سیدنا ابن عباس رضی اللہ عنہما ہی کا بیان ہے :


صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة ثمانيا جميعا، وسبعا جميعا، الظهر والعصر، والمغرب والعشاء .


”میں نے مدینہ منورہ میں رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی اقتدا میں ظہر و عصر کی آٹھ رکعات اور مغرب و عشا کی سات رکعات جمع کر کے پڑھیں۔ “


 [ صحيح البخاري : 543، 1174، صحيح مسلم : 55/705]


◈ شیخ الاسلام، ابن تیمیہ رحمہ اللہ (661-728ھ) فرماتے ہیں :


والجمع الذى ذكره ابن عباس لم يكن بهذا ولا بهذا، وبهذا استدل أحمد به على الجمع لهذه الأمور بطريق الأولى، فإن هذا الكلام يدل على أن الجمع لهذه الأمور أولى، وهذا من باب التنبيه بالفعل، فانه اذا جمع ليرفع الحرج الحاصل بدون الخوف والمطر والسفر، فالخرج الحاصل بهذه أولى أن يرفع، والجمع لها أولى من الجمع لغيرها.


”سیدنا ابن عباس رضی اللہ عنہما نے جس جمع کا ذکر کیا ہے، وہ نہ خوف کی وجہ سے تھی، نہ بارش کی وجہ سے۔ 


اسی حدیث سے امام احمد رحمہ اللہ نے استدلال کیا ہے کہ خوف اور بارش میں تو بالاولیٰ جمع ہو گی. اس بحث سے معلوم ہوتا ہے کہ ان امور میں نمازوں کو جمع کرنا بالاولیٰ جائز ہے۔ یہ تنبیہ بالفعل کی قبیل سے ہے . جب خوف، بارش اور سفر کے بغیر جو مشقت ہوتی ہے، اس مشقت کو ختم کرنے کے لیے دو نمازوں کو جمع کیا جا سکتا ہے، تو ان اسباب کی مشقت کو ختم کرنا تو بالاولیٰ جائز ہو گا، لہٰذا خوف، بارش اور سفر کی بنا پر نمازوں کو جمع کرنا دیگر امور کی بنا پر جمع کی نسبت زیادہ جائز ہو گا۔


 [مجموع الفتاوي: 76/24 ]


◈ محدث العصر، علامہ البانی رحمہ اللہ سیدنا ابن عباس رضی اللہ عنہما کے قول فى غير خوف ولا مطر کی شرح میں فرماتے ہیں :


فإنه يشعر أن الجمع للمطر كان معروفا فى عهدم صلى الله عليه وسلم، ولو لم يكن كذلك، لما كان ثمة فائدة من نفي المطر كسبب مبرر للجمع، فتامل 


”یہ الفاظ اس بات کی طرف اشارہ کرتے ہیں کہ نبی اکرم صلی اللہ علیہ وسلم کے عہد مبارک میں بارش کی وجہ سے نمازوں کو جمع کرنا معروف تھا۔ غور فرمائیے ! اگر ایسا نہ ہوتا، تو بارش کو جمع کے جواز کے سبب کے طور پر ذکر کرنے کا کوئی فائدہ نہیں تھا۔“ 


[ ارواءالغليل : 3 40 ]


◈ نافع مولیٰ ابن عمر رحمہ اللہ بیان کرتے ہیں :


كانت أمراء نا إذا كانت ليلة مطيرة، أبطأوا بالمغرب وعجلوا بالعشاء قبل أن يغيب الشفق، فكان ابن عمر يصلي معهم، لا يرى بذلك بأسا، قال عبيد الله : ورأيت القاسم، وسالما يصليان معهم، فى مثل تلك الليلة.


”جب بارش والی رات ہوتی، تو ہمارے امرا مغرب کو تاخیر سے ادا کرتے اور شفق غروب ہونے سے پہلے عشا کے ساتھ جمع کر لیتے۔ سیدنا ابن عمر رضی اللہ عنہما ان کے ساتھ ہی نماز پڑھتے تھے اور اس میں کوئی حرج خیال نہیں کرتے تھے . عبید اللہ بیان کرتے ہیں :


 میں نے قاسم اور سالم رحمها اللہ کو دیکھا کہ وہ دونوں ان کے ساتھ ایسی رات میں مغرب و عشاء کو جمع کرتے تھے .“


 [المؤطأ للإمام مالك : 331، السننن الكبريٰ للبيهقي : 168/3، و سنده صحيح ]


◈ ہشام بن عروہ تابعی رحمہ اللہ بیان کرتے ہیں :


رأيت أبان بن عثمان يجمع بين الصلاتين فى الليلة المطيرة؛ المغرب والعشاء، فيصليهما معا، عروة بن الزبير، وسعيد بن المسيب، وأبو بكر بن عبدالرحمن، وأبو سلمة بن عبدالرحمن، لاينكرونه .


”میں نے ابان بن عثمان رحمہ اللہ کو بارش والی رات مغرب و عشا کی نمازوں کو جمع کرتے دیکھا. عروہ بن زبیر، سعید بن مسیب، ابوبکر بن عبدالرحمٰن، ابوسلمہ بن عبدالرحمن رحمہ اللہ اس پر کوئی اعترض نہیں کرتے تھے۔“ 


[مصنف ابن ابي شيبة : 234/2، السنن الكبريٰ للبيهقي : 168/3، 169، و سنده صحيح ]


◈ عبدالرحمن بن حرملہ رحمہ اللہ کہتے ہیں :


رايت سعيد بن المسيب يصلي مع الائمة، حين يجمعون بين المغرب والعشاء، فى الليلة المطيرة.


”میں نے امام سعید بن مسیب کو ائمہ کے ساتھ بارش والی رات میں مغرب و عشا کی نمازوں کو جمع کر کے پڑھتے ہوئے دیکھا ہے۔“ 


[مصنف ابن ابي شيبه : 234/2، و سنده حسن ]


◈ ابومودود، عبدالعزیز بن ابوسلیمان رحمہ اللہ کہتے ہیں :

صليت مع أبى بكر بن محمد المغرب والعشاء، فجمع بينهما فى الليلة المطيرة.


”میں نے ابوبکر بن محمد کے ساتھ مغرب و عشا کی نماز پڑھی، انہوں نے بارش والی رات میں دونوں نمازوں کو جمع کیا تھا۔ “


 [مصنف ابن ابي شيبه : 234/2، و سنده حسن ]


◈ شیخ الاسلام، ابن تیمیہ رحمہ اللہ (661-728ھ) فرماتے ہیں :


فهذه الآثار تدل على أن الجمع للمطر من الأمر القديم، المعمول به بالمدينة زمن الصحابة والتابعين، مع أنه لم ينقل أن أحدا من الصحابة والتابعين أنكر ذلك، فعلم أنه منقول عندهم بالتوائر جواز ذلك.


”ان آثار سے معلوم ہوتا ہے کہ بارش کی وجہ سے دو نمازوں کو جمع کرنا قدیم معاملہ ہے، جس پر صحابہ و تابعین کرام کے عہد میں مدینہ منورہ میں بھی عمل رہا ہے۔ اس کے ساتھ ساتھ کسی ایک بھی صحابی سے اس پر اعتراض کرنا بھی منقول نہیں۔ اس ثابت ہوتا ہے کہ صحابہ و تابعین سے بالتواتر اس کا جواز منقول ہے ـ“


 [ مجموع الفتاوٰي : 83/24 ]


◈ جناب عبدالشکور لکھنوی، فاروقی، دیوبندی لکھتے ہیں :


”امام شافعی رحمہ اللہ کے نزدیک سفر میں اور بارش میں بھی دو نمازوں کا ایک وقت میں پڑھ لینا جائز ہے اور ظاہر احادیث سے بھی ایسا ہی معلوم ہوتا ہے، لہٰذا اگر کسی ضرورت سے کوئی حنفی بھی ایسا کرے، تو جائز ہے۔ “ 


[علم الفقه، حصه دوم، ص : 150 ]


*یاد رہے کہ بارش کی صورت میں جمع تقدیم و تاخیر، دونوں جائز ہیں۔ تقدیم میں زیادہ آسانی ہے، نیز جمع صوری کو بھی اختیار کِیا جا سکتا ہے۔*

क्या बिल-जब्र (ज़बरदस्ती) लोगों को मुसलमान बनाया जा सकता हैं ?*


क्या बिल-जब्र (ज़बरदस्ती) लोगों को मुसलमान बनाया जा सकता हैं ?

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पार्ट:1




लेखक: शैख़ अस'अद आज़मी




हिंदी अनुवाद: अब्दुल मतीन सैयद


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  इस्लाम अल्लाह रब्ब-उल-'आलमीन की तरफ़ से नाज़िल किया हुआ वो दीन (धर्म) हैं जो रहती दुनिया तक मख़्लूक़ (मनुष्यों) की रहनुमाई (नेतृत्व) करता रहेगा साढ़े चौदा सो साल से यह दीन बराबर फल-फूल रहा है और इस के मानने वालो की ता'दाद (संख्या) में रोज़-अफ़्ज़ूँ (दिन रात) इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) ही होता रहा है आज दुनिया का कोई ख़ित्ता (इलाक़ा) ऐसा नहीं जहां इस के नाम-लेवा (मानने वाले) मौजूद न हो ता'दाद (संख्या) के ए'तिबार से देखा जाए तो 'ईसाइयत (ईसाई धर्म) के बाद सबसे ज़ियादा अगर किसी मज़हब (धर्म) के मानने वाले इस दुनिया में है तो वह मज़हब-ए-इस्लाम ही है।




  अल्लाह-त'आला ने अपने आख़िरी नबी जनाब मोहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ को यह दीन दे कर भेजा तो आप ने तन-तन्हा (ख़ुद ही) इस की तब्लीग़-ओ-इशा'अत का काम शुरू' किया मक्का के "13" साला ज़िंदगी में दा'वत की राह-में बड़ी रुकावटें आई तकलीफ़े उठानी पड़ी लेकिन इस्लाम के मानने वालों की ता'दाद (संख्या) में थोड़ा-थोड़ा ही सही मगर इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) होता रहा मदनी दौर में इस में ख़ातिर-ख़्वाह (मनचाहा) तेज़ी आई और नबी आख़िरुज़्ज़माँ ﷺ के इस दुनिया को ख़ैर-बाद कहने के वक़्त एक लाख से ज़ियादा (अधिक) नुफ़ूस (लोग) इस्लाम के साए में पनाह ले चुके थे।




  तौहीद, रिसालत, हश्र-ओ-नश्र (क़ियामत) और दीगर (अन्य) बुनियादी 'अक़ाइद को लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ में उतार ने के लिए क़ुरआन में नौ'-ब-नौ' (तरह तरह के) 'अक़्ली-व-मंतिक़ी दलाइल पेश किए गए शिर्क-ओ-कुफ़्र के दलाइल की कमज़ोरी और बुतलान (बातिल) को वाज़ेह (स्पष्ट) किया गया दिलों को अपील करने वाले 'अक़्ली ओ नक़ली दलाइल से मुतमइन (संतुष्ट) हो-कर लोग जौक़-दर-जौक़ (गिरोह के गिरोह) इस्लाम में दाख़िल होते गए शहरों, देहातो और मुल्कों से निकल कर इस्लाम की रोशनी देखते-देखते मुख़्तलिफ़ बर्र-ए-आज़मो (महाद्वीपों) तक में फैल गई इस तेज़-रफ़्तारी के साथ इस्लाम की इशा'अत (प्रचार) के पीछे जहां इस की हक्क़ानिय्यत (सच्चाई ) उस के महासिन (भलाइयां) और उस के फ़ज़ाइल (अच्छाईयां) थे वहीं अहल ए इस्लाम की 'अमली (व्यावहारिक) ज़िंदगी उन के अख़्लाक़ (आचरण) की बलंदी (श्रेष्ठता) किरदार (चरित्र) की सफ़ाई (सादगी) और मु'आमलात (व्यवहार) की पाकीज़गी (पवित्रता) वग़ैरहा का भी बड़ा दख़्ल (हस्तक्षेप) था !




  इशा'अत-ए-इस्लाम (इस्लाम के प्रचार) के सिलसिले में ज़माना-ए-क़दीम (प्राचीनकाल) से लेकर अब-तब बा'ज़ (चंद) लोग एक ग़लत-फ़हमी (ना-समझी) का शिकार रहते हैं या जान बूझ कर (सब कुछ जानते हुए) ऐसा प्रोपोगंडा करते हैं वो यह कि इस्लाम में दाख़िल करने के लिए मुसलमान जब्र-ओ-इकराह (बलपूर्वक) और ज़ोर ओ ज़बरदस्ती से काम लेते हैं और बसा-औक़ात (कभी-कभी) माल-ओ-मता' (धन और सामग्री) के ज़री'आ (द्वारा) भी लोगों को रिझाने की कोशिश करते हैं यह महज़ (केवल) एक दा'वा है जिस का शर'ई (धार्मिक) 'अक़्ली (उचित) और ज़मीनी (लाक्षणिक) ए'तिबार (विश्वास) से जाइज़ा (समीक्षा) लेने की ज़रूरत है ताकि इस दा'वे की हक़ीक़त (सच्चाई) सामने आए और सहीह सूरत-ए-हाल (वर्तमान स्थिति) से आगाही (ज्ञान) हो।




(जारी...)




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*क्या बिल-जब्र (ज़बरदस्ती) लोगों को मुसलमान बनाया जा सकता हैं ?*


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पार्ट:2


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 *शर'ई (धार्मिक) नुक़्ता-ए-नज़र (दृष्टिकोण)* 




  शर'ई (धार्मिक) ए'तिबार (विश्वास) से देखा जाए और आख़िरीं (अंतिम) नबी (पैग़ंबर) का 'अमल (काम) और आप की ज़िम्मेदारियों का जाइज़ा (समीक्षा) लिया जाए तो यह बात खुल कर सामने आती हैं कि अल्लाह-त'आला ने अपने नबी (पैग़ंबर) को सिर्फ़ (केवल) इबलाग़ (पहुँचाने) और दा'वत की ज़िम्मेदारी दी थी या'नी (अर्थात) अल्लाह का पैग़ाम (संदेश) अल्लाह के बंदों (मनुष्यों) तक पहुँचाने का आप को मुकल्लफ़ (पाबंद) किया था और साथ ही यह वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिया था कि दा'वत की कामयाबी (सफलता) और नाकामी (असफलता) की फ़िक्र (चिंता) आप को नहीं करनी है यह अल्लाह के हाथ में है हिदायत (मार्ग-दर्शन) देना अल्लाह का काम है आप अपने ज़िम्मा (ज़िम्मेदारी) का काम करते जाएं और नतीजा (अंजाम) से बे-फ़िक्र (निडर) रहें।




इस सिलसिले की चंद आयात क़ुरआनी मुलाहज़ा हो : 


وَلَوْ شَاء رَبُّکَ لآمَنَ مَن فِیْ الأَرْضِ کُلُّہُمْ جَمِیْعاً أَفَأَنتَ تُکْرِہُ النَّاسَ حَتَّی یَکُونُواْ مُؤْمِنِیْنَ- {سورہ یونس:۹۹}


तर्जमा: और अगर आप का रब (पालन-हार) चाहता तो जो लोग भी ज़मीन में है सब के सब ईमान ले आते तो क्या (ऐ नबी) आप लोगों को मजबूर करेंगे कि वो ईमान वाले हो जाए। 


(सूरा यूनुस:99)


एक जगह फ़रमाया:


 {إِنَّکَ لَا تَہْدِیْ مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَکِنَّ اللَّہَ یَہْدِیْ مَن یَشَاء ُ وَہُوَ أَعْلَمُ بِالْمُہْتَدِیْنَ - {سورہ قصص:۵۶}


तर्जमा: (ऐ नबी) आप जिसे चाहे हिदायत नहीं दे सकते अल्लाह ही जिसे चाहे हिदायत देता है हिदायत वालो से वही ख़ूब आगाह (जानकार) है। 


(सूरा अल्-क़सस:56)


मज़ीद (अधिक) फ़रमाया:


 {فَإِنْ أَعْرَضُوا فَمَا أَرْسَلْنَاکَ عَلَیْہِمْ حَفِیْظاً إِنْ عَلَیْکَ إِلَّا الْبَلَاغُ- {سورہ شوری:۴۸}


तर्जमा: अगर यह लोग मुंह फेर ले तो (ऐ नबी) हम ने आप को इन का निगराँ (रक्षक) बनाकर नहीं भेजा है आप की ज़िम्मेदारी तो सिर्फ़ तब्लीग़-ओ-दा'वत है। 


(सूरा अश़्-शूरा:48)


एक मक़ाम पर यूँ इरशाद हैं:


{فَذَکِّرْ إِنَّمَا أَنتَ مُذَکِّرٌ، لَّسْتَ عَلَیْہِم بِمُصَیْطِرٍ- {سورہ غاشیہ:۲۱،۲۲}


तर्जमा: (ऐ नबी) आप नसीहत करें आप का काम नसीहत करना है आप उन के ऊपर दारोग़ा नहीं है। 


(सूरा अल्-ग़ाशिया:21:22)


यह भी इरशाद हैं:


{لاَ إِکْرَاہَ فِیْ الدِّیْنِ قَد تَّبَیَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَیِّ - {سورہ بقرہ: ۲۵۶}


तर्जमा: दीन (धर्म) में कोई ज़बरदस्ती नहीं हिदायत और गुमराही ज़ाहिर (स्पष्ट) हो चुकी है। 


(सूरा अल्-ब-क़-रा:256)


मज़ीद फ़रमाया:


 {وَقُلِ الْحَقُّ مِن رَّبِّکُمْ فَمَن شَاء فَلْیُؤْمِن وَمَن شَاء فَلْیَکْفُرْ- {سورہ کہف:۲۹}


तर्जमा: (ऐ नबी) कह दीजिए कि हक़ तुम्हारे रब की तरफ़ से हैं पस जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे कुफ़्र करें। 


(सूरा अल्-कह्फ़:29)


इस मफ़्हूम (अर्थ) को इन अलफ़ाज़ में बयान किया गया है:


{إِنَّا ہَدَیْنَاہُ السَّبِیْلَ إِمَّا شَاکِراً وَإِمَّا کَفُوراً - {سورہ دہر:۳}


तर्जमा: हमने इसे राह दिखला दी अब ख़्वाह (चाहे) वो शुक्र-गुज़ार बने ख़्वाह (चाहे) ना-शुक्रा। 


(सूरा अल्-इन्सान:3)


लोगों को मुख़ातिब (संबोधन) करके कहा गया:


{فَإِن تَوَلَّیْتُمْ فَاعْلَمُواْ أَنَّمَا عَلَی رَسُولِنَا الْبَلاَغُ الْمُبِیْنُ- {سورہ مائدہ: ۹۲}


तर्जमा: अगर रु-गर्दानी (विरोध) करोगे तो जान लो कि हमारे रसूल के ज़िम्मा (ज़िम्मेदारी) सिर्फ़ साफ़-साफ़ पहुंचा देना था। 


(सूरा अल्-माइदा :92)




  अल-ग़रज़ (सारांश यह कि) इस मफ़्हूम (अर्थ) की बहुत सारी आयतें है जिन में वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिया गया है कि अल्लाह का दीन (धर्म) और अल्लाह का पैग़ाम (संदेश) वाज़ेह (स्पष्ट) तोर पर पेश हो चुका है सहीह और ग़लत रास्तों की निशान-दही कर दी गई है इंसान को 'अक़्ल और सूझ-बूझ (समझदारी) भी दी गई है दोनों रास्तों और दोनों के अंजाम को सामने रखें और अपने लिए सहीह रास्ते का इंतिख़ाब (चयन) करें इस के लिए उस के ऊपर किसी तरह का जब्र (बलप्रयोग) या ज़ोर-ज़बरदस्ती की जरूरत नहीं है और नबी का काम भी यही है कि ख़ैर-ओ-शर (पाप और पुन्य) और हक़-ओ-नाहक़ (सही और ग़लत) को वाज़ेह (स्पष्ट) करदे ता कि हुज्जत (दलील) तमाम हो जाए और जो काम नबी का हैं वहीं उस के मुत्तबि'ईन (अनुयायी) और वारिसीन का भी है।


  इसी तरह नबी-ए-करीम ﷺ की 'अमली (व्यावहारिक) ज़िंदगी और आप की सीरत-ए-तय्यबा (पवित्र जीवन) के मुताले' (अध्ययन) से पता चलता है कि कभी आप ने इस्लाम के लिए किसी को मजबूर नहीं किया किसी पर सख़्ती (कठोरता) नहीं की आप ने दा'वत दी और हक़ (सत्य) को बयान किया इसे क़ुबूल (स्वीकार) करने की दरख़्वास्त (अपील) की।




(जारी...)




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*क्या बिल-जब्र (ज़बरदस्ती) लोगों को मुसलमान बनाया जा सकता हैं ?*


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पार्ट:3


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 *किसी को जबरन (ज़बरदस्ती) इस्लाम में दाख़िल करने के त'अल्लुक़ (सम्बन्ध) से दर्ज ज़ैल (नीचे लिखित) नुक़ात (points) भी क़ाबिल-ए-ग़ौर (ध्यान देने योग्य) हैं*




1) इस्लाम में यह बात मुसल्लम (प्रमाणित) और मुत्तफ़क़-'अलैह (सर्वमान्य) हैं कि अगर कोई अपनी रज़ा-ओ-रग़बत (मर्ज़ी) के बग़ैर किसी जब्र (बलप्रयोग) और ज़बरदस्ती की वजह से (कारण से) इस्लाम क़ुबूल (स्वीकार) करता है तो ऐसा इस्लाम क़ाबिल-ए-क़ुबूल (स्वीकरणीय) नहीं और न ऐसे मुसलमान को उस के इस्लाम से कोई फ़ाइदा (लाभ) मिलने वाला है बिल्कुल वैसे ही (उसी तरह) जैसे किसी मुसलमान को जबरन (बलपूर्वक) कलमा-ए-कुफ़्र पढ़वाया जाए तो इस्लाम से वह ख़ारिज (बाहर) नहीं हुआ करता।


2) एक मुसलमान को किताबिया (यहूदी या 'ईसाई) औरत से शादी करने की इजाज़त (अनुमति) हैं लेकिन अगर कोई किसी किताबिया औरत से शादी करता है तो उस औरत के लिए जरूरी नहीं कि अपना दीन-ओ-'अक़ीदा (धर्म) छोड़ दे और इस्लाम क़ुबूल (स्वीकार) करे उसे अपने दीन (धर्म) पर बाकी रहने का पूरा हक़ (अधिकार) हासिल है।


3) अगर लोगों को ज़बरदस्ती (बलपूर्वक) मुसलमान बनाया गया होता तो मौक़ा' (अवसर) मिलते ही वह इस्लाम से निकल भागते और अपने पुराने मज़हब (धर्म) की तरफ़ लौट जाते लेकिन इस्लाम की पूरी तारीख़ इस तरह की मिसाल (उदाहरण) पेश करने से कासिर (नाकाम) है।


4) अगर ज़बरदस्ती (बलपूर्वक) लोगों को मुसलमान बनाना होता तो मुसलमान कई सदियों तक पूरी ताक़त और क़ुव्वत (शक्ति) में रहे वो चाहते तो जबरन (बलपूर्वक) अपने इर्द-गिर्द (चारों तरफ़) के लोगों को मुसलमान बना लेते और मुस्लिम मु'आशरे (समाज) में कोई ग़ैर-मुस्लिम न रहता लेकिन तारीख़ शाहिद (इतिहास गवाह) है कि 'अहद-ए-नबवी, 'अहद-ए-सहाबा, 'अहद-ए-अमवी, 'अहद-ए-अब्बास और बा'द के अदवार (युग) में भी हमेशा मुस्लिम मुल्कों (countries) और 'इलाक़ो में ग़ैर-मुस्लिम (यहूदी, ईसाई, मजूसी, बुत-परस्त, आतिश-परस्त) मुसलमानों के साथ साथ रहें उन्हें बड़े बड़े मनासिब (पदवियां) सुपुर्द किए गए और वो मु'अज़्ज़ज़-ओ-मुकर्रम (सम्मानित) रहे मदीना में मस्जिद-ए-नबवी में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु को 'ऐन (ठीक) नमाज़ बल्कि (किंतु) इमामत की हालत में एक मजूसी ग़ुलाम (नौकर) ही ने तो शहीद किया था।


5) "इस्लाम में ज़िम्मी (इस्लामी राज्य में ग़ैर मुस्लिम नागरिक) के हुक़ूक़ (अधिकार)" 


  यह एक ऐसा मौज़ू' (विषय) है कि जबरन (बलपूर्वक) मुसलमान बनाने की थ्योरी की नफ़ी (अस्वीकृति) के लिए यही तन्हा (अकेला) काफ़ी (पर्याप्त) है ज़िम्मी इन रि'आया (जनता) को कहते हैं जो इस्लामी हुकूमत में आबाद हो और जिन का मज़हब (धर्म) इस्लाम न हो मुस्लिम हुकूमत उन से बहुत ही मा'मूली (साधारण) टैक्स लेकर इस के 'इवज़ (बदले) उन की जान-ओ-माल के तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) की ज़िम्मेदार होती थी और उन को बहुत सारे मज़हबी व समाजी व सियासी हुक़ूक़ (अधिकार) हासिल होते अगर जबरन (बलपूर्वक) मुसलमान बनाने की कोई हक़ीक़त (सत्यता) होती तो मुस्लिम हुकूमतों के यहां यह शो'बा (विभाग) और यह महकमा (कचहरी) वुजूद (अस्तित्व) ही में न आता बल्कि (किंतु) ऐसे लोगों को या तो इस्लाम में दाख़िल कर लिया जाता या इंकार की सूरत में मुल्क-बदर (जिलावतन) कर दिया जाता।


6) बहुत से ग़ैर मुस्लिम मुअर्रिख़ीन-ओ-मुफ़क्किरीन (इतिहासकारों) ने भी इस्लाम और मुसलमानो की वुस'अत-ए-क़ल्बी का ए'तिराफ़ (स्वीकार) किया है और किसी को जबरन (बलपूर्वक) मुसलमान बनाने के मफ़रूज़े (भ्रम) की तरदीद (रद्द) की हैं चंद मिसालें (उदाहरण) मुलाहज़ा (अध्यन) हो।


  मशहूर (प्रसिद्ध) यूरोपीयन मुअर्रिख़ (इतिहासकार) एडवर्ड गिबन लिखता है:


इस्लाम ने किसी मज़हब (धर्म) के मसाइल (समस्या) में दस्त-अंदाज़ी (हस्तक्षेप) नहीं की किसी को ईज़ा (तकलीफ़) नहीं पहुँचाई कोई मज़हबी (धार्मिक) अदालत ग़ैर-मज़हब (दूसरे धर्म) वालों को सज़ा (दंड) देने के लिए क़ाइम (स्थापित) नहीं की और इस्लाम ने लोगों के मज़हब (धर्म) को ब-जब्र (बलपूर्वक) तब्दील (परिवर्तन) करने का कभी क़स्द (विचार) नहीं किया


इस्लाम की तारीख़ (इतिहास) के हर सफ़्हा (पेज) में और हर मुल्क (देश) में जहां इस को वुस'अत (ताक़त) हासिल (प्राप्त) हुई वहां दूसरे मज़ाहिब (धर्मसमूह) से 'अदम मुज़ाहमत पाई जाती हैं यहां तक कि फ़िलिस्तीन में एक ईसाई शा'इर (कवि) ने उन वाक़ि'आत (घटनाओं) को देखकर जिन का ज़िक्र (उल्लेख) हम कर रहे हैं बारह सो साल बाद ए'लानिया (खुले तौर पर) कहा था कि सिर्फ़ मुसलमान ही रू-ए-ज़मीन (भूमी की सतह) पर ऐसी क़ौम (जाति) है जो दूसरे मज़ाहिब (धर्मसमूह) वालों को हर क़िस्म (प्रकार) की आज़ादी (स्वतंत्रता) देते हैं। 


(इस्लाम और रवादारी पेज:80/81 ब-हवाला ज़वाल रुमत अल कुबरा पेज:185)


  मशहूर (प्रसिद्ध) फ्रेंच मुफ़क्किर (विचारक) डॉक्टर गुस्तावली अपनी


तसनीफ़ (पुस्तक) "तमद्दुन 'अरब" में लिखता है:


"मुसलमान हमेशा मफ़्तूह (पराजित) अक़्वाम (कौमों) को अपने मज़हब (धर्म) की पाबंदी में आज़ाद छोड़ देते थे" 


(तमद्दुन 'अरब:पेज:80)




(जारी...)




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*क्या बिल-जब्र (ज़बरदस्ती) लोगों को मुसलमान बनाया जा सकता हैं ?*


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पार्ट:4 (लास्ट पार्ट)


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*हिंदुस्तान, इस्लाम और मुसलमान*


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  यह मौज़ू' (विषय) एक तवील (लंबी) बहस का मुतक़ाज़ी (ज़रुरत) हैं लेकिन अपने ज़ेर-ए-बहस (चर्चाधीन) जुज़ई (थोड़े) से मुत'अल्लिक़ (विषय में) चंद (कुछ) बातें पेश (समक्ष) करने पर इक्तिफ़ा (पर्याप्त) किया जाता हैं।




*हिंदुस्तान में मुसलमानो की आमद (आगमन) का सिलसिला (सम्बंध) पहले से जारी था लेकिन तारीख़ी (ऐतिहासिक) हैसियत से हिंदुस्तान में मुसलमानो का सिलसिला (सम्बंध) मोहम्मद बिन क़ासिम के हमले (आक्रमण) से शुरू' (प्रारंभ) माना जाता हैं उस हमले में मुसलमानों को फ़त्ह (विजय) मिली थी और यहां इस्लामी हुकूमत की दाग़-बेल पड़ी थी मोहम्मद बिन क़ासिम और मज़हबी (धार्मिक) जब्र-ओ-इकराह (ज़बरदस्ती) के हवाले से सिर्फ़ (मात्र) एक मिसाल (उदाहरण) पेश की जा रही हैं:


  मशहूर (प्रसिद्ध) मुअर्रिख़ (इतिहासकार) 'अली बिन हामिद मुसन्निफ़ (लेखक) "तारीख़-ए-सिंध" ने मज़हबी (धार्मिक) आज़ादी (स्वतंत्रता) से मुत'अल्लिक़ (विषय में) मोहम्मद बिन क़ासिम की पॉलिसी का यह ए'लान (घोषणा) नक़्ल किया है कि:


"हमारी हुकूमत में हर शख़्स मज़हबी (धार्मिक) मु'आमला (व्यवहार) में आज़ाद (स्वतंत्र) होगा जो शख़्स (व्यक्ति) चाहें इस्लाम क़ुबूल (स्वीकार) करें और जो चाहे अपने मज़हब (धर्म) पर क़ाइम (यथावत) रहें हमारी तरफ़ से कोई त'अर्रुज़ (विरोध) न होगा" 


(इस्लाम और रवादारी: पेज नंबर:153)




*हिंदुस्तान के अव्वल (प्रथम) वज़ीर-ए-आ'ज़म (प्रधानमंत्री) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब 


(दी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया के पेज नंबर:204) 


पर लिखा है:


  अफ़ग़ान और मुग़ल हुक्मरानों ने ख़ास तौर पर इस बात का हमेशा (सदा) लिहाज़ (ध्यान) रखा कि मुल्क (देश) के क़दीम (प्राचीन) रस्म-ओ-रिवाज (रीति रिवाज) और उसूलों (सिद्धांतों) में कोई दख़्ल (हस्तक्षेप) न दिया जाए उन में कोई भी बुनियादी (आधार भूत) तब्दीली (परिवर्तन) नहीं की गई हिंदुस्तान का इक़्तिसादी (आर्थिक) और समाजी ढाँचा ब-दस्तूर (पहले की तरह) क़ाइम (स्थापित) रहा गयासुद्दीन तुग़लक़ ने अपने हुक्काम को वाज़ेह (स्पष्ट) हिदायत (आदेश) इस बारे में जारी की थी कि वो मुल्क (देश) के रिवाजी (प्रचलित) क़ानून को ब-दस्तूर (यथावत) क़ाइम (स्थापित) रखें और सल्तनत (हुकूमत) के मु'आमलात (व्यवहार) को मज़हब (धर्म) से जो हर फ़र्द (व्यक्ति) का जाती और निजी (व्यक्तिगत) 'अक़ीदा (विश्वास) होता है बिल्कुल अलग रखें।




*प्रोफ़ेसर राम प्रशाद खोसला अपनी किताब 


(मुगल किंग सीप एंड मोबिलिटी) में लिखते हैं:


  मुग़लों के ज़माने (समय) में 'अदल-ओ-इंसाफ़ (न्याय) में जो एहतिमाम (बंदोबस्त) होता और जो उन की मज़हबी (धार्मिक) रवादारी (उदारता) की पॉलिसी थी उस से 'अवाम (जनता) हमेशा (सदा) मुतमइन (संतुष्ट) रही इस्लामी रियासत (हुकूमत) में सियासत (राजनीति) और मज़हब (धर्म) का गहरा (धनिष्ट) लगाव (नाता) रहा है लेकिन मुग़लो की मज़हबी (धार्मिक) रवादारी (उदारता) की वज़ह से उस लगाव को कोई ख़तरा पैदा नहीं हुआ किसी ज़माने में भी यह कोशिश नहीं की गई कि हुक्मराँ क़ौम का मज़हब (धर्म) महकूमों (प्रजा) का भी मज़हब (धर्म) बना दिया जाए हत्ता कि औरंगज़ेब ने भी हुसूल-ए-मुलाज़मत (नौकरी) के लिए इस्लाम की शर्त (पाबंदी) नहीं रखी मुग़लो के 'अहद (समय) में "Fermilao act" या "corporation act" जैसे क़वानीन (कानून) मंज़ूर नहीं किए गए एलिज़ाबेथ के ज़माने में एक ऐसा कानून था जिस के जरिए से जबरी (ज़बरदस्ती) तौर पर 'इबादत (उपासना) कराईं जाती थी मुग़लो के ज़माने (समय) में इस क़िस्म (प्रकार) का कोई जब्र (बलप्रयोग) नहीं किया गया "Bortholomews day" जैसे क़त्ल-ए-'आम (नरसंहार) से मुग़लो की तारीख़ कभी दाग़दार (कलंकित) नहीं हुई मज़हबी (धार्मिक) जंग की ख़ूँ-रेज़ी (मार-काट) से यूरोप की तारीख़ भरी हुई है लेकिन मुग़लो के 'अहद (समय) में ऐसी मज़हबी (धार्मिक) जंग की मिसाल (उदाहरण) नहीं मिलती बादशाह मज़हब-ए-इस्लाम का मुहाफ़िज़ (रक्षक) और निगहबान (रखवाला) जरुर समझा जाता लेकिन उस ने कभी ग़ैर-मुस्लिम रि'आया (जनता) के 'अक़ाइद (आस्था) पर दबाव (प्रेशर) नहीं डाला। 


(इस्लाम में मज़हबी रवादारी: सैयद सबाउद्दीन अब्दुर्रहमान दार अल-मुस्नफ़ीन आज़म गढ़, तब' जदीद : 'ईस्वी-साल:2009 पेज नंबर:287)


"इस्लामी अहकाम (आदेश) पर ए'तिराज़ (आलोचना) और उन की हक़ीक़त" के 'उनवान (शीर्षक) से अपने एक मज़मून (लेख) में मुहतरम (श्रीमान) सनाउल्लाह साहब लिखते हैं:


  जब हिंदुस्तान में मुसलमान हुक्मरान (राजा) आएं यहां हिंदुस्तान में ब्रह्मणी हुकूमत ने बुद्धों, जैनियों और दलितों पर बे-पनाह (बहुत ज़ियादा) मज़ालिम (अत्याचार) ढाए थे इस लिए मज़लूमो (पीड़ितों) ने इस्लाम की इंसाफ़-पसंदी (न्यायप्रियता) से मुतअस्सिर (प्रभावित) हो कर बग़ैर (बिना) दा'वत (आमंत्रण) के इस्लाम क़ुबूल (स्वीकार) कर लिया उन्होंने 


मुस्लिम हुक्मरानों को अपना नजात-दहिंदा (आज़ाद कराने वाला) समझा पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामधारी सिंह 'दिनकर जैसे दर्जनों (बहुत से) हिंदु मुअर्रिख़ीन (इतिहासकार) और इंसाफ़-पसंद (न्यायप्रिय) मुसन्निफ़ीन (लेखक) ने अपनी किताबों में इस हक़ीक़त (सत्यता) को तस्लीम (स्वीकार) किया है अगर ज़ुल्म (अत्याचार) और तशद्दुद (हिंसा) से मज़हब (धर्म) फैलाने का काम मुस्लिम हुक्मरानों ने किया होता तो सात सौ साल में या तो हिंदुस्तान में एक भी हिंदू बाकी न बचता या फिर इतने लंबे 'अर्से (समय) तक उन की हुकूमत क़ाइम (यथावत) नहीं रह सकती तारीख़ी (ऐतिहासिक) रिकार्ड बताते हैं कि मुस्लिम दौर-ए-हुकूमत में हिंदू और मुसलमानों के दरमियान (बीच में) मेल-मिलाप और त'आवुन (सहयोग) बराबर क़ाइम (यथावत) रहा फ़ौज और हुकूमत के अहम (महत्वपूर्ण) 'ओहदों (पद) पर बड़ी ता'दाद (संख्या) में हिंदू फ़ाइज़ (नियुक्त) रहें तशद्दुद (ज़ुल्म) की हालत (स्थिति) में ऐसा मुमकिन (संभव) न था।


(इस्लाम और ग़लत-फ़हमीया मज्मू'आ मज़ामीन से रोज़ा दा'वत नई दिल्ली, 28, जुलाई, 2002, पेज:39)




*मिस्टर टी. डब्ल्यू. अर्नोल्ड अपनी किताब "The Preaching of Islam" में लिखते हैं:


औरंगज़ेब के 'अहद (समय) की किताब तवारीख़ (इतिहास) में जहाँ तक मैंने तलाश (खोज) किया है ब-जब्र (बलपूर्वक) मुसलमान करने का ज़िक्र (उल्लेख) कही नहीं मिलता (इस्लाम और रवादारी:216)




*एक फ़्रांसीसी सय्याह (पर्यटक) डॉक्टर ब्रनियर देहली (Delhi) के सूरज-ग्रहण के अश्नान (स्नान) और पूजा-पाट का नज़ारा (दीदार) करने के बाद लिखते हैं:


" मुस्लिम फ़रमाँ-रवाओ (राजाओं) की तदबीर (उपाय) मम्लकत (राष्ट्र) का यह एक जुज़ (भाग) हैं कि वो हिंदूओं की रुसूम (रीतियों) में दस्त-अंदाज़ी (हस्तक्षेप) करना मुनासिब (अनुकूल) नहीं समझते और उन्हें मज़हबी (धार्मिक) रुसूम (रस्में) बजा लाने (अदा करने) की पुरी आज़ादी देते हैं " 




*मशहूर (प्रसिद्ध) हिंदी हफ़्त-रोज़ा (साप्ताहिक) "कांति" के साबिक़ (पूर्व) एडिटर (संपादक) डोक्टर कौसर यज़्दानी ने हिंदुस्तान में जबरी (बलपूर्वक) मुसलमान बनाने के वाहिमा (भ्रम) को ग़लत (झूठ) ठहराते हुए बड़े पते की बात कही है मौसूफ़ (महोदय) फरमाते हैं:


इस सिलसिले में एक दिल-चस्प (रोचक) अम्र (बात) यह भी है कि वतन-ए-'अज़ीज़ (प्यारे मुल्क) में हर-वक़्त (हर समय) propaganda (प्रचार) किया जाता हैं कि मुस्लिम बादशाहों ने यहां के बाशिंदों (नागरिकों) को तलवार और ताक़त के ज़ोर (बल) पर ज़बरदस्ती (बलपूर्वक) मुसलमान बनाया ऐसी बात करने वाले यह नहीं सोचते कि वो ख़ुद (स्वयं) अपने बुज़ुर्गों (बापदादे) और अस्लाफ़ (पुर्खो) पर कितना बड़ा इल्ज़ाम (आरोप) लगा रहे हैं कि वो ऐसे बुज़दिल (डरपोक) थे कि ख़ुद (स्वयं) करोड़ों की ता'दाद (संख्या) में होते हुए भी बाहर से आने वाले चंद (कुछ) हजार मुसलमानों का मुक़ाबला न कर सके उन के गुलाम-ओ-महकूम (दास) बन गए यहां तक कि इस दबाव (प्रेशर) में अपनी बुज़दिली (कायरता) और पस्त-हिम्मती (डर) की वजह से (करण से) अपना धर्म छोड़ कर मुसलमानों का मज़हब (धर्म) क़ुबूल (स्वीकार) कर लिया फिर यह कैसी 'अजीब (विचित्र) बात है कि इन मुसलमानों के हुक्मरान (राजा) न रहने पर भी इन्होंने मुबैयना (तथाकथित) हमला-आवरो (आक्रमणकारों) का मज़हब (धर्म) न छोड़ा और आज-तक फ़स्ताई (फासीवादी) ताकतों के तमाम-तर (सारे का सारा) ज़ुल्म-ओ-सितम (अन्याय) इम्तियाज़ (भेदभाव) फ़साद (उपद्रव) क़त्ल-ओ-ग़ारत-गिरी (ख़ून खराबा) मज़हबी (धार्मिक) मक़ामात (बहुत से स्थान) और मज़हबी (धार्मिक) कुतुब (किताबें) की बे-हुरमती (अपमान) अपनी जान-ओ-माल और 'इज़्ज़त-आबरू पर वहशियाना (बर्बरतापूर्ण) और राक्षसी हमलों के बावुजूद (अतिरिक्त) इस मज़हब (धर्म) को छोड़कर आज के हुक्मरानों का मज़हब (धर्म) इख़्तियार (पसंद) करने की बात तक नहीं करते न किसी दबाव (प्रेशर) में आते हैं न किसी लालच में और सबसे दिल-चस्प (रोचक) बात यह है कि आज भी बहुत से लोग हल्क़ा-ब-गोश इस्लाम (इस्लाम के अनुयायी) हो रहें हैं आख़िर इन के सरो पर कौन सी इस्लामी तलवार लटक रही हैं ? और जो मुसलमान ख़ुद ही दलितों जेसी पसमांदगी (लाचारी) की ज़िंदगी (जीवन) गुज़ार ने पर मजबूर (लाचार) हैं वो कौन सा लालच दे रहे हैं ?


  इस सिलसिले में यह अम्र (बात) भी काबिल-ए-ज़िक्र (उल्लेखनीय) है कि जब वतन-ए-'अज़ीज़ के बाशिंदों (नागरिकों) में हल्क़ा-ब-गोश इस्लाम (इस्लाम के अनुयायी) होने वालो के बारे में ग़ौर (विचार) किया जाता हैं तो नज़र आता हैं कि ज़्यादातर (अधिकतर) ख़ुश-हाल (मालदार) जंग-जू (लड़ाकू) बहादुर हुक्मराँ और असहाब-ए-रोज़गार (कारोबारी) लोग हल्क़ा-ब-गोश इस्लाम हुए क्षत्रिय क़ौमे मुसलमान हुई अगर वो तलवार के डर से मुसलमान हुए तो हमेशा की कमज़ोर पस-मांदा (पिछड़े) डरपोक और बुज़दिल (कायर) क़ौमे तो उन को देखकर मुसलमान हो गई होती ऐसा क्यूँ नहीं हुआ ?


(इस्लाम और ग़लत-फ़हमियां: पेज:133)




*आईन-ए-हिन्द (संविधान) और तबलीग़-ए-मज़हब (धर्म प्रचार) की आज़ादी (स्वतंत्रता)*




  आईन-ए-हिन्द (संविधान) में तमाम (सम्रग) मज़ाहिब (धर्मसमूह) के लोगों को अपने मज़हबी (धार्मिक) उमूर (काम) के इंतिज़ाम (व्यवस्था) मज़हब (धर्म) की तबलीग़ (प्रचार) और मज़हबी (धार्मिक) ता'लीम (शिक्षा) की इजाज़त (अनुमति) दी गई हैं चुनांचे (जैसा कि) आईन (संविधान) की दफ़्'अ (क़ानून की धारा) (25) में आज़ादी, ज़मीर (अंतरात्मा) मज़